एक तरफ वोटर को लुभाने, उनकी सोच पर असर डालने के लिए राजनीतिक पार्टियां तरह-तरह के आॅनलाइन अभियान चलाए हुए हैं, दूसरी तरफ पूरी चुनाव प्रक्रिया को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाए रखने की कोशिश में चुनाव आयोग ने भी हाईटेक अभियान छेड़ने की तैयारी कर ली है. जल्द ही चुनाव आयोग आम जनता के लिए एक मोबाइल एप 'एमवोटर' के नाम से जारी करने जा रहा है. इसके माध्यम से यूपी का कोई भी मतदाता अपने विधानसभा क्षेत्र के सभी प्रत्याशियों के बारे में जानकारी के साथ ही तमाम सुविधाओं का लाभ उठा सकता है. आमजनता के लिए जारी इस एप के माध्यम से आयोग मतदान के दिन एसएमएस करके जानकारी देगा. इस एप को व्यक्ति को अपने मोबाइल पर डाउनलोड करना होगा. इसके माध्यम से वोटर सर्च, अपने प्रत्याशी के बारे में जानकारी, बूथ के बारे में जानकारी और मैप के साथ नोटिफिकेशन रजिस्टर भी किया जा सकता है. एप को डाउनलोड करने के बाद वोटर को अपना वोटर आईडी नंबर और मोबाइल नंबर एप पर रजिस्टर करवाना होगा. रजिस्ट्रेशन के बाद मतदाता किसी भी वोटर के बारे में जानकरी ले सकेंगे. अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनिल गर्ग के अनुसार इस एप पर उन सभी प्रत्याशियों की जानकारी उपलब्ध होगी, जिनकी नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी होगी. मतदाता इसी एप पर मैप के जरिए अपना बूथ भी ढूंढ़ सकता है. साथ ही वोटर पर्ची भी यहीं से डाउनलोड की जा सकती है. यही नहीं बूथ की मतदाता सूची भी इसी एप पर दिखेगी.

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भारतीय जनता पार्टी में टिकट को लेकर घमासान मचा हुआ है. सोमवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए घोषित की गई 149 प्रत्याशियों की सूची के बाद से ही पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में रोष व्याप्त है. इसी क्रम में बुधवार को शाहजहांपुर के रहने वापे भाजपा कार्यकर्ता राकेश दुबे ने लखनऊ पार्टी ऑफिस के बाहर आत्मदाह करने की कोशिश की. राकेश दुबे पार्टी से टिकट चाहता था, लेकिन पहली लिस्ट में उसका नाम नहीं था. जिस वजह से नाराज राकेश ने आज आत्मदाह की कोशिश की. बता दें पुरे प्रदेश में पार्टी कार्यकर्ताओं का यही आलम है. बीजेपी में टिकट के लिए एक-एक सीट पर सैकड़ों प्रत्याशी अपनी दावेदारी ठोंक रहे हैं. इतना ही नहीं कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई सालों से पार्टी की सेवा कर रहे कार्यकर्ताओं को अनदेखा करते हुए दल-बदलुओं को टिकट दिया गया है. इससे पहले मंगलवार को कासगंज में बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने ही नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह आदि की तस्वीर पर कालिख पोत डाली और चप्पल चलाए. यही नहीं बरेली में भी टिकट बंटवारे से नाखुश नेता ने संगठन के पद से इस्तीफा दे दिया. कासगंज में पटियाली सीट से बीजेपी ने ममतेश शाक्य को प्रत्याशी घोषित किया है. ममतेश 2012 में बसपा के टिकट पर अमापुर से विधायक बने थे. हाल ही में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन की है. इस सीट से पार्टी के श्याम सुंदर गुप्ता अपनी दावेदारी कर रहे थे. टिकट की घोषणा के बाद श्याम सुंदर के समर्थकों की तरफ से मंगलवार को पार्टी के पोस्टर पर पीएम मोदी के चेहरे पर कालिख पोती गई. तस्वीर में साफ दिख रहा है कि कार्यकर्ता हाथ में चप्पल लेकर अपना रोष व्यक्त कर रहे हैं. उधर इस संबंध में श्याम सुंदर गुप्ता की तरफ से साफ कहा गया है कि उनका इस विरोध से कोई लेना देना नहीं है, ये कार्यकर्ता हैं जो अपना रोष व्यक्त कर रहे हैं. उधर बरेली में टिकट बंटवारे को लेकर केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के साले वीरेंद्र ने बीजेपी महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया है. बरेली में ही प्रत्याशियों की सूची जारी होते ही बीजेपी के जिला महामंत्री धीरेंद्र सिंह वीरू ने पद से इस्तीफा दे दिया है. धीरेंद्र बसपा छोड़ बीजेपी में पिछले दिनों आए केसर सिंह को नवाजगंज से टिकट दिए जाने से क्षुब्ध हैं. उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंध के बावजूद बहुकोणीय मुकाबला देखने कोमिलेगा. केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद जिस तरह से बीजेपी को दिल्ली और बिहार में करारी शिकस्त कासामना करना पड़ा है, वैसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.मुख्यमंत्री चेहरे को सामने न लाकर एक बार फिर बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे पर दांव खेला है. इसका कितना फायदाउसे इन चुनावों में मिलेगा वह 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा. इस बार उत्तर प्रदेश चुनावों में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के अलावा प्रदेश की कानून व्यवस्था, सर्जिकलस्ट्राइक, नोटबंदी और विकास का मुद्दा प्रमुख रहने वाला है. जहां एक ओर बीजेपी और बसपा प्रदेश की कानून व्यवस्थाको लेकर अखिलेश सरकार को घेर रही हैं, वहीँ विपक्ष नोटबंदी के फैसले को भी चुनावी मुद्दा बना रहा है. यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 224 सीट जीतकर पूर्ण बहुमतकी सरकार बनाई थी. पिछले चुनावों में बसपा को 80, बीजेपी को 47, कांग्रेस को 28, रालोद को 9 और अन्य को 24 सीटेंमिलीं थीं. ​

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समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की घोषणा में हो रही देरी की वजह कुछ मुद्दों पर असहमति बताई जा रही है. दरअसल, समाजवादी पार्टी कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) को ज्यादा सीटें नहीं देना चाहती. वैसे भी सियासी मजबूरी कांग्रेस और रालोद की ज्यादा है, लिहाजा दोनों ही राजनीतिक दल दबाव में हैं. सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस नेतृत्व सपा हाइकमान से इस बात पर चर्चा कर रहा है कि अगर उसे डिप्टी सीएम का पद दिया जाए तो वह झुकने को तैयार है. अखिलेश के खेमे में उत्साह बता दें अखिलेश खेमे की ओर से समाजवादी पार्टी और साइकिल सिंबल जीतने के बाद गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है. यही वजह है कि सपा कांग्रेस के साथ उनके शर्तों पर नहीं, बल्कि अपने शर्तों पर गठबंधन करना चाहती है. सूत्रों के मुताबिक सपा ने पहले 100 से 125 सीटें छोड़ने का संकेत दिया था, लेकिन बुधवार को उसके रुख में सख्ती देखने को मिली. अखिलेश यादव के चाचा और सपा के कद्दावर नेता रामगोपाल यादव यादव ज्यादा सीट देने के पक्ष में नहीं हैं. उनका कहना है कि 2012 चुनावों में कांग्रेस को 28 सीटें मिली थी और 32 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर थे. इस फ़ॉर्मूले के मुताबिक उसे 60 सीटें ही मिलनी चाहिए, जबकि उन्हें इससे ज्यादा सीटें दी जा रही हैं. इससे पहले रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव से मुलाकात कर प्रत्याशियों और गठबंधन की सूरत में दी जाने वाली सीटों पर चर्चा की. उम्मीद लगाई जा रही है कि गुरुवार को इसका एलान भी हो सकता है. यूपी में सात चरणों में चुनाव उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंध के बावजूद बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा. केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद जिस तरह से बीजेपी को दिल्ली और बिहार में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है, वैसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. मुख्यमंत्री चेहरे को सामने न लाकर एक बार फिर बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे पर दांव खेला है. इसका कितना फायदा उसे इन चुनावों में मिलेगा वह 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा. ये होंगे चुनाव में मुद्दे इस बार उत्तर प्रदेश चुनावों में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के अलावा प्रदेश की कानून व्यवस्था, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और विकास का मुद्दा प्रमुख रहने वाला है. जहां एक ओर बीजेपी और बसपा प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार को घेर रही हैं, वहीँ विपक्ष नोटबंदी के फैसले को भी चुनावी मुद्दा बना रहा है. यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 224 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. पिछले चुनावों में बसपा को 80, बीजेपी को 47, कांग्रेस को 28, रालोद को 9 और अन्य को 24 सीटें मिलीं थीं.

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आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा सूबा है उत्‍तर प्रदेश। कहते हैं देश की राजनीति का रुख यहां बहने वाली हवा से तय होता है। inextlive.com की स्‍पेशल सीरिज में जानिए उनकी कहानी जिन्‍हें मिली इस सूबे के 'मुख्‍यमंत्री' की कुर्सी। इस कड़ी में सबसे पहला नाम आता है उत्‍तर प्रदेश के पहले मुख्‍यमंत्री गोविंद बल्‍लभ पंत का, जिन्‍होंने अपने कार्यकाल में कई अहम फैसले लिए जो इतिहास के पन्‍नों में दर्ज हो गए राजनीतिक उठापटक : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नायक भी थे जिन्होंने चुपचाप अपने काम को पूरा किया। आजादी की लड़ाई में एक ऐसे ही सिपाही थे भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत। पंडित गोविंद बल्लभ पंत का नाम आते ही एक आदर का भाव उमड़ आता है। एक स्वंत्रता सेनानी के रूप में कहें या एक आदर्श राजनेता के रूप में देखें, पंडित जी का जीवन एक मिसाल के तौर पर देखा जाता रहा है। एक सक्रिय देशभक्त होने के नाते गोविंद बल्लभ पंत ने 1914 से ब्रिटिश राज के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया था। वकालत में ज्ञान होने की वजह से पंत जी ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था। बात 1928 की है जब साइमन कमीशन के खिलाफ लखनऊ में गोविंद वल्लभ पंत अपने कई साथियों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। उस समय साइमन कमीशन के खिलाफ पूरे देशभर में लहर थी। विरोध प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज सैनिकों ने गोविंद वल्लभ पंत को बुरी तरह से घायल कर दिया जिसकी वजह से वह पूरी जिंदगी पीठ के दर्द से कराहते रहे। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष करते हुए आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पंत जी राजनीति के एक माहिर नेता थे। उनके अंदर वह राजनीतिक क्षमता थी जिससे कई राजनेताओं ने उनसे प्रेरणा ली। महत्‍वपूर्ण फैसले : पंत जी का राजनीतिक जीवन साल 1937 में शुरु हुआ। पंत जी स्‍वतंत्र भारत के उत्‍तर प्रदेश के पहले मुख्‍यमंत्री थे। उन्‍होंने 1946 से लेकर 1954 तक मुख्‍यमंत्री पद का कार्यभार संभाला। मुख्‍यमंत्री पद पर रहते हुए पंत जी ने कई महत्‍वपूर्ण फैसले लिए थे। जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाने में गोविंद वल्‍लभ पंत का अहम योगदान रहा। इसके अलावा पंत जी ने हिंदू विवाह कानून बदलने की पैरवी की। हिंदू व्‍यक्‍ित कानूनन सिर्फ एक ही स्‍त्री से शादी कर सकता है, पंत जी इसके पक्षधर थे। साथ ही हिंदू महिला के तलाक देने के अधिकार को लेकर पंत जी का समर्थन हमेशा रहा। काम : गोविंद वल्‍लभ पंत ने स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही देशहित में कई बड़े काम करने शुरु कर दिए थे। साल 1914 की बात है। पंत जी ने अंग्रेजों के उस कानून को चुनौती दी थी, जिसमें स्‍थानीय लोगों को कुली बनाकर ब्रिटिश अफसरों का सामान उठाने को मजबूर किया जाता था। आखिरकार पंत की मेहनत रंग लाई और उनका यह आंदोलन सफल रहा। बात अगर राजनीति की करें, तो यहां भी यूपी के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद पंत ने राज्‍य हित में बहुत अच्‍छे काम किए। उस समय देश को आजाद हुए सालभर भी नहीं हुआ था, पंत ने उत्‍तर प्रदेश की आर्थिक स्‍थिति को मजबूती प्रदान की। यही नहीं गोविंद वल्‍लभ हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के पक्षधर थे। पंत जी ने ही पहली बार हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन भी चलाया था। व्‍यक्‍ितगत जीवन : गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितम्बर, 1887 ई. वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के खूंट नामक गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम गोविंदी था जबकि पिता मनोरथ पंत थे। इस परिवार का संबंध कुमाऊं की एक अत्यन्त प्राचीन और सम्मानित परम्परा से है। गोविंद बल्लभ पंत ने 1905 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया और 1909 में उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और वकालत करने लगे। काकोरी मुकद्दमे ने एक वकील के तौर पर उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई। पंत ने साल 1916 में कलावती से शादी की। जिनसे उन्हें एक बेटा (कृष्ण चंद्र पंत) हुआ जो बाद में राजनेता बना। इसके अलावा उनकी दो बेटियां भी थीं लक्ष्मी और पुष्पा। पांच महत्‍वपूर्ण बातें : 1. गोविंद वल्लभ पंत 10 साल तक स्कूल नहीं गए। उनकी शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई। वह पढ़ने में बहुत ही तेज थे। 2. 14 साल की उम्र में उनके साथ एक ऐसी घटना घटी जिसकी वजह से उन्हें पढ़ाई में काफी बाधा पहुंची। उन्हें छोटी सी उम्र में ही हार्ट अटैक की बीमारी हो गई। पहला हार्ट अटैक उन्हें 14 साल की उम्र में ही आया था। 3. गोविंद वल्लभ पंत ने तीन शादियां की थीं। उनकी दो पत्‍नियों का निधन हो गया था, बाद में 1916 में कलावती से तीसरी शादी की। 4. पंत जी को वकील के तौर पर पहली फीस 5 रुपये मिली थी। 5. 1914 में काशीपुर में ‘प्रेमसभा’ की स्थापना पंत जी के प्रयत्नों से ही हुई। ब्रिटिश शासकों ने समझा कि समाज सुधार के नाम पर यहाँ आतंकवादी कार्यो को प्रोत्साहन दिया जाता है। फलस्वरूप इस सभा को हटाने के अनेक प्रयत्न किये गये पर पंत जी के प्रयत्नों से वह सफल नहीं हो पाये। 1914 में पंत जी के प्रयत्नों से ही ‘उदयराज हिन्दू हाईस्कूल’ की स्थापना हुई। राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने इस स्कूल के विरुद्ध मुकदमा दायर कर नीलामी के आदेश पारित कर दिये। जब पंत जी को पता चला तो उन्होंनें चन्दा मांगकर इसको पूरा किया। 6. भारत रत्न सम्मान उनके ही काल में आरम्भ किया गया। सन् 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क का धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि 'भारत रत्न' से विभूषित किया गया। 7. 7 मार्च 1961 को गोविंद बल्‍लभ पंत का निधन हो गया।

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