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Public Opinion (302)

जय श्री राम शुभ सोमवार भारत माता की जय ॐ नमः शिवाय अभी अभी सुकमा छतीसगढ़ में सी आर पी एफ के शहीद हुवे 11 जवानों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देश के दूसरे राज्यो में मोदी सरकार आने के बाद नक्सल समस्या लगभग खत्म होने के कगार पर था पर लेकिन काश्मीर में सेना के साथ हो रहे दुरब्याहर से दूसरे हिस्से के देश द्रोहियो को बल मिल रहा है इसलिये केंद्र सरकार को सबसे पहले मुफ़्ती सरकार को बर्खास्त कर तुरन्त राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए और सेना को पूर्ण आजादी हो रही बात दूसरे राज्यो में बीजेपी जीत की तो इसमें सबसे बड़ा योगदान बिपक्ष का है जो देश के बहुसंख्यक आबादी के बजाय सभी की सभी पार्टियां मुस्लिम वोट के पीछे पड़ी है तो बहुसंख्यक आबादी के पास सिर्फ और सिर्फ बीजेपी विकल्प है इसलिये जीत को काश्मीर नीति पर अपनी कामयाबी न देखे क्योकि कभी सेना के अपमान पर हिन्दू समाज बिफर गया तो नुकसान बीजेपी नेतृत्व को ही होगा हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मंदिर निर्माण मुहीम अयोध्या श्री राम मंदिर निर्माण के लिए और हिंदुत्व की आवाज के लिए पेज से जुड़े अपने 10 दोस्तों को अवश्य जोड़े धन्यवाद जय श्री राम हर हर महादेव https://m.facebook.com/Bhimsentripathiji/

जब लिट्टे ने राजीव गांधी को मारा तब राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे लेकिन वकीलों ने इसे कोर्ट में भारत गणराज्य के प्रति किया गया अपराध साबित कर दिया और भारत में से लिट्टे की कमर तोड़ दी गई

नलिनी को पकड़ने के बाद उसके ऊपर जो जो अत्याचार गुजारे गए नलिनी ने खुद अपनी आत्मकथा में अपने ऊपर सीबीआई और एसआईटी द्वारा किए गए भयंकर अत्याचारों के बारे में बताया है जबकि उस दौरान नलिनी गर्भवती थी ।

सीबीआई के अधिकारी तो नलिनी का गर्भपात करवाने ले गए थे लेकिन वहां मौजूद लेडी डॉक्टर ने एक वकील बुलाने और मीडिया बुलाने की धमकी दे दी तब जाकर सीबीआई के अधिकारी वापस आ गए और तीन बार तो नलिनी को मारा हुआ मान लिया गया था ।

तब मानवाधिकारवादी भी चुप थे सुप्रीम कोर्ट भी चुप था क्योंकि लिट्टे ने राजीव गांधी को मारा था जो एक नेता थे और यह नक्सली अब तक हजारों गरीब परिवारों से आने वाले जवानों को मार रहे हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट भी चुप है मानवाधिकारवादी भी चुप है और वामपंथी भी चुप हैं


....बहुत दर्द है माननीय प्रधानमंत्री जी हम सभी के दिलो में
हम जानते हैं कि आपका कलेजा भी फटा रहा होगा इस नृशंस कान्ड को देख कर।

पाकिस्तान वाली वह सर्जिकल स्ट्राइक भी याद हैं हमें..

एक बार फिर कर दीजिए शहीदों के लिए.... दे दीजिए श्रद्धान्जलि.... मगर फूलों और शब्दों के साथ-साथ देश और मानवता के दुश्मनों की छाती से लहू को भी खींचकर....!
नमन वीर शहीदों को....!
नमन हर सैनिक के जज्बे को....!





- पवन सिंह (भाजपा)

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लड़कियों, थोड़ी सी बदल जाओ यार। ये लड़के कितनी हँसी उड़ाते हैं जब डेट पर तुमसे मिलकर आते हैं। पेश है, आपके लिए खास स्मार्ट टिप्स। क्या करें कि आपका ब्वॉयफ्रेंड आपका दीवाना हो जाए और क्या ना करें कि दुम दबा कर भाग जाए :
डोंट चैंज मी यार
लड़कों को सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर आता है कि लड़कियाँ उन्हें बदलने की कोशिश करती है। जब पहली बार उनके साथ हों या अकेले में क्वॉलिटी टाइम बिताएँ तब बात-बात पर मत टोकिए। उन्हें ऐसा न लगें कि आप उनकी टीचर हैं। वे चाहते हैं कि जैसे वे हैं, वैसे ही उन्हें स्वीकार किया जाए। भले ही यह बात वे खुलकर न कह पाएँ।
उफ, कितना कन्फ्यूजन
प्यार करती भी हैं और नहीं भी करती हैं। यह कभी हाँ, कभी ना वाली सिचुएशन लड़कों को इरिटेट करती है। एक बार अगर स्वीकार कर लिया कि दोनों के बीच प्यार-व्यार जैसा कुछ है तो फिर डाइलेमा क्रिएट ना करें। बीच-बीच में यह ना दर्शाएँ कि गलत निर्णय ले लिया है, चलो फिर लौट चलें पीछे। जब डेट पर जाएँ तब पूरे होशोहवास में उसी समय में रहें। यह नहीं कि फ्यूचर की बिना मतलब की चिंता में सारी डेट का सत्यानाश कर बैठें। फ्यूचर की चिंता जरूरी है लेकिन उसके लिए बेचैनी ना जताएँ बल्कि पूरी गंभीरता से सोचें अपने पार्टनर को परखें।

डोंट बी सीरियस यार!
डेट का मतलब, शिकवे-शिकायत, लड़ाई-झगड़ा़ रूठना-मनाना तो कतई नहीं है। बड़ी मुश्किल से आप दोनों अपना समय चुरा कर एक-दूजे से मिलने पहुँचे हैं। अगर एक-दूसरे के विरूद्ध ढेर सारी बातें कहने की हैं भी तो अंदाज सॉफ्ट रखिए। हो सकें तो अपनी बात को कुछ यूँ रखिए कि ‘देखो, उस दिन तुमने जो किया उस पर मुझे कुछ कहना है लेकिन मैं नहीं चाहती कि अपनी डेट खराब हो इसलिए आज उस बात को मैं पेंडिंग रख रही हूँ पर हाँ नेक्स्ट टाइम अगर यह रीपिट हुआ तो शायद डेट पर ही लड़ बैठूँ।’ आपका साथी आपकी इस मासूमियत पर फिदा हो जाएगा।
इस बार इतना ही
एक ही डेट पर जमाने भर की पोटली खोलकर ना बैठ जाएँ। हर डेट के लिए कुछ नया होना चाहिए। अपनी उलझनों को तब ही रखें जब वह आपसे पूछे। उसे सुनिए ज्यादा और बोलिए कम। एकदम चुप्पी भी अच्छी नहीं। पर हाँ, हर बार का डोज डिसाइड होना चाहिए। स्माइल भी बिना मतलब ना खर्च करें संतुलित और संयमित स्माइल का जादू देर तक रहता है। बिना मतलब की हँसी वह झेल तो लेगा लेकिन कहीं ना कहीं आपको लेकर वह शंकित हो सकता है कि आप नकली तो नहीं?

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तीन तलाक की शिकार राष्ट्रीय खिलाड़ी शुमायला की कोई मदद कर पाएंगे मोदी और योगी।
देश के 10 बड़े अखबारों में शामिल पत्रिका के 24 अप्रैल के अंक में प्रथम पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित हुई है। इस खबर में यह बताया गया है कि नेट बॉल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी शुमायला जावेद ने पीएम नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में कहा गया है कि लड़की का जन्म हो जाने की वजह से उसके पति आजम अब्बास ने तलाक दे दिया।

अब वह दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर है। अमरोहा निवासी पीडि़ता ने मोदी और योगी से कहा है कि देश में उनकी जैसी अनेक मुस्लिम महिलाएं हैं जो तीन तलाक की प्रथा से बेहद दु:खी हंै। ऐसी सभी महिलाओं की मदद मोदी और योगी को करनी चाहिए। पत्र में यह भी बताया गया है कि वह नेट बॉल की सात बार की चैम्पियन हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इन दिनों तीन तलाक की प्रथा से पीडि़त सैकड़ों मुस्लिम महिलाएं अपने दर्द को लेकर सामने आ रही हैं। अखबारों और न्यूज चैनलों पर ऐसी खबरों की बाढ़ सी आ गई है।


ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या मुस्लिम समाज को तीन तलाक जैसे गंभीर मुद्दे पर विचार मंथन नहीं करना चाहिए? यह माना कि तीन तलाक मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है, लेकिन जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा सामने आ रही है, उसमें मुस्लिम विद्वानों और धर्म गुरुओं को भी पहल करनी चाहिए। महिला किसी भी समाज अथवा धर्म की हो, लेकिन यदि वह परेशान होती है तो ऐसे समाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र पेश कर तीन तलाक को संविधान के अनुकूल नहीं माना है। इसको लेकर अनेक मुस्लिम संगठन केंद्र सरकार की आलोचना भी कर रहे हैं।



लेकिन जिस तरह से पीडि़त मुस्लिम महिलाएं अब भारतीय संविधान के अनुरूप अदालतों में जा रही हैं, उससे भी मामले की गंभीरता का पता चलता है। मुस्लिम महिलाओं की यह भी शिकायत है कि जब वे अदालत में जाती हैं तो उनके पति किसी मौलाना अथवा मौलवी का तलाकनामा प्रस्तुत कर देते हैं, क्योंकि अदालतें भी ऐसे तलाकनामे को सही मान लेती हैं। इसलिए उन्हें भारतीय संविधान के मुताबिक अपने अधिकार नहीं मिलते हैं। (एस.पी.मित्तल) (24-04-17) नोट: फोटो मेरी वेबसाइट www.spmittal.in https://play.google.com/store/apps/details? id=com.spmittal www.facebook.com/SPMittalblog Blog:- spmittalblogspot.in

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कहते है लड़कियों या महिलाओं को समझना किसी के बस की बात नही।कई तो यह भी कहते है कि इन्हें आज तक कोई नही समझ पाया ।ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी लड़की का मूड कब बदल जाये,इसका अंजादा कोई नही लगा सकता है।
लेकिन बात अगर रिलेशनशिप की आये ,तो लडकिया खुद तब तक आजमंजस में रहती हैं, जब तक उनकी शादी नही हो जाती ।लंदन में गर्ल्स गाइडिंग आर्गेनाईजेशन द्वारा कराये गए सर्वे में किशोरावस्था में चल रही लड़कियो से पूछा गया ,"आपको क्या लगता है ,कितनी उम्र में आपकी शादी हो जाएगी?" तो 48 फीसदी लड़कियो ने कहा 22 से 25 साल की उम्र में,31 फीसदी लडकिया बोली कि 26 से 29 साल की उम्र में उनकी शादी हो जायेगी और 12 फीसदी को लगता है कि उनकी शादी 30 से 34 वर्ष की आयु के बीच होगी ।
इस सर्वे में 2 प्रतिशत लड़किया ऐसी थी , जिन्‍होंने कहा कि उनकी शादी 16 साल से पहले हो जायेगी, जबकि 6 प्रतिशत ने कहा कि 19 से 21 साल के बीच और 2 प्रतिशत ने कहा कि उनकी शादी 35 से 39 वर्ष की आयु के बीच होगी। लड़कियो की कुछ रोचक बातें।
1.लड़कियों को तब बहुत अच्‍छा लगता है, जब वो खुद को स्‍पेशल फील करती हैं, यानी जब उन्‍हें कोई ज्‍यादा तरजीह देता है 2.लड़कियां झूठ बोलना कतई पसंद नहीं करती हैं, खास तौर से रिलेशनशिप के मामलों मे 3.बात करने में लड़कियां लड़कों की तुलना में बहुत आगे होती हैं 4.अगर लड़कियां दु:खी हैं, लेकिन रो नहीं रही हैं, तो इसका मतलब वो दिल में रो रही हैं। 5.लड़कियों को खुद की तारीफ बहुत पसंद होती है, भले ही वो झूठी तारीफ ही क्‍यों न हो। 6.लड़कियों से बात करते वक्‍त अगर आप बहुत ज्‍यादा सीरियस हो गये तो वो बात को खत्‍म कर देती हैं। 7.किसी भी लड़की का व्‍यवहार कैसा होगा, यह आप पहली नजर में कतई नहीं समझ सकते हैं। 8.जब भी सामने वाला ऐसी बात कहता है, जो लड़की के मन की होती है, तो उसे सुनने के बाद लड़की की आंखों में आंसू जरूर आ जाते हैं। 9.लड़कियां इतनी ज्‍यादा संवेदनशील होती हैं कि अगर कोई लड़का कोई बेहद सेंटीमेंटल बात कह दे, तो वह उसे जिंदगी भर नहीं भूलती। 10.लड़कियां अपने क्रश के बारे में दिन भर सपने देखती रहती हैं, लेकिन कभी जाहिर नहीं होने देतीं। 11.लड़कियां अपने पसंदीदा व्‍यक्ति के खिलाफ एक शब्‍द भी सुनना पसंद नहीं करती हैं। 12.लड़कियोंं को अगर उनका नाम लेकर कोई बुलाये तो उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगता है 13. लड़कियां जिससे प्‍यार करती हैं उसके बारे में हर मिनट सोचती रहती हैं। 14.अगर कोई लड़कियों से सलाह मांगे, तो उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगता है। साथ में सलाह देना। 15.अगर कोई भी लड़की स्‍पेशियली आपके लिये कुछ पका कर लाये, तो समझ लीजिये आप उसके लिये बेहद खास हैं।

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सुपर मॉडल इंटरनेशनल 2017 में पार्टीसिपेट कर रही 34 देशों की मॉडल्स बुधवार को ताजमहल पहुंची। यहां सीआईएसएफ के जवानों ने मॉडल्स से 'राम' नाम लिखे दुपट्टे उतरवा लिए। पूछने पर बताया गया कि यह ताजमहल में बैन है। वहीं, जब मीडिया ने सवाल क‍िया कहा गया, 'धर्म से रिलेटेड लिखा हुआ पहनकर जा सकते हैं, लेकिन यह लोग विदेशी हैं और हिंदू धर्म के नहीं हैं, इसलिए इनसे उतरवाया गया है।'

ताजमहल पर बैन है किसी भी तरह का प्रमोशन, फि‍र भी उड़ाई गई नियमों की धज्जि‍यां
इस दौरान मॉडल्स इवेंट का नाम लिखी टी-शर्ट्स पहने थीं और उनके गले में संस्था का नाम लिखे आई-कार्ड्स भी थे, लेकिन उन्हें किसी ने नहीं हटवाया, जबकि ताजमहल पर किसी भी तरह का प्रमोशन बैन है। यही नहीं किसी भी तरह के विडियो शूट और प्रोफेशनल फोटोशूट के लिए बाकायदा फीस जमा कर परमिशन लेनी पड़ती है।

हिंदूवादी नेताओं में आक्रोश
इस मामले में हिंदूवादी नेताओं में आक्रोश है। हिंदू जागरण मंच के प्रदेश महामंत्री अविनाश राणा ने घटना की निंदा करते हुए इसे गलत माना है, उनका कहना है कि हिंदू धर्म सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुंबकम की शैली पर चलता है। अगर किसी की राम नाम में आस्था है तो उसके साथ यह नहीं होना चाहिए।
क्या कहते हैं अधि‍कारी
इस संबंध में सीआईएसएफ के असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट जाकड़ ने बताया, मॉडल्स एक जैसे दुपट्टे अलग से पहने हुए थे, इस वजह से उतरवाया गया था। अगर कई लोग इस तरह रिलिजन का कुछ सिंबल लिखा हुआ पहन के आते हैं तो हम उन्हें उतरवाते हैं, ऐसा आदेश है। टी-शर्ट्स पर उन्होंने कहा कि यह मुमकिन नहीं, क्योंकि जब कोई कंपनी के लोग एक साथ आते हैं तो वो ऐसे ही ड्रेस में आते हैं और उन्हें प्रवेश दिया जाता है।



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तर प्रदेश की कमान अब मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के हाथ में है और उत्‍तर प्रदेश का भविष्‍य अगले पांच सालों में किन-किन रास्‍तों से होकर तैयार होगा, इसका फैसला भी उन्‍हीं को करना है। कहने को उत्‍तर प्रदेश एक राज्‍य है, पर अगर दुनिया के सामने उत्‍तर प्रदेश को रखा जाए तो ये पांचवां सबसे बड़े देश जितना दिखता है और आंकड़ों की इसकी असलियत भी यही बताती है। इसलिए मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को भी उत्‍तर प्रदेश को एक प्रदेश की तरह नहीं बल्कि एक देश की विकसित करने के बारे में सोचना चाहिए। अगर वो ऐसा करने में कामयाब होते हैं तो वास्‍तव में कई चीजों में अभी भी नंबर वन प्रदेश हर बात में नंबर वन बन सकता है। ऐसे ही कुछ प्रमुख विषयों को एक आंकलन के जरिए रख रहे हैं जिसमें सबसे पहले योगी को एक्‍शन लेना होगा जिससे उत्‍तर प्रदेश को उत्‍तम प्रदेश बनाया जा सके।

प्राइवेट शिक्षा के कारोबार पर रोक
शिक्षा का अधिकार कानून को वर्ष 2009 में ही संसद ने पास कर दिया था। पर आज भी सबको मुफ्त और गुणवत्‍ता वाली शिक्षा पाना एक ख्‍वाब सा ही दिखता है। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत प्राइवेट स्‍कूलों में 25 फीसदी सीटों पर गरीबों के बच्‍चों को एडमिशन दिया जाना था। पर प्राइवेट स्‍कूलों ने इन नियमों की खूब धज्जियां उड़ाई और गरीब बच्‍चों को एडमिशन तक नहीं दिया। उत्‍तर प्रदेश की सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मौजूद है जिसमें यह बताया जा सके कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद प्राइवेट स्‍कूलों की 25 फीसदी सीटों पर कितने गरीब बच्‍चों को एडमिशन दिया गया। उन 25 फीसदी सीटों पर किसका एडमिशन हुआ, यह भी नहीं पता चल पाया। सरकारों के नियमों को प्राइवेट स्‍कूलों ने मानने से मना कर दिया।

वहीं दूसरी तरफ सरकारी शिक्षा तंत्र की बदहाली से परेशान जिन अभिभावकों ने अपने बच्‍चों का एडमिशन निजी स्‍कूलों में करवाया वो भी आज स्‍कूलों की तरफ से ली जाने वाली मनमानी फीस से परेशान हैं। एक तरफ जहां सरकारी स्‍कूलों में कम फीस होने के बावजूद अभिभावक अपने बच्‍चों का एडमिशन करवाने से कतराते हैं वहीं प्राइवेट स्‍कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए मजबूरन सिर्फ कक्षा आठ तक के बच्‍चों की फीस के रूप में सालाना लाखों रुपए जमा कर देते हैं। यह दबाव क्‍लास दर क्‍लास बढ़ता जाता है। इसके अलावा निजी कोचिंग, स्‍कूल ड्रेस, किताबों, कॉपियों, ट्रांसपोर्ट समेत कई खर्चे अलग से अभिभावकों को वहन करने पड़ते हैं।

उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ कई दूसरे राज्‍यों से उदाहरण लेकर इस बात को लागू कर सकते हैं कि किस तरह से सरकारी स्‍कूलों को प्राइवेट स्‍कूलों से ज्‍यादा अच्‍छी तरह से विकसित किया जाए। अगर उत्‍तर प्रदेश के शिक्षा तंत्र में प्राइमरी से लेकर माध्‍यामिक और माध्‍यामिक से उच्‍चतर शिक्षा तक के ढांचे को लाभ कमाने से ज्‍यादा बच्‍चों के भविष्‍य को संवारने के रूप में विकसित किया जाए तो बात सकती है। सरकार को एक तरफ ऐसे सरकारी शिक्षा संस्‍थानों का ढांचा तैयार करना होगा जहां निजी शैक्षिक संस्‍थानों से भी ज्‍यादा अच्‍छी शिक्षा कम पैसे में मुहैया कराई जाए। ऐसे में सरकारी संस्‍थानों के वि‍कसित होने से अपने आप विकल्‍प तैयार होंगे और एक नई प्रतियोगिता सरकारी और निजी संस्‍थानों के बीच पैदा होगी। साथ ही दोनों ही क्षेत्र के संस्‍थानों को खुद को बेहतर साबित करने का दबाव भी होगा। इसका सीधा फायदा बडी संख्‍या में गरीब, वंचित वर्गो और होनहार छात्रों को मिलेगा जो आर्थिक तंगी की वजह से आगे नहीं बढ़ पाते हैं।
वहीं दूसरी तरफ निजी स्‍कूलों की मनमानी फीस पर नियंत्रण के लिए नियामक का गठन किया जाए जो सही रूप से बता सके कि वास्‍तव में निजी स्‍कूलों की फीस बढ़नी चाहिए या नहीं। क्‍योंकि हर साल ही निजी स्‍कूल बेवजह फीस में बढ़ोतरी कर अपने लाभ को बढ़ाने का रास्‍ता खोजते रहते हैं और सरकार से मुफ्त में जमीन मिलने के बावजूद गरीब बच्‍चों के शैक्षिक विकास पर ध्‍यान न देकर बच्‍चों को अपना ग्राहक मानकर उन्‍हें शिक्षा उपलब्‍ध कराते रहते हैं।
किसानों को फसल के बेहतर दाम

उत्तर प्रदेश की सरकार ने 36,359 करोड़ की कर्ज माफी की घोषणा की है। इससे 2.15 लाख छोटे और सीमांत किसानों का एक लाख तक कर्ज माफ करने की घोषणा की गई है। किसानों कर्ज माफ करना कोई बुरी बात नहीं है, जब कॉरपोरेट घरानों का लाखों करोडों रुपयों का कर्ज माफ किया जा सकता है तो किसानों का क्‍यों नहीं। पर सवाल यह है कि क्या किसानों के लिए कुछ कर्ज करने का मतलब सिर्फ कर्ज माफी ही है। क्‍या किसानों को उद्यमी के रूप में विकसित नहीं किया जा सकता है। क्‍या कोई ऐसी व्‍यवस्‍था की जा सकती है जिसमें किसानों को कर्ज न लेना पड़े और वो फिर भी खेती कर सकें।

किसान मामलों के जानकार सर्वोदय अभियान से जुड़े कुमार प्रशांत ने अपने एक इंटरव्‍यू में कहा था कि इस वक्त क्या सबसे जरूरी है जिसकी तरफ सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि एक तो यह है कि जो समर्थन मूल्य अनाजों का आप तय करते हैं, वो आप न तय करें और जगह-जगह किसानों की को-ऑपरेटिव को तय करने दें। वहीं दूसरा ये कि जो भी बाजार भाव तय होता है, उस भाव पर फसल बाजार में बिके। इसकी देखरेख की व्यवस्था सरकार करे। इसके अलावा सरकार दूसरा कोई रोल न निभाएं।

उन्‍होंने कहा कि अगर किसानों की परिस्थिति को बदलना तो बातों पर तुरंत अमल करना होगा। पहली यह की किसानों की मदद के लिए जितनी भी व्‍यवस्‍थाएं बनाई गई हैं, उन सब पर विचार करना होगा। साथ ही फसलों के समर्थन मूल्‍य का सवाल किसान समितियों के पास जाएं जिससे फसलों का समर्थन मूल्‍य तय करने में मदद मिल सकती है। वहीं बाजार का व्‍यापारी किसान की लाचारी का फायदा उठाकर फसल को कम दाम पर बेचने के लिए बेबस न करें। योगी आदित्‍यनाथ सरकार को इस बावत कुछ नई व्‍यवस्‍था करनी होगी।


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कानून व्यवस्था सुधारने के लिए बहुत काम जरूरी उत्‍तर प्रदेश में पुलिस कर्मियों की कमी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा पुलिस कर्मियों के 1.51 लाख पद खाली हैं। खाली पदों पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश जे एस खेहर ने उत्‍तर प्रदेश से पूछा है कि आप उत्तर प्रदेश में लोगों को रोजगार क्यों नहीं मुहैया कराते हैं? आखिर इतने पद खाली क्यों हैं? इस पर यूपी सरकार की तरफ से जवाब देते हुए कहा गया है कि रोजगार देने के लिए हमारी तरफ से प्रयास लगातार जारी हैं। पर सवाल यहां उठता है कि क्‍या सिर्फ भर्तियां कर लेने भर से ही कानून व्‍यवस्‍था को ठीक किया जा सकता है। पर ऐसा नहीं है। भर्ती करने के साथ-साथ यूपी पुलिस को विदेशों की पुलिस की तरह प्रोफेशनल ट्रेनिंग की भी जरूरत है। यूपी पुलिस के ड्रेस, हेल्‍थ, सैलरी, काम करने के घंटे और प्रमोशन तक को नए सिरे से परिभाषित किए जाने की जरूरत है। यूपी पुलिस में आज भी लाखों की संख्‍या में भर्ती पुलिस कर्मी अपने नियमों का पालन नहीं करते हैं। एक तरफ जहां पुलिस वालों को फिट रहना चाहिए, वहीं पुलिस वाले उलटा ही ओवरवेट होते जा रहे हैं। अगर नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए तो अपने इन रवैयों को यूपी पुलिस के जवान पीछे छोड़ सकते हैं। पर इन नियमों को उनकी नौकरी से जोड़ना होगा। यूपी पुलिस में भ्रष्‍टाचार बड़े पैमाने पर है और यहां पर कुछ रुपयों के लिए ही पुलिस वाले अपना ईमान बेच देते हैं या फिर लोगों को तंग करते हैं। ऐसे में यूपी पुलिस के पुराने पर वेतन व्‍यवस्‍था और ढांचे को बदलकर आज के समय के हिसाब से वेतन तय किया जाना चाहिए। अगर पद और समय के हिसाब से वेतन सही मिलेगा तो पुलिस वाले अपना काम ज्‍यादा ईमानदारी से कर सकेंगे। पुलिस वालों के लिए खुद को मानसिक रूप से स्‍वस्‍थ रखने के लिए छुट्टी की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए जिससे वो अपने परिवार को भी वक्‍त दे सकें। साथ ही प्रमोशन में पुलिस कर्मियों का असली काम देखा जाए नाकि राजनीतिक दबाव। पुलिस तंत्र और व्‍यवस्‍था को सुधारने के लिए इसे राजनीतिक, जाति, धर्म और समुदाय से अलग हटकर काम करना होगा। इस आधार पर काम करने वाले पुलिस कर्मियों को ही प्रमोशन का फायदा दिया जाए।

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निवेश के लिए बेहतर माहौल, वाइब्रेंट गुजरात से भी बड़े आयोजन उत्‍तर प्रदेश में निवेश की संभावनाएं किसी भी अन्‍य राज्‍य की तुलना में कहीं ज्‍यादा हैं। उत्‍तर प्रदेश में व्‍यापारियों को निवेश के लिए जो चीज सबसे ज्‍यादा आकर्षित करती है वो है यहां की भूमि और दूसरी जनसंख्‍या। क्‍योंकि उन्‍हें मैन्‍युफैक्‍चरिंग करने के साथ-साथ ही किसे सर्विस देनी है, इस बात की परवाह नहीं करनी पड़ती है। पर राजनीतिक और कानूनी व्‍यवस्‍था सहीं न होने के कारण भी निवेशक थोड़ा बचते हैं। वैसे तो उत्‍तर प्रदेश के हर जिले की कुछ न कुछ खासियत है। पर उत्‍तर प्रदेश को आगे बढ़ाने के लिए पूरे प्रदेश को एक साथ विकसित करना होगा। क्‍योंकि अगर देखा जाए तो लखनऊ से नोएडा की तरफ उत्‍तर प्रदेश जितना विकसित हुआ है तो वहीं लखनऊ से गोरखपुर या फिर आजमगढ़ की तरफ उत्‍तर प्रदेश का विकास उतना ही पिछड़ा भी है। उत्‍तर प्रदेश में नोएडा और लखनऊ में निवेश की वजह से लाखों नौकरियां आई हैं तो वहीं दूसरे जिलों में निवेश न मिल पाने के कारण पलायन बढ़ा भी है। इसलिए नोएडा की तर्ज पर कम से कम यूपी के 10 जिलों को विकसित करने का लक्ष्‍य तय करना होगा जिससे उत्‍तर प्रदेश में नौकरियां बड़े पैमाने पर आ सके। उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने खुद कहा है कि उनका ध्‍यान पलायन रोकने पर ज्‍यादा होगा। पर इस पलायन को रोकने के लिए उन्‍हें पांच साल में ही 25 वाली नीति बनानी होगी। उत्‍तर प्रदेश को मैन्‍युफैक्‍चरिंग के सेक्‍टर के साथ-साथ सर्विस सेक्‍टर के रूप में विकसित करना होगा। गोरखपुर, आजमगढ, फैजाबाद समेत अन्‍य पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के जिलों में निवेश बढ़ाने पर जोर देना होगा। साथ ही ऐसा माहौल तैयार करना होगा जिससे लोग वापस यूपी लौटने के लिए लालियत हो जाएं। यूपी के हर जिले में कोई न कोई विशेष कारोबार होता है, उसकी यूएसपी को बाजार के सामने बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता है। आगरा का चमड़ा उद्योग, भदोही का कालीन, कन्‍नौज का इत्र, फिरोजाबाद की चूडियां, कानपुर का वस्‍त्र उद्योग समेत हर जिले को नए ढंग से एक विशेष रूप में दुनिया के सामने रखा जा सकता है। केंद्र और राज्‍य दोनों में भाजपा की सरकार होने का फायदा सीधे तौर पर उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को मिल सकता है और उत्‍तर प्रदेश में निवेश के बड़े निर्णय वो बिना किसी रोकटोक के ले सकते हैं। योगी के पास मौका है कि वो वाइब्रेंट गुजरात से भी बड़े स्‍तर के आयोजन को यूपी में करवा सकते हैं। अगर योगी ऐसा करने में सफल होते हैं तो पहला परिणाम यह होगा कि यूपी में नौकरियों को बहार होगी दूसरा दूसरे राज्‍यों के लोगों का रूख भी यूपी क तरफ होगा जोकि किसी भी राज्‍य को समृद्ध बनाने के लिए बहुत जरूरी है।

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बेलगाम सरकारी तंत्र की पूरी सर्जरी जरूरी यूपी में योगी आदित्‍यानाथ सरकार आने के बाद नौकरशाही ने थोड़ा झुकना शुरु कर दिया है। पर इस नौकरशाही से लेकर पूरे सरकारी तंत्र को अपने तरीके से चलाने के लिए पूरी मशक्‍कत योगी आदित्‍यनाथ को करनी पड़ेगी। क्‍योंकि ये वहीं नौकरीशाही जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय को लागू होने में रूचि नहीं लेती जिसमें कहा गया था कि अधिकारियों के बच्‍चों को भी सरकारी स्‍कूलों में पढ़ना चाहिए। साथ ही अखिलेश सरकार को इस बावत फैसला नहीं लेने देती तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के अन्‍य बच्‍चों के इतर अपने बच्‍चों के लिए अलग संस्कृति स्‍कूल तुरंत चंक गजरिया लखनऊ में बनवा लेती है। योगी आदित्‍यनाथ सरकार ने यूपी के सभी अधिकारियों से उनकी संपत्ति का ब्‍यौरा मांगा था। पर आज 15 दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक न तो मंत्रियों ने और न हीं अधिकारियों ने अपनी संपत्ति का ब्‍यौरा उपलब्‍ध करवाया है। ये तो अभी लखनऊ में बैठे हुए अधिकारियों का हाल है। पूरे प्रदेश भर में अधिकारियों से निपटने के लिए योगी सरकार को दिन-रात मेहनत करनी होगी। क्‍योंकि यही रवैया ऊपर से नीचे तक फैला हुआ है। कर्मचारियों के ऑफिस आने-जाने के समय को तय करने से ज्‍यादा यह सुनिश्चित करना होगा कि सारे कर्मचारियों का आउटपुट बढ़े और वो बेहतर परिणाम दे सकें। बेहतर परिणाम देने वाले कर्मचारियों का प्रोत्‍साहन करते हुए सम्‍मान करना होगा जिससे उन्‍हें यह न लगे कि वो बस एक सरकारी नौकरी कर रहे हैं। बल्कि अपने विभाग को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। सरकारी विभागों में बेहतर रिजल्‍ट देने वाले विभागों को ईनाम देकर भी इस प्रतियोगिता को आगे बढ़ाया जा सकता है।

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जिले में शिक्षा अब कुछ लोगों के लिये महज व्यवसाय बन गई है। जिसमें प्राईवेट स्कूल सबसे आगे हैं। यहां शिक्षा की गुणवत्ता और सुविधाओं से संचालकों को कोई सरोकार नहीं हैं, उन्हें तो सिर्फ छात्रों के अभिभावकों की जेब से मतलब जान पड़ता है। रही बात शिक्षा के अधिकार कानून की, तो इस कानून का कोई भी असर दिखाई नहीं पड़ता।

जिम्मेदार अधिकारियों की मूक सहमति के बल कर खुलेआम नियमों को ताक पर रखते हुए दबंगाई के बल पर स्कूलों का संचालन हो रहा है।

प्राईवेट स्कूलों में शिक्षा के अधिकार के तहत मिलने वाली अनिवार्य सुविधाओं को देखने के लिये अपने क्षेत्र के कई विद्यालयों की पड़ताल की। इस दौरान बड़े पैमाने पर अनियमित्ताएं देखने को मिलीं। कहीं कम तो कहीं ज्यादा, शिक्षा के नाम पर चल रही लूट लगभग हर जगह देखने को मिली। मोटी रकम खर्च कर अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना संजोने वाले अभिभावकों को श्याद ही मालूम होगा, कि उनके बच्चों को किस तरह बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। कई स्कूलों में तो आलम यह था कि बच्चे भेड़-बकरियों की तरह बैठे नजर आये। वहीं इनको पढ़ाने वाले शिक्षक भी शिक्षा माफियाओं से प्रताडि़त दिखे।

प्राईवेट स्कूलों में न सिर्फ मासूमों का शोषण हो रहा है, बल्कि यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों का भी शोषण किया जाता है। वेतन के नाम पर महज चंद पैसे ही उनके हांथ लगते हैं, लेकिन बेरोजगारी के चलते युवा अपना शोषण कराने पर मजबूर नजर आये। नियमों की बात करें तो इन विद्यालयों को देखकर स्वत: ही अंदाजा हो गया कि शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजी कानून मात्र है।

वास्तविकता से इस अधिनियम का कोई औचित्य नजर नहीं आता। पड़ताल के दौरान मिली अनियमित्ताओं के संबंध में अब कोई जिम्मेदार अधिकारी कुछ नहीं बोल रहा है। जबकि यह कार्य शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों का है, कि वे नियमित रूप से प्राईवेट स्कूलों की पड़ताल करें, ताकि शिक्षा के व्यवसाय से जुड़े लोगों में कुछ डर हो और बच्चों को वे बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराये। जहाँ हमने पड़ताल कीं उन स्कूलों में सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नजर नहीं आया। मौके पर बड़ी संख्या में बच्चे मिले, जिन्हें कमरों में ठूंस कर भर गया था। आलम यह था कि कमरों में पैर रखने की भी जगह नहीं थी। बताया गया कि स्कूल का संचालन गोरखपुर के किसी व्यक्ति द्वारा किया जाता हैं। संचालक दबंग है, इस लिये यहां कोई अधिकारी नहीं आते। जिसके चलते कभी कोई सुविधाओं पर बात नहीं करता। स्कूल के शिक्षक भी शोषित नजर आये। बताया गया कि स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों को पर्याप्त वेतन तक नहीं मिलती। लेकिन वे असहाय नजर आये।

स्कूल में शिक्षा के अधिकार कानून का पूरी तरह उल्लंघन होता मिला। यहां न तो पर्याप्त भवन था, न योग्यताधारी शिक्षा। बच्चों के लिये अनिवार्य सुविधाएं भी नहीं दिखीं। सुरक्षा के कोई मानक नजर नहीं आये। सिर्फ संचालक की दबंगाई के बल पर स्कूल संचालित होता जान पड़ा।
ऐसे ही एक और नामी स्कूल में हमने पड़ताल की : इस विद्यालय में पहुंचकर प्राईवेट स्कूलों की सुविधाओं का कुछ आभास हुआ। विद्यालय में कई तरह की सुविधाओं बच्चों को मिल रहीं थी। स्कूल के पाय पर्याप्त भवन भी था और प्रबंधन द्वारा सारी अभिभावकों की सहुलियल के लिये सभी जानकारियां नोटिस बोर्ड पर ही चस्पा कर रखीं थी।

यहां के शिक्षकों ने बताया कि उन्हें पर्याप्त वेतन भी मिलता है, हालाकि उनकी योग्यता पर स्पष्ट जवाब नहीं मिला। कुछ मिलाकर यह स्कूल कई मानकों पर खरा उतरा। विद्यालय में शिक्षा के अधिकार अधिनियम का पालन भी किया जा रहा है और गरीब बच्चों को भी यहां प्रवेश दिया गया।


जिले में खुलेआम शिक्षा का व्यवसाय करने वाले शिक्षा माफिया इतने दबंग हो गये हैं कि उन्हें अब कोई डर नहीं हैं। उनका मानना है कि ऊंची पहुंच और रसूक के बल पर वे कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में जिले के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों से ऐसे दबंगों पर कार्रवाई की मांग भी की गई।

पवन सिंह - भाजपा


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