Dharm

Dharm (99)

भगवान का वास कहाँ है – एक बार भगवान भी बड़ी दुविधा में फस गये क्योंकि लोगो की बढती आस्था और साधना वृति से वो प्रसन्न तो थे लेकिन फिर भी उन्हें उच्च व्यावहरिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि जब भी कोई दुखी होता या मुश्किल में होता वो भगवान के पास भागा भागा आता और उन्हें अपनी परेशानिया दूर करने को कहता | उनके हर समय कुछ न कुछ मांगने की समस्या से दुखी और परेशान होकर उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए सभी देवताओं की बैठक बुलाई और उनसे इस सम्बन्ध में अपनी राय मांगी | भगवान बोले कि ” मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूँ अब न तो मैं कंही शांति पूर्वक रह सकता हूँ और न ही कंही बैठकर ध्यान लगा सकता हूँ | आप लोग कोई ऐसा स्थान बताएं जहाँ मनुष्य कभी न पहुँच पायें |भगवान के विचारों का आदर करते करते देवताओं ने अपने अपने विचार प्रकट किये | गणेश जी बोले आप हिमालय की चोटी पर चले जाएँ |तो भगवांन ने कहा वह स्थान तो मनुष्य की पहुँच में है | उसे वंहा पहुँचने में अधिक समय नहीं लगेगा | इंद्र ने सलाह दी कि किसी महासागर में चले जाएँ | इस पर वरुण देव ने ये सलाह दी कि आप अन्तरिक्ष में चले जाएँ | भगवान ने कहा एक दिन मनुष्य वंहा भी पहुँच जायेगा | भगवान निराश होने लगे अंत: में सूर्यदेव ने कहा भगवान् आप एक काम करें आप मनुष्य के हृदय में बैठ जाएँ इस से मनुष्य हमेशा आपको बाहर ही तलाश करता रहेगा पर यहाँ अपने हृदय में कभी न तलाश करेगा और कुछ ही योग्य लोग होंगे जो आप तक पहुँच पाएंगे इस से आपको कोई परेशानी भी नहीं होगी | सूर्यदेव की बात भगवान को पसंद आई और भगवान उसी दिन मनुष्य के हृदय में बैठ गये उस दिन के बाद से मनुष्य हर बाहरी जगह में भगवान को तलाश कर रहा है लेकिन अपने हृदय में बैठे भगवान को नहीं देख पा रहा है जो उसके भीतर है |

भगवान गणेश का शारीर इन्सान कि तरह है लेकिन उनका मुख हाथी कि तरह है। इस बात को हम सब जानतें हैं लेकिन क्या आप जानतें है जब भगवान शंकर ने गणेश जी को हाथी का सर लगा रहे थे तो उनका असली कटा हुआ सर कहां है। यह सवाल आपके मन में जरुर होगा। लेकिन चलिए हम आपको उस हकीकत से रुबुरु करवातें हैं जिसके बारें में आपने अब तक नही सुना होगा। कहतें हैं कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, वह शिव ने इस गुफा में रख दिया।

उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जहां पर पाताल भुवनेश्वर नामक एक गुफा है। यह गुफा अपने आप में किसी रहस्य से कम नही है। कहतें हैं कि इस गुफा में आज भी कुछ ऐसे सत्य जीवित हैं जो इंसान को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। आपको यकीन नही होगा लेकिन मान्यता है कि इस गुफा में आज भी कहतें हैं कि भगवान गणेश का कटा हुआ सर रखा हुआ है। हर साल इस गुफा में हजारों कि संख्या में लोग दर्शन करने और देखने आते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2016 में जन्माष्टमी 24/25 अगस्त को है।क्योंकि अष्टमी तिथि 24 अगस्त को रात्रि 10 बजकर 17 मिनट पर शुरू होगी व 25 अगस्त को रात्रि 8 बजकर 07 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए हम 24-25 की रात्रि को ही जन्म अष्टमी मना पाएँगे। जो भी लोग पंचांगों के चक्कर में भ्रमित होकर 25 अगस्त की रात्रि को जन्म अष्टमी मनाएँगे वे भूलवश नवमी तिथि में अष्टमी मनाएँगे। ---------------------------------- भगवान श्रीकृष्ण का ५२४३वाँ जन्मोत्सव निशिता पूजा का समय = २४:०१+ से २४:४६+ अवधि = ० घण्टे ४४ मिनट्स मध्यरात्रि का क्षण = २४:२३+ २६th को, पारण का समय = १०:५२ के बाद पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त होगी। पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र का समाप्ति समय = १०:५२ दही हाण्डी - २६th, अगस्त को अष्टमी तिथि प्रारम्भ = २४/अगस्त/२०१६ को २२:१७ बजे अष्टमी तिथि समाप्त = २५/अगस्त/२०१६ को २०:०७ बजे भक्त लोग, जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं। कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल के समय ही लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहो रात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है।जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (१६) चरण सम्मिलित होते हैं। एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी के उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अतः जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है। हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।

हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक एक समयधरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध किया। लेकिन वध करते वक़्त उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी। इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा। इस घटना के बाद ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहाँ एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुँच गए लेकिन किसी कारणवश सावित्री जी समय पर नहीं पहुँच सकी। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुँचने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या ‘गायत्री’ से विवाह कर इस यज्ञ शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।

रक्षाबंधन के पर्व से जुडी कुछ पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां राखी के पर्व की शुरुआत कब से हुई इसकी कोई निश्चित जानकारी तो नहीं है पर पुराणों में इस पर्व से सम्बंधित कुछ कथाएं है जो हम आज आपको बातएंगे। इसके अलावा हम आपको इतिहास की वो अमर कहानी भी बातएंगे जब मेवाड़ की राजपूत रानी कर्णावती द्वारा भेजी गई राखी का मान रखते हुए मुग़ल शासक हुमायूँ ने कर्णावती की और उसके राज्य की रक्षा की थी। लक्ष्मी जी और बलि जब लक्ष्मी जी ने दानवराज बलि के राखी बाँध द्वारपाल बने विष्णु जी को कराया मुक्त* : पुराणों के अनुसार रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का बली को राखी बांधने से जुडा हुआ है। इसके लिए पुराणों में एक कथा है जो इस प्रकार है – जब दानवो के राजा बलि ने अपने सौ यज्ञ पुरे कर लिए तो उन्होंने चाहा कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो, राजा बलि कि इस मनोइच्छा का भान देव इन्द्र को होने पर, देव राज इन्द्र का सिहांसन डोलने लगा। जब देवराज इंद्र को कोई उपाय नहीं सुझा तो वो घबरा कर भगवान विष्णु की शरण में गयें, और बलि की मंशा बताई तथा उन्हें इस समस्या का निदान करने को कहा। देवराज इंद्र की बात सुनकर भगवान विष्णु वामन अवतार ले, ब्राह्माण वेश धर कर, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गयें क्योंकि राजा बलि अपने दिए गए वचन को हर हाल में पूरा करते थे। जब राज बलि ने ब्राह्माण बने श्री विष्णु से कुछ माँगने को कहां तो उन्होंने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। राजा बलि ने उन्हें तीन पग भूमि दान में देते हुए कहां की आप अपने तीन पग नाप ले। वामन रुप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग ओर दुसरे पग में पृ्थ्वी को नाप लिया। अभी तीसरा पैर रखना शेष था। बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने ठिक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि पाताल लोक पहुंच गए। बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर, भगवान विष्णु अत्यन्त खुश हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें। इसके बदले में बलि ने रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया, श्री विष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, राजा बलि का द्वारपाल बनना पडा। जब यह बात लक्ष्मी जी को पता चली तो उन्होंने नारद जी को बुलाया और इस समस्या का समाधान पूछा। नारद जी ने उन्हें उपाय बताया की आप राजा बलि को राखी बाँध कर उन्हें अपना भाई बना ले और उपहार में अपने पति भगवन विष्णु को मांग ले। लक्ष्मी जी ने ऐसा ही किया उन्होंने राजा बलि को राखी बाँध कर अपना भाई बनाया और जब राजा बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहाँ तो उन्होंने अपने पति विष्णु को उपहार में मांग लिया। जिस दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँधी उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी। कहते है की उस दिन से ही राखी का तयौहार मनाया जाने लगा जब इन्द्राणी ने बाँधा देवराज इंद्र को रक्षा सूत्र*: रक्षाबंधन से जुडी सबसे प्राचीन कथा देवराज इंद्र से सम्बंधित है, जिसका की भविष्य पुराण में उल्लेख है। इसके अनुसार एक बार देवताओं और दानवों में कई दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ जिसमे की देवताओं की हार होने लगी, यह सब देखकर देवराज इंद्र बड़े निराश हुए तब इंद्र की पत्नी शचि ने विधान पूर्वक एक रक्षासूत्र तैयार किया और श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ब्राह्मणो द्वारा देवराज इंद्र के हाथ पर बंधवाया जिसके प्रभाव से इंद्र युद्ध में विजयी हुए। तभी से यह “रक्षा बंधन” पर्व ब्राह्मणों के माध्यम से मनाया जाने लगा। आज भी भारत के कई हिस्सों में रक्षा बंधन के पर्व पर ब्राह्मणों से राक्षसूत्र बंधवाने का रिवाज़ है। जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली राजा बली को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं आपको बाँध रहा हुँ, आप अपने वचन से कभी विचलित न होना। महाभारत में द्वौपदी का श्री कृ्ष्ण को राखी बांधना*: रक्षाबंधन से जुड़ा एक प्रसंग महाभारत में भी आता है। महाभारत में कृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस कृष्ण के पास आया तो उस समय कृष्ण की उंगली कट गई भगवान कृष्ण की उंगली से रक्त बहने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साडी़ का किनारा फाड़ कर कृष्ण की उंगली में बांधा था, जिसको लेकर कृष्ण ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था। इसी ऋण को चुकाने के लिए दु:शासन द्वारा चीरहरण करते समय कृष्ण ने द्रौपदी की लाज रखी। तब से ‘रक्षाबंधन’ का पर्व मनाने का चलन चला आ रहा है। जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली राजा बली को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं आपको बाँध रहा हुँ, आप अपने वचन से कभी विचलित न होना *हुमायूं ने की थी रानी कर्णावती की रक्षा* : *महारानी कर्णावती* मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। रानी कर्णावती को जब बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्वसूचना मिली तो वह घबरा गई। रानी कर्णावती, बहादुरशाह से युद्ध कर पाने में असमर्थ थी। अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूं को राखी भेजी थी। हुमायूं ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंच कर बहादुरशाह के विरुद्घ मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्णावती और उसके राज्य की रक्षा की। दरअसल, हुमायूं उस समय बंगाल पर चढ़ाई करने जा रहा था लेकिन रानी के और मेवार की रक्षा के लिए अपने अभियान को बीच में ही छोड़ दिया *रक्षाबन्धन मन्त्र*: *येन बद्धो वली राजा दानवेन्द्रो महाबल*: । *तेन त्वा प्रतिबध्नामि रक्षे माचल माचल* जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली राजा बली को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं आपको बाँध रहा हुँ, आप अपने वचन से कभी विचलित न होना। “कच्चे धागे से बनी पक्की डोर है राखी। प्यार और मिठी शरारतों के साथ, बहन की रक्षा का अधिकार है राखी। जात-पात , भेद-भाव को मिटाती, एकता का पाठ है राखी। भाई-बहन के विश्वास और ज़जबात का पवित्र रूप है राखी।

तिरूपति बालाजी की कहानी

आप जीवन जीने के लिए किन वस्तुओं या बातों को जरुरी मानते हैं. शायद अधिकतर लोगों का जवाब धन-दौलत, परिवार, दोस्त आदि चीजें होंगी लेकिन इन सभी भौतिक वस्तुओं के साथ आपको प्रेम, अपनापन, सम्मान की भी जरुरत होती है. लेकिन जरा सोचिए अगर आपके जीवन में सम्मान न होकर केवल अपमान हो तो. वास्तव में अधिकतर व्यक्ति कुछ ऐसे काम करते हैं जिनके कारण उन्हें अपमान मिलता है. आइए हम आपको बताते हैं गरुण पुराण के अनुसार ऐसा कोई भी काम जिसे आप बेशक साफ नियत से भी करें लेकिन उन्हें करने से हमेशा अपमान ही मिलता है.

दरिद्र होकर दाता होना

जब कोई गरीब व्यक्ति अपनी हैसियत से अधिक दान देता है तो उसे व उसके परिवार को धन से संबंधित अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. यदि ऐसा वह बार-बार करता है तो कई बार स्थिति बहुत ही कठिन हो जाती है.ऐसा कुछ लोग दूसरों को दिखाने के लिए भी करते हैं, लेकिन इस दिखावे में वह यह भूल जाते हैं कि इसके कारण उसके परिवार को परेशानी हो सकती है. इसलिए दान देते समय अपनी आर्थिक स्थिति जरूर देख लेना चाहिए, नहीं तो आगे जाकर अपमान का सामना करना पड़ सकता है.

धनवान होने पर भी कंजूस होना

अगर आपके पास पर्याप्त धन है और फिर भी आप कंजूस हैं तो इसके कारण भी आपको अपमानित होना पड़ सकता है. सोच-समझकर पैसा खर्च करना अच्छी बात है, लेकिन जब ये जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो आप कंजूस की श्रेणी में आ जाते हैं. जिस जगह जितना खर्च करना जरूरी है, उतना तो करना ही चाहिए. अगर आप वहां से भी पैसा बचाने की कोशिश करेंगे तो लोग आपको कंजूस ही समझेंगे. कंजूस लोगों को अपनी इस आदत के कारण कई बार अपमान का सामना करना पड़ता है. इसलिए पैसों का सही उपयोग करें, लेकिन कंजूस न बनें.

पुत्र का आज्ञाकारी न होना

जिस व्यक्ति का पुत्र उसके कहने में नहीं होता, उसे भी परिवार, समाज के सामने अपमानित होना पड़ता है. पुत्र आज्ञाकारी नहीं होगा तो वह अपनी मनमानी करेगा. कई बार ऐसे पुत्र कुछ ऐसा काम कर देते हैं, जिसके कारण न सिर्फ पिता को बल्कि पूरे परिवार व कुटुंब को ही अपमान झेलना पड़ता है. ऐसे एक नहीं कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जहां पुत्र के कारण पिता को अपमानित होना पड़ा जैसे- दुर्योधन के कारण धृतराष्ट्र का राजपाठ ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का ही नाश हो गया. इसलिए कहते हैं कि पुत्र आज्ञाकारी हो तो इससे बड़ा सुख दुनिया में और कोई नहीं है. और यदि पुत्र अपने पिता की बात नहीं मानता तो इससे बड़ा कोई दुख नहीं है.

 

दुष्ट लोगों की सेवा करना

जो लोग दुष्ट यानी बुरे काम करने वाले लोगों के साथ रहते हैं व उनकी सेवा करते हैं अर्थात उनकी बात मानते हैं, ऐसे लोगों को भी अपने जीवन में कभी न कभी अपमानित जरूर होना पड़ता है. जो लोग बुरे काम करते हैं, वे हमेशा अपने निजी स्वार्थ के बारे में सोचते हैं. जरूरत पड़ने पर वह अपने साथी को भी बलि का बकरा बना सकते हैं. जिस दिन इन लोगों की सच्चाई सामने आती हैं इनके परिवार वालों की भी शर्मिंदा होना पड़ता है. उनके साथ-साथ ऐसे लोगों के साथ रहने वाले लोगों भी अपमानित होना पड़ता है. इसलिए बुरे काम करने वाले लोगों से दूर रहने में भलाई है.

 

किसी का अहित करते हुए मृत्यु होना

अगर किसी का नुकसान करते हुए आपकी मौत हो जाती है तो ये भी अपमान का कारण है. हालांकि मृत्यु के बाद मान-अपमान का कोई महत्व नहीं रह जाता, लेकिन आपकी सालों से कमाई इज्जत पर इसका असर जरूर पड़ता है. आपके परिवार व आने वाली पीढ़ियों को भी आपके द्वारा किए गए इस काम के कारण शर्मिंदा होना पड़ सकता है. इसलिए कभी भी किसी का नुकसान नहीं करना चाहिए, यहां तक कि सोचना भी नहीं चाहिए

 

साभार : जागरण 

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