Dharm

Dharm (104)

जानिये क्यों हराम है इस्लाम में ब्याज़ख़ोरी ?

रक्षा बंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, जो इस साल 18 अगस्त गुरुवार को है। वैसे तो पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 17 अगस्त 2016 को हो रही है लेकिन भद्रा व्याप्ति रहेगी। यही वजह है कि शास्त्र अनुसार यह त्योहार 18 अगस्त को सुबह 5:55 से दोपहर 2.56 तक या दोपहर 1:42 से 2:56 तक मनाया जा सकता है अपराह्न का समय रक्षा बंधन के लिये अधिक उपयुक्त माना जाता है जो कि हिन्दु समय गणना के अनुसार दोपहर के बाद का समय है। यदि अपराह्न का समय भद्रा आदि की वजह से उपयुक्त नहीं है तो प्रदोष काल का समय भी रक्षा बंधन के संस्कार के लिये उपयुक्त माना जाता है। भद्रा का समय रक्षा बंधन के लिये निषिद्ध माना जाता है। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार सभी शुभ कार्यों के लिए भद्रा का त्याग किया जाना चाहिये उत्तर भारत में ज्यादातर परिवारों में सुबह के समय राखी बांधने की परंपरा है जो कि भद्रा व्याप्त होने के कारण अशुभ समय भी हो सकता है। इसीलिये जब प्रातःकाल भद्रा व्याप्त हो तब भद्रा समाप्त होने तक रक्षा बंधन नहीं किया जाना चाहिये।

 एकादशी व्रत 14 अगस्त 2016 रविवार को रखे।

 

उत्तर प्रदेश में सम्भल जिले में आज एक दलित लड़की को आश्रम के नल से पानी पीने से कथित तौर पर रोकने और विरोध करने पर उसके पिता को त्रिशूल से घायल किये जाने का मामला सामने आया है। अपर पुलिस अधीक्षक कमलेश दीक्षित ने यहां बताया कि गिन्नौर थाने के गंगुरा गांव के चरन सिंह जाटव ने आरोप लगाया है कि उसकी 13 वर्षीय बेटी खेत में काम करने के बाद पास में स्थित आश्रम में नल पर पानी पीने गयी थी लेकिन दलित होने की वजह से वहां के बाबा पूरन सिंह ने उसे पानी पीने से मना कर दिया। उन्होंने बताया कि जाटव का यह भी कहना है कि जब उसने अपनी बेटी को पानी पीने से रोके जाने का विरोध किया तो बाबा ने उसे त्रिशूल से प्रहार करके घायल कर दिया। दीक्षित ने बताया क जाटव की तहरीर पर आरोपी बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले की जांच शुरू कर दी गयी है। उत्‍तर प्रदेश के हापुड़ में शनिवार (6 अगस्त) को पांच साल की एक दलित बच्ची से बलात्कार का मामला भी सामने आया था। मिली जानकारी के मुताबिक, लड़की को उसके घर पर सोए होने के दौरान घर से उठा लिया गया था। लड़की जख्मी हालत में एक खेत में पड़ी मिली। उसके प्राइवेट पार्ट पर भी जख्मों के निशान मिले हैं। पुलिस को इस मामले में परिवार के एक करीबी पर शक है। पुलिस उससे पूछताछ भी कर रही है। पुलिस को इस बात का भी शक है कि परिवार वाले सारी बातें उनको बता नहीं रहे हैं।

हरियाली तीज विशेष

===========================

 

ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?

 

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

 

“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।

(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

 

ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।

 

आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

 

ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।

 

आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –

 

धार्मिक महत्व - व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।

 

पौराणिक महत्व - वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

 

व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

 

इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकते हैं।।

“शीश गंग अर्धंग पार्वती….. नंदी भृंगी नृत्य करत है” शिव स्तुति में आये इस भृंगी नाम को आप सब ने जरुर ही सुना होगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार ये एक ऋषि थे जो महादेव के परम भक्त थे किन्तु इनकी भक्ति कुछ ज्यादा ही कट्टर किस्म की थी। कट्टर से तात्पर्य है कि ये भगवान शिव की तो आराधना करते थे किन्तु बाकि भक्तो की भांति माता पार्वती को नहीं पूजते थे।

 

हालांकि उनकी भक्ति पवित्र और अदम्य थी लेकिन वो माता पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या फिर ऐसा भी कह सकते है कि वो माता को कुछ समझते ही नही थे। वैसे ये कोई उनका घमंड नही अपितु शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और नजर ही नही आता था। एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे।

 

ऋषि के इस कृत्य पर माता पार्वती ने ऐतराज प्रकट किया और कहा कि हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते। पर शिव भक्ति की कट्टरता देखिये भृंगी ऋषि ने पार्वती जी को अनसुना कर दिया और भगवान शिव की परिक्रमा लगाने बढे। किन्तु ऐसा देखकर माता पार्वती शिव से सट कर बैठ गई। इस किस्से में और नया मोड़ तब आता है जब भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही।

 

तब भगवान शिव ने माता पार्वती का साथ दिया और संसार में महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का जन्म हुआ। अब भृंगी ऋषि क्या करते किन्तु गुस्से में आकर उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे।

 

ऋषि के इस कृत्य पर आदिशक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी ऋषि को श्राप दिया कि जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तत्काल प्रभाव से तुम्हारी देह छोड़ देगा।

 

हमारी तंत्र साधना कहती है कि मनुष्य को अपने शरीर में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की देन होती है जबकि खून और मांस माता की देन होते है l श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया। भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े भी होने की भी क्षमता खो चुके थे l तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी।

 

हालाँकि तब पार्वती ने द्रवित होकर अपना श्राप वापस लेना चाहा किन्तु अपराध बोध से भृंगी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया l ऋषि को खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके तो भक्त भृंगी के कारण ऐसे हुआ था महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का उदय।

Page 7 of 9

Media News

  • Bollywood
  • Life Style
  • Trending
  • +18
Post by Source
- Mar 29, 2017
कसौटी जिंदगी की एक्ट्रैस श्वेता तिवारी और कॉन्ट्रोवर्सी फेम सोफिया हयात अब आपको एक फिल्म में नजर आएंगी. फिल्म भी ऐसी कि ...
Post by Source
- Mar 29, 2017
मार्च के महीने में ही गर्मी ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। गुजरात के अहमदाबाद में भीषण गर्मी के ...
Post by Source
- Mar 29, 2017
बॉलीवुड अभिनेत्री और पूर्व मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन की छोटी बेटी का एक डांसिंग वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर ...
Post by Source
- Mar 29, 2017
आपमें से ऐसे कितने लोग होंगे जो अपनी बेडरुम या सेक्स लाइफ को लोगों के साथ बेझिझक शेयर कर लेते हैं...?? लेकिन बॉलीवुड ...

Living and Entertainment

Newsletter

Quas mattis tenetur illo suscipit, eleifend praesentium impedit!
Top
We use cookies to improve our website. By continuing to use this website, you are giving consent to cookies being used. More details…