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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विधानसभा चुनावों में मिली सफलता पर बधाई दी। ह्वाइट हाउस के प्रेस सचिव सीन स्पाइसर ने संवाददाताओं को बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने फोन कर प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपनी भावना प्रकट की।

दोनों के बीच और क्या बातचीत हुई इस बारे में स्पाइसर ने नहीं बताया। ट्रंप की मोदी से बातचीत अमेरिका और भारत के रिश्तों की मजबूती दर्शाता है। हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव में भाजपा को शानदार सफलता मिली है। पांच में से चार राज्यों में भाजपा की सरकार बनी है। नोटबंदी के फैसले के बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव ने एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के जनमत संग्रह का रूप ले लिया था।

काबुलः फर्जी डॉक्टर बनकर ISIS के आतंकियों ने किया अस्पताल पर हमला, 30 मरे* अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में बुधवार को आतंकी हमला हुआ. आतंकियों ने अमेरिकी दूतावास के पास स्थित एक मिलिट्री हॉस्पिटल को निशाना बनाया. हमले में 30 लोगों की मौत की खबर है. अफगानिस्तान की डिफेंस मिनिस्ट्री के मुताबिक, इस हमले में 50 लोग घायल हैं. बताया जा रहा है कि हमलावरों फर्जी डॉक्टर के रूप में आए थे. हमले का जिम्मा ISIS ने लिया है. अफगान सरकार ने क्या कहा? गृह मंत्रालय के प्रवक्ता सेदीकी सिद्दीक का कहना है कि सरदार मोहम्मद दाऊद खान अस्पताल में आतंकवादियों से एनकाउंटर बुधवार सुबह शुरू हुआ. पुलिस विशेष बल ने मोर्चा संभाला. वहां फंसे डॉक्टरों के मुताबिक आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर ग्रेनेड फेंके थे. सुरक्षा बलों और हमलावरों के बीच संघर्ष सैन्य अस्पताल के छठे मंजिल में चल रहा है. सुरक्षा बलों ने अस्पताल के करीब सड़कों में आवाजाही रोक दी है और वहां एंबुलेंस को तैनात कर दिया गया है. कैसे किया हमला? अफगान मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी में सरदार मोहम्मद दाऊद खान अस्पताल के बाहर एक बम धमाका हुआ, जिसके बाद आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी. आतंकियों ने हॉस्पिटल की छठी मंजिल के एक हिस्से पर कब्जा जमा लिया है. अस्पताल के एक डॉक्टर ने बताया कि हमलावरों ने पहले गेट पर धमाका किया और फिर गोलियां दागते हुए अस्पताल के अंदर घुस गए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैन्य अस्पताल को चार आत्मघाती हमलावरों ने निशाना बनाया. एक ने मुख्य द्वार पर खुद को उड़ा लिया, जबकि अन्य चार अस्पताल में घुस गए. प्राप्त सूचना के मुताबित, अस्पताल की तीसरी और चौथी मंजिल पर हमलावरों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ चल रही है. काबुल में नहीं रुक रहे हैं आतंकी हमले काबुल हाल के दिनों में कई आतंकी हमलों का शिकार रहा है. इससे पहले फरवरी महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में हुए आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई थी. हमला उस सड़क पर हुआ जो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अमेरिकी दूतावास की तरफ जाती है. इन धमाकों ने अफगानिस्तान में बढ़ते असुरक्षा के माहौल को फिर जाहिर किया है, जहां अमेरिका समर्थित बल तालिबान विद्रोहियों के साथ अल कायदा और इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों से जूझ रहे हैं.

अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार इस सदी के अंत तक दुनिया में सबसे अधिक आबादी मुसलमानों की हो जाएगी। अभी दुनिया में सर्वाधिक आबादी ईसाइयों की है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार साल 2010 तक दुनिया में मुसलमानों की आबादी करीब 1.6 अरब थी जो दुनिया की कुल आबादी का 23 प्रतिशत हुआ। भले ही इस्लाम अभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म हो लेकिन वो सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार अगर इस्लाम इसी रफ्तार से बढ़ता रहा हो तो इक्कीसवीं सदी के अंत तक वो अनुयायियों की संख्या के मामले में ईसाई धर्म को पीछे छोड़ देगा। इस समय इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार साल 2050 तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी (करीब 30 करोड़) वाला देश बन जाएगा। अभी भारत इस मामले में इंडोनेशिया के बाद दूसरे नंबर पर है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुमान के अनुसार साल 2050 तक यूरोप की मुस्लिम आबादी में करीब 10 प्रतिशत बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं अमेरिका में 2050 तक मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या का 2.1 प्रतिशत हो सकती है। अभी अमेरिका में मुस्लिम आबादी करीब एक प्रतिशत है। मुस्लिम देशों से दूसरे देशों में जाने वाले प्रवासियों की बढ़ती संख्या की वजह से भी अन्य देशों में मुस्लिम आबादी बढ़ेगी। प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों की आबादी बढ़ने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर बाकी धर्मों से ज्यादा है। वैश्विक स्तर पर मुस्लिम महिला के औसतन 3.1 बच्चे होते हैं जबकि बाकी धर्मों का ये औसत 2.3 है। मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा बढ़ने का दूसरा कारण है उनकी युवा आबादी। साल 2010 में मुसलमानों की औसत आयु 23 साल थी। जबकि उसी साल गैर-मुसलमानों की औसत आबादी 30 साल थी। युवा आबादी होने का मतलब है मुसलमानों की बड़ी आबादी या तो बच्चे पैदा कर रहे है या भविष्य में करेगी। सबसे ज्यादा प्रजनन दर और सबसे ज्यादा युवा आबादी के कारण मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ सकती है।

सरकारी बस में जब हम टिकट कराते हैं तो यही सोचते हैं सीट तो मिलना मुश्किल है बस खड़े होने की जगह मिल जाए. क्योंकि वहां सीट कम होती है और यात्री ज्यादा. अगर किसी देश की इंटरनेशनल फ्लाइट ऐसा कर दे तो सुनने में बड़ा अजीब लगेगा... क्योंकि फ्लाइट में उतनी ही सीट होती हैं जितने पैसेंजर. पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) ने पैसेंजर्स को गलियारे में खड़ा करके सफर कराया. लोग कराची से लेकर मदीना तक यानी 3 घंटे तक खड़े रहकर ही सफर किया.  20 जनवरी को एक फ्लाइट PK-743 पाकिस्‍तान से सऊदी अरब जा रही थी. फ्लाइट में सीट फुल होने के बावजूद भी सात अतिरिक्त यात्रियों को विमान में ले जाया गया. सीट नहीं होने पर उन्हें विमान के गलियारे में खड़ा करके पूरा सफर तय करने को मजबूर किया गया. फ्लाइट में पर्याप्त ऑक्सीजन और सेफ्टी डिवाइस भी नहीं थे. 409 यात्रियों की क्षमता वाली इस फ्लाइट में कुल 416 यात्री सवार थे. एक छोटी-सी गलती होने पर सभी यात्रियों को जान भी जा सकती थी. बता दें कि दिसंबर 2016 में पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस का एक विमान पेशावर में क्रैश हो गया था और इस फ्लाइट पर सवार सभी 48 यात्री अपनी जान गवां बैठे थे. ऐसा पहला मामला नहीं है जब PIA ने अजीबोगरीब हरकत की हो. पहले भी इसकी खिल्ली उड़ चुकी है... फ्लाइट में AC न हो तो क्या हाल होगा... सोचकर ही दम घुटने लगता है. पीआईए की फ्लाइट में एसी खराब हुआ तो लोगों की हालत खराब हो गई. कुछ लोगों ने विरोध किया तो सारे लोग कैप्टन पर चढ़ गए और खरीखोटी सुनाई. जिनकी तबीयत खराब हुई उनको कैप्टन के डेक में बिठाया गया. जरा देखिए ये वीडिया...

पाकिस्‍तान में हुए एक विमान हादसे के बाद PIA ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसकी वजह से चौतरफा उसका मजाक उड़ा. दरअसल, भविष्‍य में किसी तरह के अपशकुन से बचने के लिए पाकिस्‍तान इंटरनैशनल एयरलाइंस (पीआईए) के कर्मचारियों ने एटीआर-42 विमान की उड़ान से पहले रनवे पर ही एक काले बकरे की कुर्बानी दी. पीआईए के इस कदम के बाद बकरे की कुर्बानी से जुड़ा फोटो वायरल हो गया और सोशल मीडिया पर लोगों ने उसकी खिंचाई की थी.

कनाडा के टोरंटो से लाहौर जा रही पीआईए की एक उड़ान का मार्ग बदलकर उसे मैनचेस्टर भेजा गया क्योंकि उसका शौचालय जाम हो गया था. अज्ञात मुसाफिरों ने कोई ठोस चीज शौचालय में डाल दी थी. एयरलाइन के प्रवक्ता की ओर से जारी किए गए बयान के मुताबिक, शौचालय एक ही नाली से जुड़े थे जिससे विमान के सारे शौचालय जाम पड़ गए थे.

अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब मुस्लिम बहुल 7 देशों के लोगों पर अमेरिका में प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी किया तो हड़कंप मच गया. इसकी काफी आलोचना भी हुई तो कुछ देशों ने इसे अमेरिका का अंदरूनी मामला बताया. इधर एक मुस्लिम बहुल देश सऊदी अरब ने पिछले 4 महीनों में तकरीबन 39 हजार पाकिस्तानी नागरिकों को अपने देश से निकाल दिया है. सऊदी अरब ने वीजा उल्लंघन के मामलों में महज चार माह के दौरान तकरीबन 39 हजार पाकिस्तानियों को उनके देश वापस भेज दिया. यहां तक कि एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी को आदेश दिया गया है कि पाकिस्तानियों को देश में दाखिल होने की इजाजत देने से पहले उनकी गहन जांच की जाए क्योंकि अंदेशा है कि उनमें से कुछ आईएसआईएस के हमदर्द हो सकते हैं. ट्रंप ने कहा और सऊदी ने कर दिखाया, 39 हजार पाकिस्तानियों को देश से निकाला अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब मुस्लिम बहुल 7 देशों के लोगों पर अमेरिका में प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी किया तो हड़कंप मच गया. इधर एक मुस्लिम बहुल देश सऊदी अरब ने पिछले 4 महीनों में तकरीबन 39 हजार पाकिस्तानी नागरिकों को अपने देश से निकाल दिया है. सऊदी गजट ने सुरक्षा सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया कि रिहायश और कार्य के नियमों के उल्लंघन के मामलों में तकरीबन 39000 पाकिस्तानियों को वापस भेजा गया है. सूत्रों के मुताबिक दाएश के इशारे पर कुछ आतंकवादी कार्रवाइयों में कई पाकिस्तानी नागरिकों की संलिप्तता चिंता का विषय है. सूत्रों ने यह भी बताया कि बहुत से पाकिस्तानी नागरीक नशीली पदार्थों की तस्करी, चोरी, जालसाजी और हिंसा के अपराधों में पकड़े गए हैं. इसके मद्देनजर शूरा काउंसिल की सुरक्षा समिति के अध्यक्ष अब्दुल्ला अल-सदाउन ने सउदी अरब में काम के लिए नियुक्ति से पहले पाकिस्तानियों की गहन जांच का आह्वान किया है. अल-सदाउन ने कहा, 'अफगानिस्तान से नजदीकी की वजह से पाकिस्तान खुद आतंकवाद से पीड़ित है. तालिबान चरमपंथी आंदोलन ने खुद पाकिस्तान में जन्म लिया था.'

मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाकिस्तान में नजरबंद है। हाफिज के संगठन जमात-उद-दावा इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। पाकिस्तानी मीडिया का दावा है कि हाफिज की नजरबंदी के खिलाफ स्थानीय हिंदुओं ने भी प्रदर्शन किया है। - हाफिज के संगठन ने उसकी नजरबंदी को तत्काल खत्म करने की मांग की है। - एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक कराची प्रेस क्लब पर प्रदर्शन में स्थानीय हिंदू भी शामिल हुए हैं। - संगठन के नेता डॉ. मुजामिल कुरैशी ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में हाफिज को नजरबंद किया गया है। - एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक थार, बानो भील हिंदू पंचायत के एक सदस्य ने कहा कि हाफिज भारत या अमेरिका के लिए आतंकवादी होगा। उनके मुताबिक थार के लोगों के लिए हाफिज एक समाजसेवी है।

आपको बजट के बाद आज की सबसे बड़ी ख़बर बताते हैं , पूरा का पूरा मुस्लिम देश कुवैत भी अब ट्रम्प की राह पर चलने लगा है  । ग़ौरतलब है कि कुवैत ने पाँच मुस्लिम देशों के वीज़ा पर बैन लगा दिया है , इससे पहले ट्रम्प द्वारा सात मुस्लिम देशों के वीज़ा पर बैन लगाने के बाद दुनिया भर के मुस्लिमों और तथाकथित बुधिजीवियों ने ट्रम्प की आलोचना की थी । लेकिन  कुवैत के इस फ़ैसले में  अब उनकी हालत ख़राब कर दी है । बता दें कि कुवैत ने जिन पाँच देशों के नागरिकों के अपने देश में आने , घूमने पर बैन लगा दिया है उनके नाम हैं  , सीरिया , इराक़ , ईरान , अफगानिस्तान और ख़ुद को मुस्लिम देशों का दादा समझने वाला पाकिस्तान । पाकिस्तान के लिए तो ये डूब मरने जैसी बात है क्यूँकि ये वीज़ा बैन किसी यूरोपीन देश ने नहीं बल्कि ख़ुद एक मुस्लिम देश ने लगाया है । आगे बता दें कि कुवैत के अधिकारियों ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि उन्होंने इन पाँच मुस्लिम देशों पर बैन अपने देश की सुरक्षा को देखते हुए लगाया है , क्यूँकि इन देशों में आतंक को पनाह दी जा रही है और ये कुवैत की आंतरिक सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है । कुवैत के अनुसार पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकी ग्रूप पूरी तरह एक्टिव हैं और कुवैत कोई भी रिस्क अपने देश को लेकर नहीं लेना चाहता है ।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर भारत का एक बड़ा सही साबित हुआ। कई मुस्लिमों देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगाने के बाद ट्रंप प्रशासन ने एच-वन बी वीजा लेने वाले विदेशी पेशेवरों के वहां आने को हतोत्साहित करने के लिए अहम प्रस्ताव पेश किया है। इसके तहत इस वीजा का फायदा उठाने वाली कंपनियों को अब वीजाधारकों को दोगुनी तनख्वाह देनी होगी। माना जा रहा है कि भारत में सॉफ्टवेयर विकास से जुड़ी कंपनियों के लिए यह बहुत बड़ा धक्का है क्योंकि ज्यादा वेतन देने की वजह से उनकी लागत बढ़ेगी और अब उनके लिए भारतीयों की जगह पर अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देना ज्यादा आसान रहेगा। बहरहाल, भारत ने अमेरिकी सरकार के इस प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति जताई है। लेकिन ट्रंप प्रशासन के रवैये को देखते हुए इसका असर होने की संभावना कम है। अमेरिका की तरफ से हर वर्ष दिए जाने वाले एच-वन बी वीजा का सबसे ज्यादा फायदा भारतीय आइटी कंपनियां ही उठाती हैं। पिछले वर्ष 86 फीसद एच-वन बी वीजा भारतीय कंपनियों के कोटे में आई थी। कई जानकारों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन का यह प्रस्ताव सॉफ्टवेयर विकास से जुड़ी भारतीय आइटी कंपनियों के लिए करारा झटका है। इससे भारत के 150 अरब डॉलर के सॉफ्टवेयर उद्योग की कमर टूट जाने की बात की जा रही है। इस डर से देश के शेयर बाजार में आइटी कंपनियों के शेयर बुरी तरह से लुढ़क गये। यही वजह है कि एक तरफ विदेश मंत्रालय ने इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई है और अमेरिका से भी अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। जबकि आइटी कंपनियों के संगठन नासकॉम ने मामले को बेहद गंभीर बताते हुए अगले कुछ हफ्ते में अपना एक दल अमेरिका भेजने की बात कही है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा है कि, इस बारे में भारत की चिंताओं को अमेरिकी प्रशासन व कांग्रेस को उच्च स्तर पर अवगत करा दिया गया है। यह पिछले दो महीने में दूसरा मौका है जब भारत ने इस विषय में अपनी चिंता जताई है। इसके पहले नवंबर, 2016 में विदेश सचिव एस जयशंकर ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान ट्रंप के सहयोगियों के साथ वार्ता में इस मुद्दे को उठाया था। यह मुद्दा भारत के लिए हमेशा अहम रहा है। पूर्व में पीएम नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच हुई शीर्ष वार्ता में भी यह उठा था। बरहहाल, अब देखना होगा कि अगर ट्रंप इस फैसले को लागू करते हैं तो इसको दोनों देश किस तरह से सुलझाने की कोशिश करते हैं। नासकॉम के अध्यक्ष आर चंद्रशेखर की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि यह प्रस्ताव अमेरिका में पेशेवरों की कमी को दूर करने की कोशिश नहीं करती है बल्कि वहां के उद्योगों के लिए दिक्कतें पैदा करने वाली है। माना जा रहा है कि अमेरिका का यह फैसला भारत की टीसीएस, इंफोसिस जैसी कंपनियों के लिए बहुत बुरा साबित होगा। ये कंपनियां मजबूत होते डॉलर से पहले ही परेशान हैं। इस फैसले से इन कंपनिोयं की वेतन लागत में 60-70 फीसद तक बढोतरी हो सकती हैं। ऐसे में ये ज्यादा प्रतिस्पर्धा नहीं रह पाएंगी।

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