Dharm

Dharm (103)

!!*******!! जन्माष्टमी पर्व 2016 !!*******!! जन्माष्टमी यानि भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिन का त्यौहार ” 25 अगस्त 2016 ” गुरुवार को मनाया जायेगा। इस वर्ष भगवान श्री कृष्ण का “5243 वां” जन्म दिन है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथी के दिन रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु के 8वें अवतार श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। इसी ख़ुशी में हर साल जन्माष्टमी हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। जन्मा ्टमी को श्रीकृष्ण जयंती और गोकुल अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। जन्माष्टमी का त्यौहार कैसे मनाते है *************** जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को फूल , लाईटिंग आदि से सजाया जाता है। मंदिर में कई प्रकार की झांकिया बनाई जाती है। लोग इस दिन व्रत और उपवास करके बड़ी बेसब्री से उस क्षण का इंतजार करते है जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था यानि मध्य रात्रि रात के बारह बजे। इस इंतजार में लोग भजन गाते है , श्री कृष्ण की लीला आदि सुनी व सुनाई जाती है , श्रीकृष्ण को प्रिय रास आदि नृत्य किये जाते है । जैसे ही बारह बजते है,लोग खुशियाँ मनाते है। “हाथी घोड़ा पालकी , जय कन्हैया लाल की” , “नन्द के घर आनंद भयो , जय कन्हैया लाल की ” , ” बृज में आनंद भयो , जय यशोदा लाल की ” जैसे शब्दों से घर व मंदिर गूंजने लगते है। लोग एक दूसरे को कृष्ण जन्म की बधाइयाँ देते है। जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण की पूजा ************** श्री कृष्ण के अवतरित होने के बाद भगवान का अभिषेक किया जाता है। मंदिरों और घरों में भक्ति भाव के पूजा की जाती है। पूजा निशित काल में किया जाना श्रेष्ठ माना जाता है। इस वर्ष निशीत का समय ” 11 :58 से 12 :44 ” तक है। इस समय में पूजा कर लेनी चाहिए। पूजा के लिए श्रीकृष्ण को पंचामृत आदि से स्नान कराया जाता है , नए वस्त्र पहनाए जाते है। सुगंध , पुष्प , फल , मिष्ठान आदि अर्पित किये जाते है। श्रीकृष्ण को प्रिय माखन मिश्री ,पंजीरी , फल आदि का भोग लगाया जाता है। दीपक जला कर आरती की जाती है। मंदिरों में प्रसाद आदि वितरित किये जाते है। नंदोत्सव ********** जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव मनाया जाता है जिसमे छोटे बच्चों की प्रिय वस्तुएं उछाल उछाल कर खुशियां मनाई जाती है। जिसमे टॉफियां बिस्किट , खिलोने , गुब्बारे , फूल , भगवान की पोशाक , बांसुरी , मालाएं , मोर पंख , बर्तन , फल , सिक्के आदि उछालते है। इन वस्तुओं को भक्त लोग श्रद्धा से प्रसाद के रूप में पाकर बड़े प्रसन्न होते है। इस दिन भजन आदि गाए जाते है। महिलाएं नृत्य आदि करके हर्ष का वातावरण बना देती है। एक दूसरे को बधाइयाँ दी जाती है। इसके साथ ही प्रसाद वितरित किया जाता है। जन्माष्टमी का व्रत खोलने का तरीका ********** जन्माष्टमी के दूसरे दिन सूर्योदय के बाद ही व्रत खोला जाता है। इस वर्ष यानि 2016 में व्रत खोलने ( पारणा ) समय 26 अगस्त सुबह 10:52 के बाद। क्योंकि अष्टमी तिथि तो सूर्योदय के पहले समाप्त हो जाएगी लेकिन रोहिणी नक्षत्र 10:52 तक रहेगा। कुछ लोग जब तक अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों समाप्त नहीं होते तब तक व्रत नहीं खोलते। कुछ लोग दोनों में से किसी एक के समाप्त होने पर व्रत खोल लेते है।

भगवान का वास कहाँ है – एक बार भगवान भी बड़ी दुविधा में फस गये क्योंकि लोगो की बढती आस्था और साधना वृति से वो प्रसन्न तो थे लेकिन फिर भी उन्हें उच्च व्यावहरिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि जब भी कोई दुखी होता या मुश्किल में होता वो भगवान के पास भागा भागा आता और उन्हें अपनी परेशानिया दूर करने को कहता | उनके हर समय कुछ न कुछ मांगने की समस्या से दुखी और परेशान होकर उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए सभी देवताओं की बैठक बुलाई और उनसे इस सम्बन्ध में अपनी राय मांगी | भगवान बोले कि ” मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूँ अब न तो मैं कंही शांति पूर्वक रह सकता हूँ और न ही कंही बैठकर ध्यान लगा सकता हूँ | आप लोग कोई ऐसा स्थान बताएं जहाँ मनुष्य कभी न पहुँच पायें |भगवान के विचारों का आदर करते करते देवताओं ने अपने अपने विचार प्रकट किये | गणेश जी बोले आप हिमालय की चोटी पर चले जाएँ |तो भगवांन ने कहा वह स्थान तो मनुष्य की पहुँच में है | उसे वंहा पहुँचने में अधिक समय नहीं लगेगा | इंद्र ने सलाह दी कि किसी महासागर में चले जाएँ | इस पर वरुण देव ने ये सलाह दी कि आप अन्तरिक्ष में चले जाएँ | भगवान ने कहा एक दिन मनुष्य वंहा भी पहुँच जायेगा | भगवान निराश होने लगे अंत: में सूर्यदेव ने कहा भगवान् आप एक काम करें आप मनुष्य के हृदय में बैठ जाएँ इस से मनुष्य हमेशा आपको बाहर ही तलाश करता रहेगा पर यहाँ अपने हृदय में कभी न तलाश करेगा और कुछ ही योग्य लोग होंगे जो आप तक पहुँच पाएंगे इस से आपको कोई परेशानी भी नहीं होगी | सूर्यदेव की बात भगवान को पसंद आई और भगवान उसी दिन मनुष्य के हृदय में बैठ गये उस दिन के बाद से मनुष्य हर बाहरी जगह में भगवान को तलाश कर रहा है लेकिन अपने हृदय में बैठे भगवान को नहीं देख पा रहा है जो उसके भीतर है |

भगवान गणेश का शारीर इन्सान कि तरह है लेकिन उनका मुख हाथी कि तरह है। इस बात को हम सब जानतें हैं लेकिन क्या आप जानतें है जब भगवान शंकर ने गणेश जी को हाथी का सर लगा रहे थे तो उनका असली कटा हुआ सर कहां है। यह सवाल आपके मन में जरुर होगा। लेकिन चलिए हम आपको उस हकीकत से रुबुरु करवातें हैं जिसके बारें में आपने अब तक नही सुना होगा। कहतें हैं कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, वह शिव ने इस गुफा में रख दिया।

उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जहां पर पाताल भुवनेश्वर नामक एक गुफा है। यह गुफा अपने आप में किसी रहस्य से कम नही है। कहतें हैं कि इस गुफा में आज भी कुछ ऐसे सत्य जीवित हैं जो इंसान को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। आपको यकीन नही होगा लेकिन मान्यता है कि इस गुफा में आज भी कहतें हैं कि भगवान गणेश का कटा हुआ सर रखा हुआ है। हर साल इस गुफा में हजारों कि संख्या में लोग दर्शन करने और देखने आते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2016 में जन्माष्टमी 24/25 अगस्त को है।क्योंकि अष्टमी तिथि 24 अगस्त को रात्रि 10 बजकर 17 मिनट पर शुरू होगी व 25 अगस्त को रात्रि 8 बजकर 07 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए हम 24-25 की रात्रि को ही जन्म अष्टमी मना पाएँगे। जो भी लोग पंचांगों के चक्कर में भ्रमित होकर 25 अगस्त की रात्रि को जन्म अष्टमी मनाएँगे वे भूलवश नवमी तिथि में अष्टमी मनाएँगे। ---------------------------------- भगवान श्रीकृष्ण का ५२४३वाँ जन्मोत्सव निशिता पूजा का समय = २४:०१+ से २४:४६+ अवधि = ० घण्टे ४४ मिनट्स मध्यरात्रि का क्षण = २४:२३+ २६th को, पारण का समय = १०:५२ के बाद पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त होगी। पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र का समाप्ति समय = १०:५२ दही हाण्डी - २६th, अगस्त को अष्टमी तिथि प्रारम्भ = २४/अगस्त/२०१६ को २२:१७ बजे अष्टमी तिथि समाप्त = २५/अगस्त/२०१६ को २०:०७ बजे भक्त लोग, जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं। कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल के समय ही लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहो रात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है।जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (१६) चरण सम्मिलित होते हैं। एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी के उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अतः जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है। हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।

हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक एक समयधरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध किया। लेकिन वध करते वक़्त उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी। इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा। इस घटना के बाद ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहाँ एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुँच गए लेकिन किसी कारणवश सावित्री जी समय पर नहीं पहुँच सकी। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुँचने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या ‘गायत्री’ से विवाह कर इस यज्ञ शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।

Page 6 of 9

Media News

  • Bollywood
  • Life Style
  • Trending
  • +18
Post by श्वेताभ रंजन राय
- Mar 26, 2017
जिस दिन कपिल शर्मा ने दुनिया के सामने अपने प्यार का इजहार किया उसी दिन दुनिया ने कपिल का वह अहंकारी रूप भी देखा। जिसे ...
Post by Source
- Mar 26, 2017
अक्सर गृहणियों की आदात होती है कि वह आटा बच जाने पर उसे फ्रिज में रख देती है ताकि बाद में उपयोग कर ...
Post by श्वेताभ रंजन राय
- Mar 26, 2017
अनुशासन हीनता के आरोप में निलंबित हुए आईपीएस अफसर हिमांशु कुमार की पत्नी ने भी उनपर गंभीर आरोप लगाए हैं। हिमांशु कुमार ...
Post by Source
- Mar 26, 2017
पुरूष-महिला के रिश्ते के दौरान संभोग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका आनंद हर कोई उठाना चाहता है। लेकिन इससे होने वाले दर्द की ...

Living and Entertainment

Newsletter

Quas mattis tenetur illo suscipit, eleifend praesentium impedit!
Top
We use cookies to improve our website. By continuing to use this website, you are giving consent to cookies being used. More details…