Dharm

Dharm (104)

हमारे आस-पास और घर में मौजूद चीजों का किसी न किसी रुप में हम पर जरुर असर होता है। आपने देखा होगा कि कोई चीज आपके घर में आई होगी और उसके बाद से घर में एक के बाद एक खुशखबरी और उन्नति होती गई होगी। वैसे ही नया घर या काम शुरू करने को बाद कई बार घर में सुख-शांति नहीं रहती। धंधा करने वालों को काम में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है कई बार तो धंधा बंद तक करना पड़ जाता हैं। वास्तु विज्ञान में ऐसी ही कुछ चीज का उल्लेख किया गया है जिससे नए मकान-फैक्ट्री व उद्योग के शुरुआत में करने से सुख-शांति औऱ काम में उन्नति मिलती है। वास्तु विशेषज्ञों की मानें तो अगर आप नए मकान-फैक्ट्री व उद्योग को शुरू करने वाले हैं तो उपाय जरूर करें। भूमि-पूजन करके नींव का मूहूर्त अवश्य करना चाहिए। इस मूहूर्त में चांदी का सर्प बनाकर जमीन में जरूर डालना चाहिए। भारतीय मान्यता के अनुसार जिस प्रकार शेषनाग के सिर पर पूरी पृथ्वी का भार है, ठीक उसी प्रकार से इस भवन का भार शेषनाग की तरह सर्प के उपर रखा रहेगा। इससे मकान की नींव कभी नहीं टूटेगी और बनी रहेगी। मकान किसी भी आपदा से बचा रहेगा। यह प्रयोग सैकड़ो बार परीक्षित है। इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य व सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

ज्वालामुखी देवी – यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार – होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा :- ============================== हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलो मीटर दूर स्तिथ है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को जोता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता है। इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। मान्यता है यहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहाँ पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं।  इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद के करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया। अकबर और ध्यानु भगत की कथा इस जगह के बारे में एक कथा अकबर और माता के परम भक्त ध्यानु भगत से जुडी है। जिन दिनों भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था,उन्हीं दिनों की यह घटना है। हिमाचल के नादौन ग्राम निवासी माता का एक सेवक धयानू भक्त एक हजार यात्रियों सहित माता के दर्शन के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली मे उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानु भक्त को पेश किया। बादशाह ने पूछा तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहां जा रहे हो। ध्यानू ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया मैं ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहा हूं मेरे साथ जो लोग हैं, वह भी माता जी के भक्त हैं, और यात्रा पर जा रहे हैं।अकबर ने सुनकर कहा यह ज्वालामाई कौन है ? और वहां जाने से क्या होगा? ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया महाराज ज्वालामाई संसार का पालन करने वाली माता है। वे भक्तों के सच्चे ह्रदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है उनके स्थान पर बिना तेल-बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन जाते हैं। अकबर ने कहा अगर तुम्हारी बंदगी पाक है तो देवी माता जरुर तुम्हारी इज्जत रखेगी। अगर वह तुम जैसे भक्तों का ख्याल न रखे तो फिर तुम्हारी इबादत का क्या फायदा? या तो वह देवी ही यकीन के काबिल नहीं, या फिर तुम्हारी इबादत झूठी है। इम्तहान के लिए हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते है, तुम अपनी देवी से कहकर उसे दोबारा जिन्दा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गई। ध्यानू भक्त ने कोई उपाए न देखकर बादशाह से एक माह की अवधि तक घोड़े के सिर व धड़ को सुरक्षित रखने की प्रार्थना की। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा करने की अनुमति भी मिल गई। बादशाह से विदा होकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार मे जा उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि करने के बाद रात भर जागरण किया। प्रात:काल आरती के समय हाथ जोड़ कर ध्यानू ने प्राथना की कि मातेश्वरी आप अन्तर्यामी हैं। बादशाह मेरी भक्ती की परीक्षा ले रहा है, मेरी लाज रखना, मेरे घोड़े को अपनी कृपा व शक्ति से जीवित कर देना। कहते है की अपने भक्त की लाज रखते हुए माँ ने घोड़े को फिर से ज़िंदा कर दिया। यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया | उसने अपनी सेना बुलाई और खुद  मंदिर की तरफ चल पड़ा | वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई | उसने अपनी सेना से मंदिर पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं।| तब जाकर उसे माँ की महिमा का यकीन हुआ और उसने सवा मन (पचास किलो) सोने  का छतर चढ़ाया | लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर गिर कर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया | आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं | पास ही गोरख डिब्बी का चमत्कारिक स्थान : - मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एव भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बाये हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। थोडा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। कहते है की यहाँ गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और कई चमत्कार दिखाए थे।  यहाँ पर आज भी एक पानी का कुण्ड है जो देख्नने मे खौलता हुआ लगता है पर वास्तव मे पानी ठंडा है। ज्वालाजी के पास ही में 4.5 कि.मी. की दूरी पर नगिनी माता का मंदिर है। इस मंदिर में जुलाई और अगस्त के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। 5 कि.मी. कि दूरी पर रघुनाथ जी का मंदिर है जो राम, लक्ष्मण और सीता को समर्पि है। इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा कराया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढी हुई है। चमत्कारिक है ज्वाला : - पृत्वी के गर्भ से इस तरह की ज्वाला निकला वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहाँ पर ज्वाला प्राकर्तिक न होकर चमत्कारिक है क्योंकि अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अन्दर से निकलती ‘ऊर्जा’ का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस ‘ऊर्जा’ को नहीं ढूंढ पाए। वही अकबर लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाए। यह दोनों बाते यह सिद्ध करती है की यहां ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पाद होता ।। सुनील झा " मैथिल"

हाल ही में कुछ मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक पर काफी विवाद हुआ। मंदिर के प्रमुख लोगों का कहना था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए। दरअसल मंदिर प्रमुख का कहना है कि मासिक धर्म टेस्ट करने वाली मशीन के चेक होने के बाद ही महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिलेगी। उन्हें लगता है कि महिलाओं की शुद्धता का पता लगाना मुश्किल होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं महिलाओं को होने वाले मासिक धर्म का उल्लेख हिंदू धर्म ग्रंथो में भी मिलता है। भागवत पुराण के अनुसार स्त्रियों को मासिक धर्म क्यों होता है? इस बारे में एक पौराणिक कथा मिलती है। पुराण के अनुसार एक बार 'बृहस्पति' जो देवताओं के गुरु थे, एक बार वह देवराज इंद्र से काफी नाराज हो गए। इसी दौरान असुरों ने देवलोक परआक्रमण कर दिया और इंद्र को इंद्रलोक छोड़कर जाना पड़ा। तब इंद्र, ब्रह्माजी के पास पहुंचे और उनसे मदद की मांग की। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि, इंद्र देव आपको किसी ब्रह्म-ज्ञानी की सेवा करनी चाहिए ऐसे में आपके दु:ख का निवारण होगा। तब इंद्र एक ब्रह्म-ज्ञानी व्यक्ति की सेवा करने लगे। लेकिन वो इस बात से अनजान थे कि उस ब्रह्म-ज्ञानी की माता असुर थीं। माता का असुरों के प्रति विशेष लगाव था। ऐसे में इंद्र देव द्वारा अर्पित सारी हवन सामग्री जो देवताओं को अर्पित की जाती थी, वह ब्रह्म-ज्ञानी असुरों को चढ़ाया करते थे। इससे इंद्र की सेवा भंग हो गई। जब इंद्र को यह बात पता चली तो वो बहुत नाराज हुए। उन्होंने उस ब्रह्म-ज्ञानी की हत्या कर दी। हत्या करने से पहले इंद्र उस ब्रह्म-ज्ञानी को गुरु मानते थे और गुरु की हत्या करना घोर पाप है। इसी कारण उन्हें ब्रह्महत्या का दोष भी लग गया। ये पाप एक भयानक दानव के रूप में उनका पीछा करने लगा। किसी तरह इंद्र ने स्वयं को एक फूल में छुपाया और कई वर्षों तक उसी में भगवान विष्णु की तपस्या करते रहे। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और इंद्र को ब्रह्म हत्या के दोष से बचा लिया। उन्होंने इस पाप मुक्ति के लिए एक सुझाव दिया। सुझाव के अनुसार इंद्र ने पेड़, जल, भूमि और स्त्री को अपने पाप का थोड़ा थोड़ा अंश देने के लिए मनाया। इंद्र की बात सुनकर वह तैयार हो गए। इंद्र ने उन्हें एक-एक वरदान देने की बात कही। सबसे पहले पेड़ ने ब्रह्महत्या के पाप का एक चौथाई हिस्सा लिया जिसके बदले में इंद्र ने पेड़ को अपने आप जीवित होने का वरदान दिया। इसके बाद जल ने एक चौथाई हिस्सा लिया तो इंद्र ने जल को वरदान दिया कि जल को अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति होगी। तीसरे पड़ाव में भूमि ने ब्रह्म हत्या का दोष इंद्र से लिया बदले में इंद्र ने भूमि को वरदान दिया कि भूमि पर आने वाली कोई भी चोट से उसे कोई असर नहीं होगा और वो फिर से ठीक हो जाएगी। आखिर में स्त्री ही शेष बची थी। इंद्र का ब्रह्म हत्या का दोष स्त्री ने लिया। बदले में इंद्र ने स्त्री को वरदान दिया कि स्त्रियों को हर महीने मासिक धर्म होगा। लेकिन महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा काम का आनंद उठा सकेगीं। पौराणिक मतों के अनुसार स्त्रियां ब्रह्म हत्या यानी अपने गुरु की हत्या का पाप सदियों से उठाती आ रही हैं। इसलिए उन्हें मंदिरों में अपने गुरुओं के पास जाने की इजाजत नहीं है। मान्यता है कि तभी से स्त्रियों में मासिक धर्म का होना शुरू हुआ। हालांकि आधुनिक युग में वैज्ञानिक मत को मानने वाले लोग इन बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं।

सूर्योपासना के महापर्व छठ के दूसरे दिन शनिवार को व्रतियों ने खरना किया। व्रती दिनभर पर उपवास रहे और सूर्यास्त के बाद मिट्टी के नये चूल्हे पर दूध, गुड़ व साठी के चावल से खीर बनाया। गेहूं के आटे की रोटी का प्रसाद बना। केले के पत्ते पर छठी मईया को इसका भोग लगाने के बाद प्रणाम कर व्रत पूरा करने के लिए आशिर्वाद मांगा। इसके बाद परिवार वालों के साथ बैठकर उन्होंने खीर- रोटी का प्रसाद ग्रहण किया। इस प्रसाद के बाद व्रतियों का 36 घंटे का व्रत प्रारंभ हो गया। अब वे सात नवंबर को सुबह उगते सूर्य को अ‌र्घ्य देने के बाद ही अन्न व जल ग्रहण करेंगे। आटा चक्कियों पर रही भीड़ छठ पूजा का गेहूं पिसवाने के लिए शनिवार को शहर की आटा चक्कियों पर भीड़ उमड़ी। आटा चक्की संचालकों ने भी पर्व महत्ता को ध्यान में रखते हुए पहले चक्की की साफ- सफाई की और उसे धोने के बाद पर्व के गेहूं की पिसाई शुरू की। इस दौरान दूसरा कोई अनाज नहीं पीसा गया। पर्व का गेहूं समाप्त होने के बाद ही दूसरे अनाज की पिसाई शुरू की गई. छठ पूजा घरों में बना प्रसाद खरना के बाद उसी चूल्हे पर प्रसाद बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई जिस पर खरना का प्रसाद बनाया गया था। इस दौरान प्रसाद बनाने वाली महिलाएं छठ के गीत गाने के साथ प्रसाद तैयार करने में लगी रहीं। प्रसाद में ठेकुआ, खजूर आदि बनाया गया। घर के पुरुष सदस्य बाजार में छठ के प्रसाद फल- सब्जियों की खरीदारी में जुटे रहे। इस दौरान गन्ना, केला, सेब, संतरा, सिंघाड़ा, शकरकंद, मूली, अनानास, गॉगल, नींबू, सरीफा आदि की खरीदारी की गई.

पटना. लोकआस्था के महापर्व छठ की छटा बिहार में छाने लगी है। हर गली-मोहल्ले में ‘कांचहि बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए..., दर्शन दीहीं ना अपन ये छठी मइया...’ जैसे गीत गूंज रहे हैं। हर साल की तरह इस साल भी छठ पूजा में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले बिहारियों के आने का सिलसिला जारी है। छठ पूजा में शामिल होने के लिए हर साल पांच-छह लाख लोग बिहार आते हैं। अकेले रेलवे ने इस साल 24 स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं। इस बार एक करोड़ घरों में व्रत होगा। पर्व के दौरान पांच दिनों तक करीब 300 करोड़ रुपए के कारोबार का भी अनुमान है। बता दें शुक्रवार से नहाय-खाय के साथ छठ पर्व की शुरुआत हो रही है। जानिए कहां से ज्यादा जाते हैं बिहारी... - में 70 से 80 फीसदी घरों में लोग छठ पूजा करते हैं। इसके अलावा देश के उन सभी राज्यों और दूसरे देशों में जहां भी बिहार के लोग रहते हैं, छठ पूजा हाेती है। - इस दौरान बिहार में प्रसाद, पूजन-सामग्री, फल आदि मिलाकर करीब 300 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार होता है। पटना के बहादुरपुर बाजार समिति में दीपावली के अगले दिन ही छठ के लिए फलों की बिक्री शुरू हो जाती है। - फल कारोबारी शहजाद आलम ने बताया कि पहले तीन दिन बाहर के लोग और व्यवसायी फल खरीदते हैं। पहले अर्घ्य से दो दिन पहले लोकल बिजनेसमैन और जिनके यहां छठ होती है, वे फल खरीदने आते हैं। - वहीं काम करने वाले सरफू खान बताते हैं कि 6 महीने के बराबर फल छठ में 5 दिनों में बिक जाते हैं। अकेले सेब की बिक्री इतनी होती है कि 150 से 175 ट्रक सेब कश्मीर से मंगाए जाते हैं। 24 पूजा स्पेशल ट्रेनें, ज्यादातर में नो रूम; फ्लाइट का किराया 68 हजार रु. तक - देशभर से 246 ट्रेनें पटना जाती हैं। इसके बावजूद छठ के लिए पूर्व मध्य रेल के पांचों मंडलों में 24 पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाने का एलान किया गया है। - फिलहाल ज्यादातर ट्रेनों में 355 से 400 तक की वेटिंग चल रही है या नो रूम है। यानी इनमें वेटिंग का टिकट भी नहीं बचा है। - पटना के लिए 20 फ्लाइट्स हैं, लेकिन दिल्ली से पटना के लिए 7 से 22 हजार रुपए तक का किराया लग रहा है। मुंबई-पटना का किराया 68 हजार रुपए तक है। दिल्ली से पटना तक किराया (रु. में) डेट मिनिमम मैक्सिमम 03 नवंबर 7011 26155 04 नवंबर 9460 22000 05 नवंबर 7446 22000 मुंबई से पटना तक किराया (रु. में) डेट मिनिमम मैक्सिमम 03 नवंबर 11900 21254 04 नवंबर 11957 33013 05 नवंबर 9566 68166 यहां से जाते हैं ज्यादातर बिहारी - छठ पर सबसे ज्यादा लोग दिल्ली से जाते हैं। इसके बाद मुंबई, लखनऊ का नंबर है। कोलकाता, रांची से भी बड़ी तादाद में लोग पहुंचते हैं। - मध्य प्रदेश में इंदौर से पटना जाने वालों की तादाद सबसे ज्यादा रहती है।

उज्जैन. आज दिवाली है। इस दिन श्रीमहालक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा की जाती है। उज्जैन के ज्योतिषी पं. प्रफुल्ल भट्ट के अनुसार, इस बार अमावस्या 29 अक्टूबर, शनिवार की रात करीब 8.45 से शुरू होकर रविवार रात 11 बजे तक रहेगी। दिवाली पर प्रीति और बुधादित्य दो बहुत ही विशेष योग बन रहा है। इन योगों में की गई लक्ष्मी पूजा से हर प्रकार के सुखों की प्राप्ति संभव है। ये योग धन लाभ के लिए भी बहुत शुभ माने गए हैं। अनाज, किराना, धातु और राजनीति से जुड़े लोगों के लिए ये योग बहुत खास रहेंगे। ऐसे सजाएं मां लक्ष्मी की चौकी... - दिवाली पूजा के लिए मां लक्ष्मी की चौकी विधि-विधान से सजाई जानी चाहिए। - चौकी पर लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियां इस तरह रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी और गणेशजी की मूर्तियां स्थापित करें। - कलश को लक्ष्मीजी के पास चावल पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का आगे का भाग दिखाई दे और इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुणदेव का प्रतीक है। - अब दो बड़े दीपक रखें। एक में घी और दूसरे में तेल का दीपक लगाएं। एक दीपक चौकी के दाहिनी ओर रखें और दूसरी मूर्तियों के चरणों में। - इनके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें। ऐसे सजाएं पूजा की थाली - पूजा की थाली के संबंध में शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि लक्ष्मी पूजन में तीन थालियां सजानी चाहिए। - पहली थाली में 11 दीपक समान दूरी पर रख कर सजाएं। दूसरी थाली में पूजन सामग्री इस क्रम से सजाएं- सबसे पहले धानी (खील), बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिंदूर कुमकुम, सुपारी और थाली के बीच में पान रखें। - तीसरी थाली में इस क्रम में सामग्री सजाएं- सबसे पहले फूल, दूर्वा, चावल, लौंग, इलाइची, केसर-कपूर, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक। - इस तरह थाली सजा कर लक्ष्मी पूजन करें।

२०१६ धनतेरस पूजा, धनत्रयोदशी पूजा धनत्रयोदशी या धनतेरस के दौरान लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग २ घण्टे २४ मिनट तक रहता है। धनतेरस पूजा को करने के लिए हम चौघड़िया मुहूर्त को देखने की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं। धनतेरस पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रदोष काल के दौरान होता है जब स्थिर लग्न प्रचलित होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान धनतेरस पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है। इसीलिए धनतेरस पूजन के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है। वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। धनतेरस पूजा के लिए हम यथार्थ समय उपलब्ध कराते हैं। हमारे दर्शाये गए मुहूर्त के समय में त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल और स्थिर लग्न सम्मिलित होते हैं। हम स्थान के अनुसार मुहूर्त उपलब्ध कराते हैं इसीलिए आपको धनतेरस पूजा का शुभ समय देखने से पहले अपने शहर का चयन कर लेना चाहिए। धनतेरस पूजा को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस का दिन धन्वन्तरि त्रयोदशी या धन्वन्तरि जयन्ती, जो कि आयुर्वेद के देवता का जन्म दिवस है, के रूप में भी मनाया जाता है। इसी दिन परिवार के किसी भी सदस्य की असामयिक मृत्यु से बचने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के लिए घर के बाहर दीपक जलाया जाता है जिसे यम दीपम के नाम से जाना जाता है और इस धार्मिक संस्कार को त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है। आपको धनत्रयोदशी की हार्दिक शुभकामनायें।

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