चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी और चुनाव चिन्ह साइकिल दोनों अखिलेश को दे दी है. अखिलेश की इस बड़ी जीत ने यूपी में कई नए समीकरणों के लिए भी जगह बना दी है. सूत्रों के मुताबिक. खबर मिल रही है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का ऐलान आज या कल हो जाएगा. दोनों ही पार्टियों के बड़े नेताओं ने इस बात के संकेत दे दिए हैं. कहा जाता है राजनीति में एक और एक को जोड़ा जाता है तो वो दो नहीं बल्कि ग्यारह हो जाते हैं. यूपी में कांग्रेस के हाथ को साइकिल का सहारा चाहिए, इसका इशारा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कर चुके हैं. इलाहाबाद में पोस्टरों में एक साथ दिख रही हैं डिंपल-प्रियंका इलाहाबाद की दीवारों पर जो पोस्टर लगाए गए हैं उनमें अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव और राहुल की बहन प्रियंका गांधी एक साथ नज़र आ रही हैं. दोनों पार्टियों के बीच अगर खिचड़ी ना पक रही होती तो शायद इलाहाबाद की दीवारों पर पोस्टर ना चिपका होता. लालू यादव को लगता है कि जिस तरह उन्होंने नीतीश कुमार से हाथ मिलाकर बीजेपी को बिहार में मात दी थी. ठीक ऐसा ही कारनामा अखिलेश और राहुल भी यूपी में करेंगे. वैसे एसपी-कांग्रेस में गठबंधन हुआ तो फायदा होगा, ये एबीपी न्यूज़ के ओपिनियन पोल में सामने आ चुका है. इसके मुताबिक अगर अखिलेश कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो उनके गठबंधन को 133 से 143 सीटें मिल सकती हैं. जबकि, अकेले चुनाव लड़ने पर उन्हें सिर्फ 82 से 92 सीटें ही मिलने का अनुमान है. पोल के मुताबिक इस सूरत में बीजेपी को 138 से 148 सीटें मिल सकती हैं.

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यूपी में विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं। जनता के बीच चुनावों को लेकर जबरदस्त उत्साह है। सियासी गलियारों में सूबे की सत्ता पर कब्जे की जंग तेज हो रही है। सपा पार्टी में चल रही नूरा कुश्ती के कारण अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच सुलह की संभावना भी हर एक नये दिन के बाद समाप्त होती दिख रही है। अगर समाजवादी पार्टी और परिवार में मची जंग की बात करें तो यह अब आखिरी मुकाम पर पहुंच चुकी है। सूत्रों की मानें तो पार्टी के चिह्न साइकिल पर 13 जनवरी को निर्वाचन आयोग अखिलेश यादव गुट और मुलायम सिंह खेमे के दावों को लेकर अपना फैसला सुना सकता है, लेकिन अभी भी सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि साइकल चिह्न मिलेगा किसे और अगर सिंबल फ्रीज हुआ तो फिर आगे दोनों गुट क्या रणनीति बनाएंगे? फिलहाल सबकी नजरें आज चुनाव आयोग पर रहेंगी। इधर, इस मामले पर जानकारों की राय है कि निर्वाचन आयोग पार्टी के साइकिल सिंबल को फ्रीज कर दोनों खेमों को एक नया चुनाव चिह्न प्रदान कर सकता है, और ऐसे में नए चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना अखिलेश ही नही बल्कि मुलायम सिंह यादव के लिए भी चुनौती भरा हो सकता है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में मतदाता पार्टियों के चुनाव चिह्न को देखकर वोट करते हैं और इस समय जब लगातार पार्टी सत्ता पर थी, तो साइकिल का जबरदस्त प्रचार भी हुआ है। अब जब चुनाव महज एक महीने ही बचा है, तो अखिलेश और उनके चुनाव रणनीतिकारों के लिए इतने कम समय में लोगों तक नए सिंबल का प्रचार करना आसान नहीं होगा। यह सबसे बड़ी चुनौती होगी । इधर, सूत्रों के हवाले से खबर है कि अखिलेश यादव के लिए इस विधानसभा चुनाव में पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट और हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग ने इस स्थिति से निपटने के लिए भी मास्टर प्लान बनाया है, और इस वक्त प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग 1 लाख से ज्‍यादा लोगों के साथ काम कर रहे हैं। बताया तो यहां तक जा रहा है कि जार्डिंग की यह टीम गांवों में ब्रांड अखिलेश के लिए विलेज एम्बेसडर के रूप में काम कर रही है। सबसे खास बात यह है कि इसके लिए जार्डिंग के पूर्व स्टूडेंट एडवेट विक्रम सिंह 100 ट्रेंड लोगों की टीम को लीड कर रहे हैं और यह टीम सिंबल चेंज होने की सूरत में एक नए रणनीति के तहत लोगों को अखिलेश के नए सिंबल के बारे में लोगों को बताएगी। आपको बता दें कि राज्य में शानदार जनसंपर्क वजह से ही अखिलेश यादव को विश्वास है कि आखिरी क्षणों में चुनाव चिह्न बदलने की दशा में भी वे जीत सकते हैं, लेकिन उस दशा में ये सब इतना आसान नहीं होगा, जितना अखिलेश और उनके रणनीतिकार सोच रहे हैं। माना जा रहा है कि अखिलेश मोटरसाइकिल चुनाव चिन्ह चाहते हैं, इससे यह भी मैसेज जाएगा की विकास के साथ-साथ साइकिल अब मोटरसाइकिल हो गई है। अब इन बातों में कितनी सच्चाई है यह तो आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा, लेकिन इतना तो साफ़ है कि सूबे के इस हाई वोल्टेज पारिवारिक ड्रामे से लोगों में चुनाव को लेकर और उत्साह बढ़ गया है। अगर हम इस पूरे सियासी ड्रामे पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट रूप से नजर आएगी कि ना तो पिता पुत्र पर प्रहार कर रहा है और पुत्र न पिता पर। दोनों पक्ष पार्टी में मचे मौजूदा घमासान के लिए एक-एक व्यक्ति को दोषी मान रहे हैं। अखिलेश गुट का कहना है कि अमर सिंह ही लड़ाई का पूरा कारण हैं, और इन्हें पार्टी से हटा देना चाहिए। वहीं मुलायम गुट का कहना है कि रामगोपाल यादव ही लड़ाई की असल जड़ है। अब इसके पीछे की सच्चाई क्या है, ये तो पार्टी के हुक्मरानों को ही पता होगा, लेकिन अगर इस पूरे घमासान के बाद दोनों ही गुट सत्ता से दूर रहे तो फिर निश्चित ही पार्टी का भविष्य समाप्त हो जाएगा। फ़िलहाल सूबे की जनता इस पूरे सियासी ड्रामे पर नजर बनाए हुए है। दरअसल, समाजवादी परिवार के भीतर की जंग में सबसे ज्‍यादा नुकसान मुलायम गुट को उठाना पड़ सकता है। अखिलेश ने जिस तरह से विधायकों के साथ शक्‍ति प्रदर्शन किया है, ऐसे में शिवपाल और अमर सिंह यह समझ गए होंगे कि चाहे चुनावी चिह्न रहे अथवा न रहे अब मसला ब्रांड अखिलेश का हो चुका है। अब इंतजार कल यानी की शुक्रवार का है, जब चुनाव चिह्न के साथ असली समाजवादी पार्टी का निर्णय होेगा, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि अखिलेश अपना काम कर चुके हैं और वे मुलायम गुट को दूसरा झटका देने की तैयारी में हैं।

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लखनऊ। समाजवादी पार्टी की 'साइकिल' किसी को मिलेगी या इसे फ्रीज कर दिया जाएगा। इस पर चुनाव आयोग का फैसला आज आ सकता है। अखिलेश के प्रति कभी नरम, तो कभी गरम दिखने वाले मुलायम सिंह यादव ने 'साइकिल' का फैसला होने से ठीक पहले बेटे के खिलाफ तीखा हमला बोला है। मुलायम ने सोमवार को अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें मुस्लिम विरोधी तक कह दिया। अपनी अनदेखी का आरोप लगाते हुए मुलायम ने यह भी कह डाला कि अखिलेश बीवी-बच्चों की कसम देने पर उनसे मिलने आए और बात सुने बिना एक मिनट में ही उठकर चले गए। लखनऊ में एसपी दफ्तर में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुलायम ने कहा, 'मैंने कई बार बात करने के लिए अखिलेश को बुलाया। लेकिन वह नहीं आया। जब बीवी-बच्चों की कसम दी तब अखिलेश आया। एक बार आया तो बात शुरू करने से पहले ही चला गया।" मुलायम ने कहा कि अखिलेश हमारा बेटा है, लेकिन हमको नहीं मालूम था कि वह विरोधियों से मिल जाएगा। इस बीच कार्यकर्ताओं ने पार्टी बचाओ के नारे लगाने शुरू किए, तो मुलायम ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया।

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सपा में मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के गुट के बीच इलेक्शन सिंबल को लेकर जारी विवाद पर सोमवार को चुनाव आयोग फैसला सुना सकता है। फैसला आने की उम्मीद इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यूपी में पहले फेज की वोटिंग के लिए 17 जनवरी को नोटिफिकेशन जारी होगी और नॉमिनेशन फाइल करने की प्रॉसेस शुरू कर दी जाएगी। माना जा रहा है कि इलेक्शन कमीशन साइकिल को फ्रीज कर देगा और दोनों गुटों को नए सिंबल देगा। 37 साल पहले भी ऐसा ही हुआ था... - संविधान एक्सपर्ट सुभाष कश्यप बताते हैं, ''दोनों गुट यह दावा कर रहे हैं कि वे ही असली समाजवादी पार्टी हैं। इलेक्शन कमीशन देखेगा कि किससे पास पार्टी के ज्यादा विधायक, सांसद, एमएलसी और पदाधिकारी हैं। इसको देखते हुए फैसला होगा कि पार्टी का सिंबल (साइकिल) किसे दिया जाए।'' - ''होे सकता है कि किसी को भी सिंबल ना दिए जाए। अगर तस्वीर साफ नहीं हुई तो इलेक्शन कमीशन दोनों गुटों को नए सिंबल भी दे सकता है।'' - बता दें कि 1979 में Congress (I) और Congress (U) जैसे दो गुटों और 1980 में बीजेपी और जनता पार्टी को चुनाव आयोग ने इंटरिम ऑर्डर के तहत मान्यता दी थी। दोनों को अलग-अलग चुनाव चिह्न मिले थे। लिहाजा, सपा के दोनों गुटों के साथ भी ऐसा ही हाे सकता है। पार्टी सिंबल को लेकर लड़ाई क्यों? - दरअसल, अखिलेश और मुलायम ने यूपी चुनाव के मद्देनजर विधानसभा कैंडिडेट्स की अलग-अलग लिस्‍ट जारी की थी। - इसके बाद दोनों ने पार्टी की मीटिंग बुलाई। मुलायम की मीटिंग में महज 17 विधायक पहुंचे, जबकि अखिलेश से मिलने 207 विधायक पहुंचे थे। - इसके आद अखिलेश के गुट ने पार्टी पर अपना कंट्रोल होने का दावा किया। अब पार्टी के इस झगड़े में दोनों ही खेमे पार्टी के सिंबल (साइकिल) से चुनाव लड़ना चाहते हैं। आयोग में 4 घंटे चली थी सुनवाई - बता दें, इससे पहले बीते 13 जनवरी को चुनाव आयोग में इस मामले में 4 घंटे तक सुनवाई चली थी। सपा के दोनों गुटों ने आयोग के सामने अपना-अपना पक्ष रखा था। - सुनवाई के बाद अखिलेश गुट के वकील कपिल सिब्‍बल ने कहा था, "आयोग ने फैसला रिजर्व कर लिया है। जल्‍द ही पता चल जाएगा कि किस गुट को पार्टी सिंबल दिया जाना है।" - अखिलेश गुट के एक और वकील सुमन राघव ने कहा था कि हमने पूरी ताकत से चुनाव आयोग में अपना पक्ष रखा। - सपा के सूत्रों की मानें तो रामगोपाल पक्ष ने आयोग से कहा था कि अखिलेश को पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना है, सिंबल भी उन्हीं का है। - वहीं, मुलायम पक्ष ने कहा कि मीटिंग असंवैधानिक थी, रामगोपाल बर्खास्त थे। - उधर, सुनवाई के लिए मुलायम के साथ शिवपाल यादव ईसी ऑफिस में मौजूद रहे। - मुलायम की तरफ से वकील एम सी ढींगरा, एन हरिहरन और मोहन परसरन मौजूद रहे। अखिलेश ले सकते हैं मोटरसाइकिल सिंबल - सपा के सूत्रों के मुताबिक, अगर अखिलेश को 'साइकिल' नहीं मिलती है तो वे मोटरसाइकिल को सिंबल के तौर पर अपना सकते हैं। - रामगोपाल ने चुनाव आयोग को बताया, "अखिलेश यादव को 90% एमएलए का सपोर्ट हासिल है। वे ही पार्टी को लीड कर रहे हैं। लिहाजा, इस धड़े को ही सपा माना जाना चाहिए।" ऐसे शुरू हुआ सिंबल विवाद - अखिलेश और शिवपाल यादव के बीच विवाद अक्टूबर से शुरू हो गया था। लेकिन सिंबल को लेकर लड़ाई 1 जनवरी के बाद शुरू हुई। - पार्टी से बाहर किए गए रामगोपाल यादव ने 1 जनवरी को लखनऊ में सपा का राष्‍ट्रीय अधिवेशन बुलाया, जहां अखिलेश यादव भी मौजूद थे। इस अधिवेशन में 3 प्रस्ताव पास हुए। पहला प्रस्‍ताव-अधिवेशन में अखिलेश को पार्टी का नेशनल प्रेसिडेंट बनाया गया। रामगोपाल ने कहा कि अखिलेश को यह अधिकार है कि राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी, संसदीय बोर्ड और पार्टी के सभी संगठनों का जरूरत के मुताबिक फिर से गठन करें। इस प्रस्‍ताव की सूचना चुनाव आयोग को दी जाएगी। दूसरा प्रस्‍ताव-मुलायम को समाजवादी पार्टी का संरक्षक बनाया गया। तीसरा प्रस्‍ताव-शिवपाल यादव को पार्टी के स्टेट प्रेसिडेंट के पद से हटाया गया और अमर सिंह को पार्टी से बाहर किया गया। बता दें, शिवपाल और अमर सिंह को लेकर अखिलेश ने कई बार विरोध दर्ज कराया था। इस अधिवेशन के बाद दोनों गुट खुलकर सामने आ गए। पहले मुलायम, फिर रामगोपाल ईसी पहुंचे थे - रामगोपाल के अधिवेशन के बाद 2 जनवरी को मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, अमर सिंह और जया प्रदा के साथ दिल्‍ली में पार्टी सिंबल पर दावेदारी को लेकर इलेक्‍शन कमीशन (ईसी) पहुंच गए और साइकिल पर अपना हक जताया। - इसके बाद अखिलेश गुट की तरफ से रामगोपाल यादव 3 जनवरी को इलेक्‍शन कमीशन पहुंचे और उन्‍होंने साइकिल पर अपना दावा ठोका।

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समाजवादी पार्टी में मची उथल-पुथल के बीच विधायक सुरक्षित ठिकाने की तलाश में जुट गए हैं। यूपी से बड़ी खबर है कि सपा के 45 विधायक भाजपा में शामिल होने का मूड बना लिए हैं। यूपी प्रभारी ओम माथुर और प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के जरिए अधिकांश विधायकों की मीटिंग भी अमित शाह से हो चुकी है। मोदी की सहमति मिलते ही ये विधायक सपा की खतरे में पड़ी साइकिल छोड़ कमल का फूल थामे जल्द दिख सकते हैं। कहा जा रहा है कि विधायकों की अगुवाई सपा नेतृत्व से असंतुष्ट चल रहे रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया और पूर्व मंत्री महेंद्र अरिंदमन सिंह कर रहे हैं। हालांकि इन विधायकों की मंशा पूरी होने की राह में यूपी के कई पुराने भाजपा नेताओं का रुख बाधक भी बन सकता है। दरअसल भाजपा के पुराने नेताओं को आशंका है कि सपा के विधायकों की एंट्री से टिकट के दावेदार पुराने भाजपाइयों का पत्ता साफ हो सकता है, जो पार्टी में आंतरिक असंतोष का कारण बन सकता है। जिस तरह से मुलायम और अखिलेश के बीच जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। साइकिल चुनाव चिह्न भी जब्त होने की कगार पर है। उससे संबंधित विधायकों को लगता है कि सपा के किसी भी धड़े से चुनाव लड़ने पर उन्हें हार का सामना करना पड़ेगा। लिहाजा उन्होंने भाजपा के बैनर तले चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू की है। सूत्र बता रहे हैं कि सपा के पूर्व मंत्री राजा अरिदमन सिंह सपा को छोड़कर बीजेपी के केंद्रीय कार्यालय में ओम माथुर और यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य की मौजूदगी में वो भाजपा ज्वाइन करेंगे। इससे पहले शुक्रवार को सपा के राष्ट्रीय महासचिव अशोक प्रधान ने सपा से किनारा करते हुए भाजपा का दामन थाम चुके हैं।

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