Dharm

Dharm (94)

कबीर के दोहे हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं. हम इन दोहों को किताबों में तो पढ़ते ही हैं, साथ ही इनका इस्तेमाल समाज में कई लोगों को किसी जटिल बात को आसानी से समझाने के लिए करते हैं. कबीर के ये दोहे अपने अंदर ज़िंदगी के उन तमाम अनुभवों को समेटे हुए हैं. जिन्हें पाने के लिए आपको समाज की ठोकरें खाने के साथ-साथ कई किताबें भी पढ़नी पड़ती हैं. कबीर ने समाज को सुधारने और लोगों को धर्म का सही अर्थ समझाने के लिए अपने इन दोहों को गढ़ा था. इन 10 दोहों को पढ़ने के बाद आप कबीर को और जानना चाहेंगे.

1. पहले खुद को सुधारो

2. असली प्यार को पहचानों, दिखावा मत करो

3. अच्छी बातों को ग्रहण करो

4. ऊंच-नीच को छोड़कर व्यक्ति के व्यवहार को देखो

5. दूसरों का मज़ाक मत उड़ाओ 

6. अपनी ज़ुबां पर थोड़ी लगाम रखिए

7. किसी भी चीज़ को ज्यादा करना नुकसानदेह होता है

8. जो आपकी कमियों को बताता है, वही सच्चा दोस्त होता है

9. न किसी से दोस्ती, न किसी से बैर

10. अपनी मेहनत करते रहिए

कबीर ने सही कहा है दोस्तों, अगर हम इन दोहों को अपने जीवन में उतार लें, तो जीना बहुत ही सरल हो जाएगा.

भगवान शिव की भक्ति का महीना सावन शुरू होने वाला है और इस बार सावन कई अदभुत योग लेकर रहा है. ज्योतिषाचार्यों की मानें तो 50 वर्ष बाद सावन में ऐसा योग बन रहा है, जिसमें रोजगार में तरक्की, आय में वृद्धि ज्ञान और कृषि के क्षेत्र में उन्नति की संभावनाएं प्रबल हैं.

इसी के साथ बीमारियों से छुटकारा दिलाने वाले जैसे कई ग्रह परिवर्तन भी इसी महीने में हो रह हैं. सावन में 20 से 18 अगस्त तक कई ग्रह एक स्थान पर रहेंगे और सावन के चारों सोमवार को व्रत और पूजन करने की खास विधि आपको भगवान भोले का आशीर्वाद जरूर दिलाएगी...

20 जुलाई को बुधवार के दिन ही सावन का आगमन प्रतिपदा तिथि और उत्तर आषाढ़ नक्षत्र में होगा.

- सावन का पहला सोमवार: सावन का पहला सोमवार 25 जुलाई को है और यह धृति योग में आएगा. इस दिन शिव की अराधना करने पर जीवन में सभी बाधाएं खत्म

- सावन का दूसरा सोमवार: सावन का दूसरा सोमवार एक अगस्त को वज योग में पड़ेगा. इस योग में शिव स्तुति करने से शक्ति मिलती है और स्वास्थ्य ठीक रहता है.

- सावन का तीसरा सोमवार: सावन का तीसरा सोमवार आठ अगस्त को साद्य योग में आएगा. इस दिन शिव की पूजा करने से कठिन से कठिन काम भी पूर्ण होंगे.

- सावन का चौथा सोमवार: सावन का चौथा सोमवार 15 अगस्त को आयुष्मान योग में आएगा. इस दिन शिव की अराधना करने वाले जातकों की आयु में वृद्धि होती है.

 

।। ॐ  ॐ  ॐ  ॐ ॐ  ॐ  ॐ  ॐ   ॐ ॐ  ॐ।।

 

 

भगवान् जगन्नाथ जी के रथ का संक्षिप्त परिचय

1. रथ का नाम -नंदीघोष रथ

2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -832

3.कुल चक्के -16

4. रथ की ऊंचाई- 45 फीट

5.रथ की लंबाई चौड़ाई - 34 फ़ीट 6 इंच

6.रथ के सारथि का नाम - दारुक

7.रथ के रक्षक का नाम- गरुड़

8. रथ में लगे रस्से का नाम-  शंखचूड़ नागुनी

9.पताके का रंग- त्रैलोक्य मोहिनी

10. रथ के घोड़ो के नाम -वराह,गोवर्धन,कृष्णा,गोपीकृष्णा,नृसिंह,राम,नारायण,त्रिविक्रम,हनुमान,रूद्र ।।

 

 बलभद्र जी के रथ का संक्षिप्त परिचय

1. रथ का नाम -तालध्वज रथ

2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -763

3.कुल चक्के -14

4. रथ की ऊंचाई- 44 फीट

5.रथ की लंबाई चौड़ाई - 33 फ़ीट

6.रथ के सारथि का नाम - मातली

7.रथ के रक्षक का नाम-वासुदेव

8. रथ में लगे रस्से का नाम-  वासुकि नाग

9.पताके का रंग- उन्नानी

10. रथ के घोड़ो के नाम -तीव्र ,घोर,दीर्घाश्रम,स्वर्ण नाभ ।।

 

 सुभद्रा जी के रथ का संक्षिप्त परिचय

1. रथ का नाम - देवदलन रथ

2 कुल काष्ठ खंडो की संख्या -593

3.कुल चक्के -12

4. रथ की ऊंचाई- 43 फीट

5.रथ की लंबाई चौड़ाई - 31 फ़ीट 6 इंच

6.रथ के सारथि का नाम - अर्जुन

7.रथ के रक्षक नाम- जयदुर्गा

8. रथ में लगे रस्से का नाम-  स्वर्णचूड़ नागुनी

9.पताके का रंग- नदंबिका

10. रथ के घोड़ो के नाम -रुचिका,मोचिका, जीत,अपराजिता ।।

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स्कंद पुराण के अनुसार प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन संध्याकाल के समय को "प्रदोष" कहा जाता है और इस दिन शिवजी को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत की कथा निम्न है:

स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।
इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

स्कंदपुराण के अनुसार त्रयोदशी तिथि में सांयकाल को प्रदोष काल कहा जाता है। धर्म, मोक्ष और सुख की प्राप्ति के लिए भक्तों को प्रदोष काल में शिवजी की पूजा करनी चाहिए।

प्रदोष व्रत विधि

प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। इस दिन सूर्यास्त से पहले स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद सायंकाल में विभिन्न पुष्पों, लाल चंदन, हवन और पंचामृत द्वारा भगवान शिवजी की पूजा करनी चाहिए। पूजा के समय एकाग्र रहना चाहिए और शिव-पार्वती का ध्यान करना चाहिए। मान्यता है कि एक वर्ष तक लगातार यह व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते हैं।

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