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Dharm (115)

इन 5 उपायों से करें बृहस्पति देव को प्रसन - =========================== गुरूवार को भगवान बृहस्पति देव की पूजा का विधान माना गया है। इस दिन पूजा करने से धन, विद्या, पुत्र तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। परिवार मे सुख और शांति का समावेश होता है। ज्योतिषों का मानना है कि जिन जातकों के विवाह में बाधाएं उत्पन्न हो रही हो उन्हें गुरूवार का व्रत करना चाहिए। इस दिन बृहस्पतेश्वर महादेव जी की पूजा होती है। दिन में एक समय ही भोजन करें। पीले वस्त्र धारण करें, पीले पुष्पों को धारण करें। भोजन भी चने की दाल का होना चाहिए। नमक नहीं खाना चाहिए। पीले रंग का फूल, चने की दाल, पीले कपड़े और पीले चन्दन से पूजा करनी चाहिए। पूजन के बाद कथा सुननी चाहिए। इस व्रत से बृहस्पति जी खुश होते है तथा धन और विद्या का लाभ होता है। यह व्रत महिलाएं आवश्य करें। व्रत मे केले का पूजन होता है।

जय माता की आज का राशिफल 20/09/2016. मेष (Aries): आज का दिन आपके लिए शुभ हैं। परिवारजन, स्नेहीजन तथा मित्रों के साथ स्नेह-मिलन समारोह में उपस्थित रह सकते हैं। नए कार्य का प्रारंभ करने के लिए उत्साह रहेगा, लेकिन अति उत्साह से हानि न हो इसका ध्यान रखिएगा। शारीरिक तथा मानसिक स्वस्थता का भी ध्यान रखिएगा। आज धनप्राप्ति का योग हैं। वृषभ (Taurus): शारीरिक तथा मानसिक रूप से आज आप व्यग्र रहेंगे। चिंताओं के कारण मानसिक भार रह सकता है, जो कि आपको मानसिक रूप से अस्वस्थ रख सकता है। परिवारजनों के साथ भी मनमुटाव होने का प्रसंग बन सकता है, जिससे घर का वातावरण बिगड़ सकता है। परिश्रम की अपेक्षा सफलता की प्राप्ति कम होने से आर्थिक संकट की चिंता रहेगी। बिना सोचे समझे निर्णय न लेने की सलाह देते हैं। मिथुन (Gemini): व्यापारीवर्ग के लिए आज का दिन शुभफलदायी है। व्यापार में तथा आय में वृद्धि होगी। मित्रों से लाभ होगा। नौकरी में उच्चाधिकारियों की कृपादृष्टि से आपके लिए पदोन्नति भी संभव है। विवाह ईच्छुक व्यक्तियों को जीवनसाथी मिलने का योग है। परिवार में पत्नी और पुत्र से अच्छे समाचार मिलेंगे। कर्क (Cancer): आज का दिन आपके लिए शुभ है। व्यापारियों पर अधिकारी खुश रहेंगे। नौकरी करने वालों के लिए पदोन्नति का योग है। परिवार में मैत्रीपूर्ण वातावरण बना रहेगा। नई साज-सजावट से घर की शोभा में अभिवृद्धि करेंगे। माता से भी लाभ मिलेगा। शारीरिक रूप से स्वस्थ और मानसिक रूप से प्रसन्न रहेंगे। धन और प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। सिंह (Leo): आज का दिन आलस्य तथा थकान में बीतेगा। उग्र स्वभाव में मानसिक रूप से व्यग्रता रहेगी। पेट से सम्बंधित दर्द से परेशानी होगी। सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम अधिक करना पड़े‍गा। संकटजनक विचार, वर्तन और आयोजन से दूर रहिएगा। धार्मिक यात्रा या प्रवास की संभावना है। क्रोध पर संयम बरतिएगा। कन्या (Virgo): खान-पान में विशेषरूप से ध्यान रखने का सलाह देते हैं। आवेश और क्रोध की मात्रा अधिक रहेगी, इसलिए स्वास्थ्य के प्रति ध्यान दीजिएगा। साथ में वाणी पर भी संयम बरतिएगा। अनैतिक कृत्यों से दूर रहिएगा। सरकार-विरोधी प्रवृत्तियों के कारण परेशानी खड़ी न हो इसका ध्यान रखिएगा। खर्च की मात्रा बढ़ेगी। तुला (Libra): आज सांसारिक जीवन का आनंद विशेषरूप से मना सकते हैं। परिवारजनों के साथ सामाजिक हेतु से बाहर जा सकते हैं। छोटे से प्रवास का आयोजन होगा। व्यापारीगण व्यापार में वृद्धि कर सकते हैं। सामाजिक क्षेत्र में आपको सफलता और यश कीर्ति मिलने का भी योग है। आकस्मिक धनलाभ की संभावना है। वृश्चिक (Scorpio): आज का दिन सब तरह से सुखमय बीतेगा। परिवारजनों के साथ आनंदपूर्वक समय बिताएंगे। शारीरिक स्वस्थता तथा मानसिक प्रफुल्लिता का अनुभव होगा। नौकरी करने वालों को साथी-कर्मचारियों का सहयोग मिलेगा। मायके से आपको अच्छे समाचार मिलेंगे। धनलाभ होगा। अधूरे कार्य आज पूरे होंगे। धनु (Sagittarius): आज आप को क्रोध पर संयम बरतने के लिए कहते हैं। पेट सम्बंधित बीमारियों की समस्या रहेगी। किसी भी कार्य में सफलता न मिलने से निराशा आने की संभावना है। साहित्य या अन्य किसी सृजनात्मक कला के प्रति रुचि रहेगी। संतानों के प्रति चिंता रहने से मन में व्यग्रता रहेगी। प्रवास को संभव हो तो टालिएगा। मकर (Capricorn): आज का दिन प्रतिकूलताओं से भरा रहेगा। आज आप में स्फूर्ति का अभाव रहेगा। परिवारजनों के साथ झगड़े-टंटे के अथवा तो निरर्थक चर्चा के प्रसंग बनेंगे। इससे आप का मन व्यथित रह सकता है। अपकीर्ति, अपयश मिलने की संभावना है। निद्रा संपूर्ण न मिलने से आपका स्वास्थ्य बिगड़ेगा। कुंभ (Acquarius): आज आप के मन से चिंता का भार हल्का हो जाएगा और आप मानसिक रूप से प्रफुल्लिता का अनुभव करेंगे। साथ में शारीरिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। पारिवारिक वातावरण आनंदित रहेगा। विशेष कर भाई-बहनों के साथ संबंधों में मधुरता का अनुभव करेंगे। छोटे से प्रवास की भी संभावना है। मीन (Pisces): नकारात्मक विचारों को अपने मन से हटाइएगा। क्रोध और वाणी पर संयम बरतना होगा। किसी से वाद-विवाद या झगड़े-टंटे को संभव हो तो टाल दीजिएगा। खान-पान पर संयम रखिएगा। शारीरिक स्वास्थ्य मध्यम रहेगा। ✍आचार्य. संजय कुमार मिश्र, इलाहाबाद ☎9452014657

चंद्र ग्रहण बचें चंद्र ग्रहण के बुरे प्रभाव से, आज लग रहा है 2016 का अंतिम चंद्र ग्रहण -------------------------------------------------------------------------------------------------- खगोलीय दृष्टि से चंद्र ग्रहण के समय पृथ्वी अपनी धूरी पर भ्रमण करते हुए चंद्रमा व सूर्य के बीच आ जाती है। ऐसी स्थिति में चंद्रमा का पूरा या आधा भाग ढ़क जाता है। इसी को चंद्र ग्रहण कहते हैं। भारतीय राजधानी नई दिल्ली के रेखांश-अक्षांश अनुसार भाद्रपद, पूर्णिमा, शनिवार दिनांक 17.09.16 को मीन राशि और पूर्वाभद्रपद नक्षत्र में चंद्रग्रहण पड़ रहा है। ग्रहण की उपच्छाया से पहला स्पर्श शुक्रवार दिनांक 16.09.16 को रात्री 10 बजकर 27 मिनट और 22 सेकंड पर होगा। चंद्रग्रहण का परमग्रास शनिवार दिनांक 17.09.16 रात 12 बजकर 25 मिनट व 48 सेकंड पर होगा। चंद्रग्रहण का उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श रात 02 बजकर 24 मिनट व 15 सेकंड पर होगा। इसकी अवधि 03 घण्टे 56 मिनट 52 सैकण्ड रहेगी। इस ग्रहण की उपच्छाया आंखों से नहीं दिखाई देगी। अतः भारत में चंद्रग्रहण की छाया व प्रच्छाया मान्य नहीं है अर्थात इसका कोई धार्मिक अस्तित्व नहीं पड़ेगा। यह चंद्रग्रहण आंशिक रूप से यूरोप, दक्ष‍िण अमेरिका, अटलांटिक और अंटार्कटिका में दिखाई देगा। सनातन धर्म में चंद्रग्रहण को अशुभ माना जाता है। सनातन धर्म की मान्यतानुसार चंद्र ग्रहण के समय खान-पान वर्जित माना जाता है। मत्स्य पुराण, भविष्य पुराण व नारद पुराण में चंद्रग्रहण के समय वर्जित बातों का उल्लेख है। चंद्रग्रहण कुंवारों के लिए अशुभ माना जाता है क्योंकि चंद्रमा का संबंध शीतलता व सुंदरता से होता है ग्रहण काल में चंद्रमा उग्र हो जाता है जिसका बुरा असर कुवांरे लड़के-लड़कियों पर पड़ता है अतः श्रापित होने पर जो भी कुंवारा लड़का या लड़की उसे देखता है तो उसकी शादी या तो रूक जाती है या बहुत मुश्किलों से तय होती है। मत्स्य पुराण के अनुसार ग्रहण काल में मंत्र सिद्धि व आराधना का विशिष्ट स्थान है। मान्यतानुसार गर्भवती महिला को ग्रहण के समय बाहर नही निकलना चाहिए । इस काल में राहु व केतु का दुष्प्रभाव बढने से गर्भ मेंं पल रहे बच्चें को कई तरह की समस्याएं हो सकती है व गर्भ मेंं पल रहे बच्चें पर बुरा प्रभाव पड़ता है । मान्यतानुसार इस काल में तेल लगाना, खानपान, बालों मेंं कंघी, ब्रश आदि कार्य वर्जित है । Dr. Meenaakshi Sharma www.astromeenaakshi.com

चन्द्र ग्रहण पूरे भारत मे दृश्य होगा ! 16 सितंबर 2016 भाद्रपद पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्रग्रहण है, यह सारे भारतवर्ष में दिखाई देगा ! ग्रहण प्रारंभ होने का समय : सुक्रवार रात्री 10:24 ग्रहण समाप्त होने का समय : शनिवार रात्री 02:23 ग्रहण पर्वकाल : 04 घंटे नोट : चन्द्रग्रहण का सूतक 16 सितंबर को प्रात: 11 बजे से प्रारंभ हो जायेगा !

पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। पितृ पक्ष का महत्त्व - ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 - वर्ष 2016 में पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं: तारीख दिन श्राद्ध तिथियाँ 16 सितंबर शुक्रवार पूर्णिमा श्राद्ध 17 सितंबर शनिवार प्रतिपदा 18 सितंबर रविवार द्वितीया तिथि 19 सितंबर सोमवार तृतीया - चतुर्थी (एक साथ) 20 सितंबर मंगलवार पंचमी तिथि 21 सितंबर बुधवार षष्ठी तिथि 22 सितंबर गुरुवार सप्तमी तिथि 23 सितंबर शुक्रवार अष्टमी तिथि 24 सितंबर शनिवार नवमी तिथि 25 सितंबर रविवार दशमी तिथि 26 सितंबर सोमवार एकादशी तिथि 27 सितंबर मंगलवार द्वादशी तिथि 28 सितंबर बुधवार त्रयोदशी तिथि 29 सितंबर गुरुवार अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध श्राद्ध क्या है? ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। क्यों जरूरी है श्राद्ध देना? मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। क्या दिया जाता है श्राद्ध में? श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है। श्राद्ध में कौओं का महत्त्व कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध? सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो निम्न हैं: * पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है। * जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई जो यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। * साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है। * जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।..

आपको अंनत चतुर्दशी की हादिर्क वधाई अनंत चतुदर्शी के बारे मे ज्ञानवधर्क जानकारी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन अनंत के रूप में श्री हरि विष्‍णु की पूजा होती है तथा रक्षाबंधन की राखी के समान ही एक अनंत राखी होती है, जो रूई या रेशम के कुंकुम से रंगे धागे होते हैं और उनमें चौदह गांठे होती हैं। ये 14 गांठें, 14 लोक को निरूपित करते हैं इसे अनंत का डोरा भी कहते है और इस धागे को वे लोग अपने हाथ में बांधते हैं, जो इस दिन यानी अनंत चतुदर्शी का व्रत करते हैं। पुरुष इस अनंत धागे को अपने दाएं हाथ में बांधते हैं तथा स्त्रियां इसे अपने बाएं हाथ में धारण करती हैं। अनंत चतुर्दशी का व्रत एक व्यक्तिगत पूजा है, जिसका कोई सामाजिक धार्मिक उत्सव नहीं होता, लेकिन अनन्‍त चतुर्दशी के दिन ही गणपति-विसर्जन का धार्मिक समारोह जरूर होता है जो कि लगातार 10 दिन के गणेश-उत्‍सव का समापन दिवस होता है और इस दिन भगवान गणपति की उस प्रतिमा को किसी बहते जल वाली नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित किया जाता है, जिसे गणेश चतुर्थी को स्‍थापित किया गया होता है और गणपति उत्‍सव के इस अन्तिम दिन को महाराष्‍ट्र में एक बहुत ही बडे उत्‍सव की तरह मनाया जाता है। अनंत चतुर्दशी को भगवान विष्णु का दिन माना जाता है और ऐसी मान्‍यता भी है कि इस दिन व्रत करने वाला व्रती यदि विष्णु सहस्त्र नाम स्त्रोत्र का पाठ भी करे, तो उसकी वांछित मनोकामना की पूर्ति जरूर होती है और भगवान श्री हरि विष्‍णु उस प्रार्थना करने वाले व्रती पर प्रसन्‍न हाेकर उसे सुख, संपदा, धन-धान्य, यश-वैभव, लक्ष्मी, पुत्र आदि सभी प्रकार के सुख प्रदान करते हैं। अनंत चतुर्दशी व्रत सामान्‍यत: नदी-तट पर किया जाना चाहिए और श्री हरि विष्‍णु की लोककथाएं सुननी चाहिए, लेकिन यदि ऐसा संभव न हो, तो उस स्थिति में घर पर स्थापित मंदिर के समक्ष भी श्री हरि विष्‍णु के सहस्‍त्रनामों का पाठ किया जा सकता है तथा श्री हरि विष्‍णु की लोक कथाऐं सुनी जा सकती हैं। अनंत चतुर्दशी पर सामान्‍यत: भगवान कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर से कही गई कौण्डिल्य एवं उसकी स्त्री शीला की कथा भी सुनाई जाती है, जिसके अन्‍तर्गत भगवान कृष्ण का कथन है कि ‘अनंत‘ उनके रूपों में से ही एक रूप है जो कि काल यानी समय का प्रतीक है। इस व्रत के संदर्भ में ये भी कहा जाता है कि यदि कोई व्‍यक्ति इस व्रत को लगातार 14 वर्षों तक नियम से करे, तो उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। भगवान सत्यनारायण के समान ही अनंत देव भी भगवान विष्णु का ही एक नाम है और इसी कारण अक्‍सर इस दिन सत्यनारायण का व्रत और कथा का आयोजन भी किया जाता है तथा सत्‍यनारायण की कथा के साथ ही अनंत देव की कथा भी सुनी-सुनाई जाती है। अनंत चतुर्दशी के व्रत का उल्‍लेख भगवान कृष्‍ण द्वारा महाभारत नाम के पवित्र धार्मिक ग्रंथ में किया गया है, जिसके सबसे पहले इस व्रत को पांडवों ने भगवान कृष्‍ण के कहे अनुसार विधि का पालन करते हुए किया था। घटना ये हुई थी कि एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय के वास्‍तुविज्ञ जो यज्ञ मंडप निर्माण करते थे, वह बहुत ही सुंदर होने के साथ-साथ अद्भुत भी था। महाराज युधिष्ठिर के लिए वास्‍तुविज्ञों ने जो यज्ञ मंडप बनाया था वह इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। यानी जल में स्थल तथा स्थल में जल की भ्रांति होती थी। सरल शब्‍दों में कहें तो जल में देखने पर ऐसा लगता था, मानों वह स्‍थल है और स्‍थल को देखने पर ऐसा लगता था, मानो वह जल है और पर्याप्‍त सावधानी रखने के बावजूद भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे। एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गए और एक जल से भरे तालाब को स्थल समझकर उसमें गिर गए। संयोग से द्रौपदी वहीं थीं और दुर्योधन को इस जल-थल के भ्रम का शिकार होकर तालाब में गिरते देख उन्‍हें हंसी आ गई तथा उन्‍होंने ‘अंधों की संतान अंधी‘ कह कर दुर्योधन का मजाक उडाया, क्‍योंकि दुर्योधन के पिता धृतराष्‍ट्र स्‍वयं जन्‍म के अन्‍धे थे। दुर्योधन, द्रोपदी के इस ताने भरे उपहास से बहुत नाराज हो गया। यह बात उसके हृदय में बाण के समान चुभने लगी अौर अपने इस उपहासच का बदला उसने पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर लिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा जहां पांडव अनेक प्रकार के कष्ट सहते हुए काफी कष्‍टपूर्ण जीवन जी रहे थे। एक दिन भगवान कृष्ण जब उनसे मिलने आए, तो युधिष्ठिर ने उनसे अपने कष्‍टपूर्ण जीवने के बारे में बताया और अपने दु:खों से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने ऊपाय के रूप में उन्‍हें कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’ जब युधिष्ठिर ने इस अनंत चतुर्दश्‍ाी पर किए जाने वाले अनंत भगवान के व्रत का महात्‍मय पूछा, तो इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई जो कि अनंत चतुर्दशी का व्रत करने वाले सभी व्र‍ती को सुनना-सुनाना होता है। ये कथा निम्‍नानुसार है-

=========================== एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा, भगवान आप का सबसे बड़ा भक्त कौन है। भगवान विष्णु नारद के मन की बात समझ गए। उन्होंने कहां, अमुक गांव का अमुक किसान हमारा सबसे प्रिय भक्त है। भगवान विष्णु का उत्तर सुन कर नारद जी को निराशा हुई। वह बोले, भगवान आप का प्रिय भक्त तो मैं भी हूं फिर सबसे प्रिय क्यों नहीं। भगवान विष्णु ने कहा, तुम उस किसान के यहां जाकर उसकी दिन भर की दिनचर्या देख कर मुझे आकर बताओ फिर मैं बताऊंगा। नारद उस विष्णु भक्त किसान के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसान सुबह उठ कर कुछ देर भगवान विष्णु का स्मरण किया फिर रूखी सूखी रोटी खा कर हल बैल लेकर खेत जोतने चला गया। शाम को लौटा तो बैलों को चारा पानी दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए भगवान का नाम लिया और रात को खाना खाकर सो गया। एक दिन उस किसान के घर रह कर नारद जी भगवान विष्णु के पास आए और उसकी आंखों देखी दिनचर्या के बारे में बताया। अंत में नारद ने कहा, प्रभु उसके पास तो आप का नाम लेने का समय भी नहीं है फिर वह आप का सबसे प्रिय भक्त कैसे बन गया। मैं तो दिन रात आप का नाम जपने के सिवाय कोई काम करता ही नहीं फिर भला वह किसान कैसे आप का सबसे प्रिय भक्त बन गया। भगवान विष्णु उस बात को टालते हुए नारद को एक लबालब भरा अमृत कलश देते हुए कहा, देवर्षि तुम इस कलश को लेकर त्रैलोक्य की परिक्रमा करो। लेकिन यह ध्यान रखना कि इसकी एक बूंद भी छलकने न पाए। यदि एक बूंद भी नीचे गिरी तो तुम्हारा अब तक का किया गया सारा पुण्य खत्म हो जाएगा। नारद अमृत कलश लेकर तीनों लोको की यात्रा पर निकल गए और यात्रा पूरी करके वह भगवान विष्णु को कलश देते हुए कहा, प्रभु कलश से एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने पाई। भगवान विष्णु ने कहा- नारद, परिक्रमा के दौरान तुमने कितनी बार मेरा नाम स्मरण किया था। नारद ने कहा, प्रभु परिक्रमा के दौरान तो मेरा ध्यान इस कलश पर केंद्रित था इसलिए एक बार भी आप का स्मरण नहीं कर पाया। भगवान विष्णु ने हंस कर कहा, जब तुम परिक्रमा के दौरान एक बार भी अपना ध्यान कलश से हटा कर मेरा स्मरण नहीं कर सके जब कि वह किसान अपने सभी काम करते हुए भी कम से कम दो बार नियमित रूप से मेरा स्मरण करना नहीं भूलता तो वह सबसे बड़ा भक्त हुआ या आप। सबसे प्रिय भक्त वो होता है जो अपना कर्म करते हुए प्रेम से मेरा श्रद्धापूर्वक स्मरण भी करता है। नारद जी को सबसे प्रिय भक्त होने का अहंकार खत्म हो गया ...!!! =========================== जय श्री हरी सुनील झा " मैथिल "

रामायण और महाभारत की कथाओँ को मिथ कहने वाले लोगों को अब अपने शब्द वापस लेने होंगे। क्यों कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने उस स्थान को खोज निकाला का है जिसका उल्लेख रामायण में पाताल लोक के रूप में है। कहा जाता है कि हनुमानजी ने यहीं से भगवान राम व लक्ष्मण को पातालपुरी के राजा अहिरावण के चंगुल से मुक्त कराया था।

Ahiravana 2
अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा – “मिथ नहीं सत्य हैं राम-रावण और हनुमान”

ये स्थान मध्य अमेरिकी महाद्वीप में पूर्वोत्तर होंडुरास के जंगलों के नीचे दफन है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लाइडर तकनीकी से इस स्थान का 3-डी नक्शा तैयार किया है, जिसमें जमीन की गहराइयों में गदा जैसा हथियार लिये वानर देवता की मूर्ति होने की पुष्टि हुई है।

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अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा – “मिथ नहीं सत्य हैं राम-रावण और हनुमान”
 

स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के निदेशक और वैदिक विज्ञान केन्द्र के प्रभारी प्रो. भरत राज सिंह ने बताया है कि पहले विश्व युद्ध के बाद एक अमेरिकी पायलट ने होंडुरास के जंगलों में कुछ अवशेष देखे थे। अमेरिकी पत्रिका ‘डेली टाइम्स गज़ट’ के मुताबिक इस शहर की पहली जानकारी अमेरिकी खोजकर्ता थिंयोडोर मोर्ड ने 1940 में दी थी। एक अमेरिकी पत्रिका में उसने उस प्राचीन शहर में वानर देवता की पूजा होने की बात भी लिखी थी, लेकिन उसने जगह का खुलासा नहीं किया था। बाद में रहस्यमय तरीके से थियोडोर की मौत हो गई और जगह का रहस्य बरकरार रहा।

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