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Dharm (115)

ये आप सभी जानते हें कि दुर्गा पूजा में पूजी जाने वाली माँ दुर्गा की भव्‍य मूर्तियों का एक खास महत्व होता है। जहां तक हम जानते हैं कि आप ये शायद ही जानते होंगे कि उस मिट्टी का भी बेहद महत्‍व होता है जिनसे ये मूर्तियां तैयार की जाती हैं। ये मिट्टी कई विशिष्‍ठ स्‍थानों से ला कर तैयार की जाती है। जैसे पवित्र गंगा के किनारों से। फिर इसमें गोबर, गौमूत्र और थोड़ी सी मिट्टी निषिद्धो पाली से मंगाकर मिलायी जाती है। अब आप सोचेंगे कि निषिद्धो पाली क्या है, तो ये वेशओं के रहने के स्‍थान जिसके बाहर से मिट्टी लायी जाती है। आइये जाने इसकी पूरी कहानी। दुर्गा उत्‍सव और मूर्तियों की कहानी दरसल दुर्गा पूजा या दुर्गा उत्‍सव मूल रूप से पश्‍चिम बंगाल का त्‍योहार है, पर अब ये त्‍योहार पूरे भारत में समान उत्‍साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस मौके पर मां दुर्गा की विशाल मूर्तियों से दुर्गा पूजा के पंडाल सजाये जाते हैं। पश्‍चिम बंगाल में मुख्‍य रूप से में दुर्गा मां की प्रतिमाओं का निर्माण उत्तरी कोलकत्ता के कुमरटली इलाके में होता है। मां लक्ष्मी, सरस्वती और पूजा में प्रयोग होने वाली अन्‍य मूर्तियों का निर्माण करने वाला ये इलाका अपने कारीगरों के लिए पूरे भारत में मशहूर है। साथ ही मशहूर है यहां के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया सोनागाछी से लायी गयी मिट्टी का मूर्तियां बनाने में प्रयोग करना। अब जब भारत के अन्‍य हिस्‍सों में भी मूर्तियों का र्निमाण होने लगा है तो वहां भी इस वेश्‍यालय के बाहर की मिट्टी बोरों में भर कर वहां बिकने जाने लगी है। वैसे कुछ लोग स्‍थानीय वेश्‍यालयों के बाहर की मिट्टी भी प्रयोग करने लगे हैं। क्‍यों होती है वेश्‍यालय के दरवाजे की मिट्टी इसकी भी कई कहानियां प्रचलित हैं। मां के आर्शिवाद का परिणाम कुछ जानकारों का कहना है कि प्राचीन काल में एक वेश्‍या मां दुर्गा की अन्‍नय भक्‍त थी उसे तिरस्कार से बचाने के लिए मां ने स्‍वंय आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई। समाज सुधार का प्रतीक कोलकाता से ही कई सामाजिक सुधार के मूवमेंट भी चले हैं। इन्‍हीं में से एक महिलाओं के सम्‍मान के लिए भी था और इसी लिए ये मान्यता प्रचलित की गयी कि नारी शक्ति का ही एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उससे कहीं गलती होती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है, फिर चाहे वो वेश्‍या ही क्‍यों ना हो। वेश्‍या के घर के बाहर की मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे उन्हें सम्मान देने का यही उद्देश्य है। सांकेतिक मान्‍यता इसके अलावा एक मान्यता ये भी है कि जब एक महिला या कोई अन्‍य व्‍यक्‍ति वेश्‍यालय के द्वार पर खड़ा होता है तो अंदर जाने से पहले अपनी सारी पवित्रता और अच्‍छाई को वहीं छोड़कर प्रवेश करता है, इसी कारण यहां की मिट्टी पवित्र मानी जाती है।

कुछ ही दिनों बाद 30 अक्टूबर को दिवाली यानी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का शुभ मुहुर्त आने वाला है. इस दिन की गई लक्ष्मी पूजा से घर की गरीबी दूर हो सकती है, लेकिन लक्ष्मी पूजा के साथ ही कुछ और बातें भी हैं, जिनका ध्यान हमेशा रखने पर देवी की कृपा हम पर बनी रहती है. गुस्से से बचें : अभी से इस बुरी आदत पर नियंत्रण रखना शुरू कर दें, ताकि दिवाली के त्यौहार पर घर में सुख-शांति रहे. कहा जाता है कि दिवाली पर क्रोध करना और चिलाना अशुभ माना जाता है. जो लोग इन दिनों क्रोध करते हैं उनसे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं. वाद-विवाद से बचें : घर में किसी भी तरह का कलह या झगड़ा ना करें. घर परिवार के सभी सदस्य प्रेम से रहें और ख़ुशी का माहौल बनाकर रखें. जहां झगड़ा और कलह होता है वहां लक्ष्मी जी की कृपा नहीं होती. घर में गंदगी से बचें : दिवाली के त्यौहार पर साफ-सफाई का विशेष महत्व है. घर में गंदगी नहीं होनी चाहिए. घर का कोना-कोना एक दम साफ रखें. किसी भी प्रकार की बदबू घर में या घर के आस पास ना हो. घर में सुगन्धित वातावरण बनाएं रखें. नशे से बचें : दिवाली के समय किसी भी प्रकार का नशा ना करें. कहा जाता है कि जो लोग नशा करते हैं वो हर समय परेशानियों से घिरे रहते हैं. नशे के कारण घर की शांति भांग हो सकती है और तनाव का सामने करना पड़ सकता है.Diwali-festival-Of-lights बुजुर्गों का अपमान ना करें : इस बात का विशेष ध्यान रखें कि किसी भी परिस्थिति में माता-पिता या किसी अन्य बुजुर्ग का अपमान ना करें और वो आपकी वजह से उदास ना हों. सभी का सम्मान करें. जो लोग माता-पिता का सम्मान नहीं करते वो हमेशा दरिद्र बने रहते हैं. शाम को सोने से बचें : कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर दिन में या शाम के समय ना सोएं. यदि कोई व्यक्ति बीमार है वृद्ध है या कोई स्त्री गर्भवती है तो वह दिन में या शाम को सो सकते हैं लेकिन स्वस्थ व्यक्ति शाम को ना सोएं.

धार्मिक स्‍थलों का गढ़ कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में पूरे साल भक्‍तों का डेरा रहता है। यहां पर काफी अद्भुत शक्‍ित वाले मंदिर जो हैं। जिनमें से ही एक मंदिर शक्तिपीठ भलेई है। इस मंदिर में अगर मां की मूर्ति पर पसीना आ जाए तो समझो भक्‍तों की मन्‍नत पूरी हो गई। आइए जानें इस मंदिर के बारे में... मूर्ति पर पसीना देवभूमि हिमाचल प्रदेश में चंबा जिलेसे लगभग 40 कि.मी. दूर पर शक्तिपीठ भलेई माता का मंदिर स्थित है। यह मंदिर बड़ा शक्‍ितशाली माना जाता है। नवरात्रों के अवसर पर श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ होती है। यहां पर मंदिर को लेकर एक बात जो कही जाती है वह यह है कि अगर मां की मूर्ति पर पसीना आ जाए तो समझो भक्‍तों की मुराद पूरी हो गई है। घंटों इंतजार करते ऐसे में यहां पर भक्‍त मां की मूर्ति पर पसीना आने का घंटों इंतजार किया करते हैं क्‍योंकि पसीने के समय जितने भक्‍त मौजूद होते हैं उन सबकी मुराद पूरी हो जाती है। कहा जाता है कि यह मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। माता रानी को यहां पर भलेई को जागती ज्योत के नाम से भी पुकारते हैं। यहां पर पूरे साल ही भक्‍तों का आना जाना लगा रहता है। जगह पसंद आई वहीं इस मंदिर के स्‍थापना के बीच कहा जाता है कि भ्राण नामक स्थान पर एक बावड़ी में यह माता प्रकट हुई थीं। उस समय उन्‍होंने चंबा के राजा प्रताप सिंह को सपने में दर्शन देकर उन्‍हें चंबा में स्‍थापित करने का आदेश दिया था। ऐसे में जब राजा उन्‍हें लेकर जा रहे थे तो उन्‍हें भलेई का स्‍थान पसंद आ गया। इस पर माता ने पुन: राजा को स्‍वप्‍न में वहीं भलेई में स्‍थापित करने को कहा। प्रवेश करने लगीं इसके बाद राजा ने उन्‍हें उसी स्‍थान पर स्‍थापित कराकर माता की आज्ञानुसार एक मंदिर बनवा दिया था। हालांकि कुछ दिन तो इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन बाद में वह भी अंदर प्रवेश करने लगी। आज इस मंदिर में देश के कोने-कोने से बड़ी संख्‍या में भक्‍तगण जाते हैं। इतना ही नहीं माता रानी उनकी मुरादें पूरी भी करती हैं।

बक्सर [गिरधारी अग्रवाल]। 'रामायण सर्किट' बनाकर पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की बात होती है तो इसके लिए बक्सर का नाम सबसे पहले आता है। इस नगरी में श्रीराम के आस्था की परंपरा हजारों साल पुरानी है। रामलीला की जीवंत शुरुआत यहीं सवा सौ साल पहले हुई थी। आयोजन अब हर जगह होने लगा है। लेकिन प्रभु श्रीराम की जीवनी को रामलीला के माध्यम से देखनेवालों को यह जानना चाहिए कि अस्त्र-शस्त्र की विद्या अर्जित करने के बाद सीता स्वयंवर में भाग लेने भगवान यहीं से गुरु विश्वामित्र के साथ जनकधाम गए थे। प्रभु श्रीराम की स्मृतियों को समेटे विश्वामित्र की नगरी में दुर्गोत्सव पर श्रीराम और मां भगवती की वंदना दोनों चरम पर है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र की यह तपोभूमि है। यही वह जगह है जहां श्रीराम व लक्ष्मण ने शस्त्र की शिक्षा ग्रहण कर राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार किया था। कई नाम से वर्णित नगरी पुराणों में सिद्ध भूमि बक्सर के कई नाम वर्णित हैं। जैसे सिद्धाश्रम, व्याघ्रसर, वेदगर्भापुरी, वामनाश्रम व बगसर और अब बक्सर...। धार्मिक आख्यानों के मुताबिक महर्षि विश्वामित्र अपने दोनों शिष्य राम-लक्ष्मण संग यहीं रामरेखा घाट से गंगा पार कर राजा जनक के दरबार में पहुंचे थे और सीता स्वयंवर में भाग लिया था। तब, यज्ञराज साकेत की वरद पुत्री तारिका (ताड़का) का वध भी यहीं हुआ था। यहां रामेश्वर मंदिर में शिवलिंग की स्थापना श्रीराम ने अपने हाथों की थी। सवा सौ साल से रामलीला वयोवृद्ध प्रो.महावीर प्रसाद केसरी का कहना है कि सवा सौ वर्ष पहले रामलीला का आयोजन लोक स्वास्थ्य प्रमंडल कार्यालय परिसर में कराया जाता था। इसके उपरांत व्यवसायियों के सहयोग से इसे श्रीचंद मंदिर के निकट कराया जाने लगा। शनै:-शनै: विस्तार होता चला गया और आज किला का रामलीला मंच भी 'रावण वध' के दिन आस्थावानों की भीड़ को देख छोटा प्रतीत होने लगा है।

नवरात्र माँ दुर्गा नवमं रूप मां सिद्धिदात्री नवरात्रि का नवां दिन मां सिद्धिदात्री का है जिनकी आराधना से व्यक्ति को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है उसे बरे कर्मों से लडऩे की शक्ति मिलती है। मां सिद्धिदात्री की आराधना से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कमल के आसान पर विराजमान मां सिद्धिदात्री के हाथों में कमल, शंख गदा, सुदर्शन चक्र है जो हमें बुरा आचरण छोड़ सदकर्म का मार्ग दिखाता है। आज के दिन मां की आराधना करने से भक्तों को यश, बल व धन की प्राप्ति होती है। मां सिद्धिदात्री का नौंवा स्वरूप हमारे शुभ तत्वों की वृद्धि करते हुए हमें दिव्यता का आभास कराता है। मां की स्तुति हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करती है हमें सत्कर्म करने की प्रेरणा देती है। मां की शक्ति से हमारे भीतर ऐसी शक्ति का संचार होता है जिससे हम तृष्णा व वासनाओं को नियंत्रित करके में सफल रहते हैं तथा जीवन में संतुष्टिi की अनुभूति कराते हैं। मां का दैदीप्यमान स्वरूप हमारी सुषुप्त मानसिक शक्तियों को जागृत करते हुए हमें पर नियंत्रिण करने की शक्ति व सामथ्र्य प्रदान करता है।  आज के दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना हमारी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाए, असंतोष, आलस्य, ईष्र्या, परदोषदर्शन, प्रतिशोध आदि दुर्भावनाओं व दुर्बलताओं का समूल नाश करते हुए सदगुणों का विकास करती है। मां के आर्शीवाद से ही हमारे भीतर सतत क्रियाशीलता उत्पन्न होती है जिससे हम कठिन से कठिन मार्ग पर भी सहजता से आगे बढ़ते जाते हैं। मां दुर्र्गा की नावों शक्तियों का नाम सिद्धिदात्री है ये अष्टसिद्धियां प्रदान करने वाली देवी है देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं शक्ति स्वरूपा देवी की उपासना करके सभी शक्तियां प्राप्त की थीं जिसके प्रभाव से शिव का आधा शरीर स्त्री का हो गया था। शिवजी का यह स्वरूप अर्धनारीश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मां सिद्धिदात्री सिंहवाहिनी, चतुर्भुज तथा सर्वदा प्रसन्नवंदना है। देवी सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल अदि का अर्पण किया जाता है। इस तरह नवरात्र के नवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना करने वाले भक्तों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की होती है। सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का भी स्वरूप कहा जाता है जो श्वेत वस्त्र धारण किए भक्तों का ज्ञान देती है। माँ सिद्धिदात्री का मंत्र :- सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥ सिद्धिदात्री की ध्यान :- वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥ स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥ पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्। कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ :- कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता। नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥ परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते सिद्धिदात्री की कवच :- ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो। हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥ ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो। कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो

बावन शक्ति पीठ 1.हिंगलाज हिंगुला या हिंगलाज शक्तिपीठ जो कराची से 125 किमी उत्तर पूर्व में स्थित है, जहाँ माता का ब्रह्मरंध (सिर) गिरा था। इसकी शक्ति- कोटरी (भैरवी-कोट्टवीशा) है और भैरव को भीमलोचन कहते हैं। 2.शर्कररे (करवीर) पाकिस्तान में कराची के सुक्कर स्टेशन के निकट स्थित है शर्कररे शक्तिपीठ, जहाँ माता की आँख गिरी थी। इसकी शक्ति- महिषासुरमर्दिनी और भैरव को क्रोधिश कहते हैं। 3.सुगंधा- सुनंदा बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है माँ सुगंध, जहाँ माता की नासिका गिरी थी। इसकी शक्ति है सुनंदा और भैरव को त्र्यंबक कहते हैं। 4.कश्मीर- महामाया भारत के कश्मीर में पहलगाँव के निकट माता का कंठ गिरा था। इसकी शक्ति है महामाया और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहते हैं। 5.ज्वालामुखी- सिद्धिदा (अंबिका) भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में माता की जीभ गिरी थी, उसे ज्वालाजी स्थान कहते हैं। इसकी शक्ति है सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव को उन्मत्त कहते हैं। 6.जालंधर- त्रिपुरमालिनी पंजाब के जालंधर में छावनी स्टेशन के निकट देवी तलाब जहाँ माता का बायाँ वक्ष (स्तन) गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुरमालिनी और भैरव को भीषण कहते हैं। 7.वैद्यनाथ- जयदुर्गा झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथधाम जहाँ माता का हृदय गिरा था। इसकी शक्ति है जय दुर्गा और भैरव को वैद्यनाथ कहते हैं। 8.नेपाल- महामाया नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के निकट स्‍थित है गुजरेश्वरी मंदिर जहाँ माता के दोनों घुटने (जानु) गिरे थे। इसकी शक्ति है महशिरा (महामाया) और भैरव को कपाली कहते हैं। 9.मानस- दाक्षायणी तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के मानसा के निकट एक पाषाण शिला पर माता का दायाँ हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है दाक्षायनी और भैरव अमर हैं। 10.विरजा- विरजाक्षेत्र भारतीय प्रदेश उड़ीसा के विराज में उत्कल स्थित जगह पर माता की नाभि गिरी थी। इसकी शक्ति है विमला और भैरव को जगन्नाथ कहते हैं। 11.गंडकी- गंडकी नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान पर स्थित मुक्तिनाथ मंदिर, जहाँ माता का मस्तक या गंडस्थल अर्थात कनपटी गिरी थी। इसकी शक्ति है गण्डकी चण्डी और भैरव चक्रपाणि हैं। 12.बहुला- बहुला (चंडिका) भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल से वर्धमान जिला से 8 किमी दूर कटुआ केतुग्राम के निकट अजेय नदी तट पर स्थित बाहुल स्थान पर माता का बायाँ हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है देवी बाहुला और भैरव को भीरुक कहते हैं। 13.उज्जयिनी- मांगल्य चंडिका भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल में वर्धमान जिले से 16 किमी गुस्कुर स्टेशन से उज्जय‍िनी नामक स्थान पर माता की दायीं कलाई गिरी थी। इसकी शक्ति है मंगल चंद्रिका और भैरव को कपिलांबर कहते हैं। 14.त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गाँव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर माता का दायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुर सुंदरी और भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं। 15.चट्टल - भवानी बांग्लादेश में चिट्टागौंग (चटगाँव) जिला के सीताकुंड स्टेशन के निकट ‍चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर छत्राल (चट्टल या चहल) में माता की दायीं भुजा गिरी थी। इसकी शक्ति भवानी है और भैरव को चंद्रशेखर कहते हैं। 16.त्रिस्रोता- भ्रामरी भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के बोडा मंडल के सालबाढ़ी ग्राम स्‍थित त्रिस्रोत स्थान पर माता का बायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव को अंबर और भैरवेश्वर कहते हैं। 17.कामगिरि- कामाख्‍या भारतीय राज्य असम के गुवाहाटी जिले के कामगिरि क्षेत्र में स्‍थित नीलांचल पर्वत के कामाख्या स्थान पर माता का योनि भाग गिरा था। इसकी शक्ति है कामाख्या और भैरव को उमानंद कहते हैं। 18.प्रयाग- ललिता भारतीय राज्य उत्तरप्रदेश के इलाहबाद शहर (प्रयाग) के संगम तट पर माता की हाथ की अँगुली गिरी थी। इसकी शक्ति है ललिता और भैरव को भव कहते हैं। 19.जयंती- जयंती बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के जयंतीया परगना के भोरभोग गाँव कालाजोर के खासी पर्वत पर जयंती मंदिर जहाँ माता की बायीं जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है जयंती और भैरव को क्रमदीश्वर कहते हैं। 20.युगाद्या- भूतधात्री पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खीरग्राम स्थित जुगाड्‍या (युगाद्या) स्थान पर माता के दाएँ पैर का अँगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है भूतधात्री और भैरव को क्षीर खंडक कहते हैं। 21.कालीपीठ- कालिका कोलकाता के कालीघाट में माता के बाएँ पैर का अँगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है कालिका और भैरव को नकुशील कहते हैं। 22.किरीट- विमला (भुवनेशी) पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद जिला के लालबाग कोर्ट रोड स्टेशन के किरीटकोण ग्राम के पास माता का मुकुट गिरा था। इसकी शक्ति है विमला और भैरव को संवर्त्त कहते हैं। 23.वाराणसी- विशालाक्षी उत्तरप्रदेश के काशी में मणि‍कर्णिक घाट पर माता के कान के मणिजड़ीत कुंडल गिरे थे। इसकी शक्ति है विशालाक्षी‍ मणिकर्णी और भैरव को काल भैरव कहते हैं। 24.कन्याश्रम- सर्वाणी कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था। इसकी शक्ति है सर्वाणी और भैरव को निमिष कहते हैं। 25.कुरुक्षेत्र- सावित्री हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव है स्थाणु। 26.मणिदेविक- गायत्री अजमेर के निकट पुष्कर के मणिबन्ध स्थान के गायत्री पर्वत पर दो मणिबंध गिरे थे। इसकी शक्ति है गायत्री और भैरव को सर्वानंद कहते हैं। 27.श्रीशैल- महालक्ष्मी बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के उत्तर-पूर्व में जैनपुर गाँव के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। इसकी शक्ति है महालक्ष्मी और भैरव को शम्बरानंद कहते हैं। 28.कांची- देवगर्भा पश्चिम बंगाल के बीरभुम जिला के बोलारपुर स्टेशन के उत्तर पूर्व स्थित कोपई नदी तट पर कांची नामक स्थान पर माता की अस्थि गिरी थी। इसकी शक्ति है देवगर्भा और भैरव को रुरु कहते हैं। 29.कालमाधव- देवी काली मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव स्थित शोन नदी तट के पास माता का बायाँ नितंब गिरा था जहाँ एक गुफा है। इसकी शक्ति है काली और भैरव को असितांग कहते हैं। 30.शोणदेश- नर्मदा (शोणाक्षी) मध्यप्रदेश के अमरकंटक स्थित नर्मदा के उद्गम पर शोणदेश स्थान पर माता का दायाँ नितंब गिरा था। इसकी शक्ति है नर्मदा और भैरव को भद्रसेन कहते हैं। 31.रामगिरि- शिवानी उत्तरप्रदेश के झाँसी-मणिकपुर रेलवे स्टेशन चित्रकूट के पास रामगिरि स्थान पर माता का दायाँ वक्ष गिरा था। इसकी शक्ति है शिवानी और भैरव को चंड कहते हैं। 32.वृंदावन- उमा उत्तरप्रदेश के मथुरा के निकट वृंदावन के भूतेश्वर स्थान पर माता के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को भूतेश कहते हैं। 33.शुचि- नारायणी तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहाँ पर माता की ऊपरी दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है नारायणी और भैरव को संहार कहते हैं। 34.पंचसागर- वाराही पंचसागर (अज्ञात स्थान) में माता की निचले दंत (अधोदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है वराही और भैरव को महारुद्र कहते हैं। 35.करतोयातट- अपर्णा बांग्लादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 किमी दूर भवानीपुर गाँव के पार करतोया तट स्थान पर माता की पायल (तल्प) गिरी थी। इसकी शक्ति है अर्पण और भैरव को वामन कहते हैं। 36.श्रीपर्वत- श्रीसुंदरी कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दाएँ पैर की पायल गिरी थी। दूसरी मान्यता अनुसार आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले के श्रीशैलम स्थान पर दक्षिण गुल्फ अर्थात दाएँ पैर की एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है श्रीसुंदरी और भैरव को सुंदरानंद कहते हैं। 37.विभाष- कपालिनी पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी मेदिनीपुर के पास तामलुक स्थित विभाष स्थान पर माता की बायीं एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है कपालिनी (भीमरूप) और भैरव को शर्वानंद कहते हैं। 38.प्रभास- चंद्रभागा गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के निकट वेरावल स्टेशन से 4 किमी प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। इसकी शक्ति है चंद्रभागा और भैरव को वक्रतुंड कहते हैं। 39.भैरवपर्वत- अवंती मध्यप्रदेश के ‍उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है अवंति और भैरव को लम्बकर्ण कहते हैं। 40.जनस्थान- भ्रामरी महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी घाटी स्थित जनस्थान पर माता की ठोड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव है विकृताक्ष। 41.सर्वशैल स्थान आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र स्थित गोदावरी नदी के तट पर कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास सर्वशैल स्थान पर माता के वाम गंड (गाल) गिरे थे। इसकी शक्ति है रा‍किनी और भैरव को वत्सनाभम कहते हैं' 42.गोदावरीतीर : यहाँ माता के दक्षिण गंड गिरे थे। इसकी शक्ति है विश्वेश्वरी और भैरव को दंडपाणि कहते हैं। 43.रत्नावली- कुमारी बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर रत्नावली स्थित रत्नाकर नदी के तट पर माता का दायाँ स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है कुमारी और भैरव को शिव कहते हैं। 44.मिथिला- उमा (महादेवी) भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट मिथिला में माता का बायाँ स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को महोदर कहते हैं। 45.नलहाटी- कालिका तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नलहाटि स्टेशन के निकट नलहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी। इसकी शक्ति है कालिका देवी और भैरव को योगेश कहते हैं। 46.कर्णाट- जयदुर्गा कर्नाट (अज्ञात स्थान) में माता के दोनों कान गिरे थे। इसकी शक्ति है जयदुर्गा और भैरव को अभिरु कहते हैं। 47.वक्रेश्वर- महिषमर्दिनी पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के दुबराजपुर स्टेशन से सात किमी दूर वक्रेश्वर में पापहर नदी के तट पर माता का भ्रूमध्य (मन:) गिरा था। इसकी शक्ति है महिषमर्दिनी और भैरव को वक्रनाथ कहते हैं। 48.यशोर- यशोरेश्वरी बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर स्थान पर माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे। इसकी शक्ति है यशोरेश्वरी और भैरव को चण्ड कहते हैं। 49.अट्टाहास- फुल्लरा पश्चिम बंगला के लाभपुर स्टेशन से दो किमी दूर अट्टहास स्थान पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है फुल्लरा और भैरव को विश्वेश कहते हैं। 50.नंदीपूर- नंदिनी पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सैंथिया रेलवे स्टेशन नंदीपुर स्थित चारदीवारी में बरगद के वृक्ष के समीप माता का गले का हार गिरा था। इसकी शक्ति है नंदिनी और भैरव को नंदिकेश्वर कहते हैं। 51.लंका- इंद्राक्षी श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में माता की पायल गिरी थी (त्रिंकोमाली में प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट)। इसकी शक्ति है इंद्राक्षी और भैरव को राक्षसेश्वर कहते हैं। 52.विराट- अंबिका विराट (अज्ञात स्थान) में पैर की अँगुली गिरी थी। इसकी शक्ति है अंबिका और भैरव को अमृत कहते हैं। नोट : इसके अलावा पटना-गया के इलाके में कहीं मगध शक्तिपीठ माना जाता है.... 53. मगध- सर्वानन्दकरी मगध में दाएँ पैर की जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है सर्वानंदकरी और भैरव को व्योमकेश कहते हैं।

जय माता दी शुभ सन्ध्या वैसे तो साल भर में 4 नवरात्रि पड़ती है । पर सबसे बड़ा महत्व शारदीय नवरात्रि की होती है । इसमे जो 9 दिन भी पूजा पाठ नही कर पाते है या ब्रत नही रख पाते वह भी आज के बाद किसी भी दिन ब्रत रख सकते है जो शुरुआत और अंतिम दिन वह महागौरी का करते है । कल से किसलिये ब्रत करे 8 ऑक्टूबर् शक्ति व सामाजिक प्रतिष्ठा , राजयोग प्राप्ति , के लिए जो ब्रत न रख सके या रखे भी किसी गरीब परिवार की लड़की को आर्थिक , मदद करे श्वेत पुष्प , श्वेत धातु का दान और प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति की पूजा विशेष फलदायी होती है । 9 ऑक्टूबर् परिवार की बृद्धि , परिवार की आने वाली सात पीढ़िया तक अकाल मृत्यु से छुटकारा । वैवाहिक सम्बंध सुदृण के लिये करे ब्रत पीला बस्त्र , पीला फूल , पीला धातु का समर्थ के अनुसार दान दे रात्रि जागरण करे और कहि गुप्त दान दे 10 ऑक्टूबर् करजमुक्ति , ब्यवशाय में सफलता , नौकरी में मनवांछित फल के लिये ज्ञान वृद्धि के लिये करे ब्रत तिल से बने मिष्ठान का प्रयोग करे । चांदी की खरीदने और दान देने से आपको विशेष फल मिलता है जो लोग नवरात्रि ब्रत रखते है कलश स्थापना करते है और फिर दिन भर घर बन्द करके बाहर रहते है यह गलत है आप किसी के घर जाओ और वह ब्यक्ति आप को घर पर बिठा दे और खुद बाहर निकल जाये तो आपको कितना बुरा लगेगा और आते ही आप वहा से वापस आ जायेगे । कलश में नवदिन के लिये आप जगत जननी को बुलाकर फिर क्यों ऐसा क्यों करते है कोई भी बड़ा कार्य हो करे काम ब्रत की वजह से न रोके लेकिन यह याद रखे की जगत माता आपके घर कलश रूप में विराजमान है इसलिये आपका उनके प्रति सम्मान भी मनसा पूजा में होता है या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेनु संस्थिता नमस्तषयै नमस्तषयै नमो नमः माता जगत जननी आपको विश्व भी दे सकती है । पर मांगते वक़्त विशालता का परिचय दे क्योंकि जिंदगी में एक बार ही अवसर आता है की माता आपको समुन्द्र देने को खडी हो और आप चमच्च आगे करके अपने सौभाग्य से दूर हो गए । जय माता दी बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मन्दिर निर्माण मुहीम अयोध्या

शास्त्रों के अनुसार झाड़ू को धन की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक मानते हुए झाडू़ को उचित और साफ -सुथरी जगह पर रखने को कहा गया है। कहते हैं कि नियमित रूप से प्रात: और सायं काल में घर और कार्यस्थल की झाडृू से सफाई करने से स्वच्छता के साथ धन की प्राप्ति भी होती है। यही वजह है कि सुबह झाडू़ लगाने की परंपरा घरों में है। जिन घरों में नियमित रूप से झाड़ू नहीं लगाई जाती, वहां दरिद्रता निवास करती है। झाडू़ को महालक्ष्मीजी का प्रतीक मानने वालों के अनुसार, झाडू़ को कभी पैर नहीं लगाने चाहिए। झाड़ू का उपयोग पूरा होने के बाद उसे किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए, जहां इस पर किसी की नजर न पड़े। ऐसे करें झाड़ू का सम्मान...मान्यता है कि अपवित्र, गंदे और पानी वाले स्थान पर झाड़ू को नहीं रखना चाहिए। दीवार के सहारे भी झाड़ू को खड़ी नहीं रखते। घर, दुकान या कार्यस्थल आदि की सफाई में काम आने वाले झाडू़ से भूल कर भी सड़क, नाली या मल-मूत्र की सफाई नहीं करनी चाहिए। घर के किसी सदस्य या मेहमान के जाने के तुरंत बाद झाड़ू लगाना अशुभ माना जाता है। घर के मुख्य दरवाजा के पीछे एक छोटी झाड़ू टांगकर रखना चाहिए। इससे घर में लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। वास्तु अनुसार, पूजा घर को साफ करने के लिए एक अलग से साफ कपड़े को रखें। झाड़ू के मान-सम्मान से घटती-बढ़ती हैं घर की आमदनी..वास्तु की मान्यता है कि घर के कचरे में कई प्रकार की नकारात्मक शक्तियां विद्यमान होती हैं, जो घर और वहां रहने वाले सभी सदस्यों पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इसके साथ ही परिवार की सुख-शांति में भी परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं। इनसे निजात पाने के लिए घर को एकदम साफ और स्वच्छ रखने के लिए झाड़ू का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका किसी भी प्रकार से अनादर नहीं होना चाहिए। यदि घर में झाड़ू सबके सामने रखा जाता है, तो कई बार अन्य लोगों के पैर उस पर लगते हैं, जो कि अशुभ है। इससे घर पर बुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़़ता है और धन संबंधी परेशानियां भी बढ़ती हैं। लोगों की नजरों से छुपाकर रखें झाड़ू...इसी वजह से झाड़ू को एक तरफ छुपाकर रखना चाहिए, जहां किसी की नजर ना पहुंच सके। झाड़ू को दरवाजे के पीछे रखना काफी शुभ माना गया है। देवी लक्ष्मी का पूरा सम्मान करने पर ही वे हमारे घर पर कृपा बनाए रखेंगी। शास्त्रों के अनुसार, धन से जुड़ी सभी समस्याओं को दूर करने के लिए धन की देवी महालक्ष्मी की आराधना श्रेष्ठ उपाय है। इसके साथ ही सभी के घर में साफ-सफाई के लिए झाड़ू अवश्य ही होती है। झाड़ू को महालक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, जो गंदगी और धूल मिट्टी में निवास करने वाली दरिद्रता को रोज हमारे घर से बाहर करती है। वास्तु के अनुसार भी ऐसी मान्यता है कि यदि झाड़ू बाहर दिखाई देती है, तो घर में कलह होता है। विद्वानों के अनुसार झाड़ू पर पैर लगने से महालक्ष्मी का अनादर होता है। झाड़ू को लेकर कुछ खास बातें, जिन्हें अपनाएंगे, तो जीवन में कभी धन की नहीं होगी कमी... -झाड़ू को कभी भी खड़ा नहीं रखना चाहिए।-ध्यान रहे झाड़ू पर जाने-अनजाने पैर नहीं लगने चाहिए, इससे महालक्ष्मी का अपमान होता है।-झाड़ू हमेशा साफ रखें , गीला न छोड़ें ।-ज्यादा पुरानी झाड़ू को घर में न रखें।-झााड़ू को कभी घर के बाहर बिखेरकर न फेंकें, झाड़ू को कभी जलाना नहीं चाहिए।-शनिवार को पुरानी झाड़ू बदल देना चाहिए।-सपने मे झाड़ू देखने का मतलब है नुकसान- उत्तर-पूर्व कोने में न झाड़ू रखें, ना ही कूड़ा-करकट। इस दिशा को हमेशा साफ-सुथरा रखें। पूजा घर में झाड़ू की बजाय सफाई के लिए कपड़े का इस्तेमाल करना चाहिए।

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