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Public Opinion (238)

जय श्री राम शुभ गुरुवार भारत माता की जय ॐ नमः भगवते वाशुदेवाय नमः महाशिवरात्रि पर्व की आप सभी को शुभकामनाएं 26 मई 2014 को हमारा पोस्ट था पेज पर की अगर भारत में दो मजबूत हिंदुत्व वादी हो जाय तो सभी धर्म निरपेक्ष मुस्लिम परस्त और जाति वादी राजनीति से सफाया हो जाय भारत में बीजेपी शिवसेना को छोड़कर सभी दल सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोट के पीछे पड़े रहते हैं कहि दंगा हो कहि हिन्दू भगाया जाय या देश में आतंकवाद पर मजबूत स्टैंड बीजेपी और शिवसेना ही लेती है महाराष्ट्र की जनता ने साबित कर दिया की अगर हिंदुत्व वादी बिकल्प हो तो जनता दूसरे दल को कभी न चुने महाराष्ट के सभी मतदाताओ का कोटि कोटि नमन सेकुलर दल मुम्बई का यह जरूर देखे 84 सीट शिवसेना जीती और 65 पर दूसरे स्थान पर रही और 81 सीट बीजेपी जीती 79 पर दूसरे स्थान पर यानि धर्म निरपेक्ष तीसरे चौथे के लिये लड़े हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मन्दिर निर्माण मुहीम अयोध्या श्री राम मन्दिर निर्माण और हिंदुत्व की आवाज के लिए पेज से जुड़े अपने 10 दोस्तों को अवश्य जोड़े धन्यवाद जय श्री राम हर हर महादेव यह लेखक की व्यक्तिगत राय है गोरखपुर टाइम्स इस कथन से संबंध नहीं रखता है....

शुभः संध्या बीबीसी हिन्दी लिखता है कि, मोदी जी विकास से शमशान तक पहुँच गए। बीबीसी को मोदी जी की इस यात्रा से कष्ट है, और उसने उन लोगों का भी जिक्र किया है जो प्रधानमंत्री के शमशान और कब्रिस्तान वाले भाषण से आहत और हतप्रभ हैं। जहाँ तक प्रधानमंत्री के विकास से शमशान तक पहुँचने की यात्रा का सवाल है, तो अभी तक लोग उनको अंडरएस्टीमेट कर रहे हैं। क्योंकि उनके पहुँचने की कोई सीमा नहीं है। वे दरी उठाकर और जाजम बिछाकर यहाँ तक पहुंचे हैं, और वे आगे झोला भी उठा सकते हैं। दरअसल वे नायब हैं, अतुलनीय हैं, और अभूतपूर्व हैं। उनके कार्यकलापों पर अक्सर लोगों को आश्चर्य होता है। खासकर उनको जो देश की राजनीति को नेहरू और वाजपेयी की नीतियों की चासनी में पगा हुआ देखते रहे हैं। जबकि मेरा मानना है कि, मोदी बीते हुए किसी युग का विस्तार नहीं हैं, बल्कि वे अपने आप में स्वयं एक युग हैं, जिसकी तुलना करना बेमानी हैं, क्योंकि ऐसा कोई युग अभी तक हुआ ही नहीं है। वे पब्लिक में ठहाका मारकर हंस लेते हैं, वे जरूरत होने पर रो भी लेते हैं, वे विपक्ष को साथ लेकर चलने की बात करते हैं, वे अक्सर अपने ही लोगों की परवाह नहीं करते हैं, वे देश में अभी तक हुए, विकास का श्रेय अपने पूर्ववर्तियों को दे देते हैं, वे पिछले सत्तर साल में केवल विनाश होने की भी बात करते हैं। वे मेरे लिए एक दिन स्टाइल आइकॉन होते हैं, तो अगले दिन वे खुद को फ़कीर मानने को भी कह देते हैं। वे अपने होने को लेकर, अपने वजूद को लेकर किस कदर चौकस हैं, नोटबंदी उसका एक नमूना है। उस समय तक देश में एक बड़ा तबका ऐसा भी था, जो लगभग “कोऊ नृप होय, हमें का हानि” (अर्थात, कोई भी, किसी की भी, सरकार हो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता) वाली मानसिकता में जी रहा था, लेकिन एक रात वे अचानक से टीवी पर प्रकट होते हैं, और गुजरात से अरुणांचल(2933किलोमीटर)और कश्मीर से कन्याकुमारी (3214 किलोमीटर) तक फैले हिंदुस्तान की 130 करोड़ की आबादी जान जाती है कि ‘नरेन्द्र मोदी’ क्या हैं ? मैं यहाँ एक व्यक्ति जिनको नरेन्द्र मोदी के नाम से जाना जाता है, न उसकी तारीफ़ करना चाहता हूँ न आलोचना। क्योंकि वह फिलहाल संभव ही नहीं है। जिस प्रकार मोदी जी ने संसद में नोटबंदी की समीक्षा को यह कहकर खारिज कर दिया था कि, दुनिया में पहली बार इस प्रकार के काम को अंजाम दिया गया है, इसलिए विपक्ष यह नहीं कह सकता कि, यह असफल हुआ है, क्योंकि इसका तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए हमारे पास न कोई केस है न अर्थव्यवस्था। उसी प्रकार मोदीराज को परखने के लिए हमारे पास कोई ऐसी विरासत उपलब्ध नहीं है। इस देश की जनता ने उनके कहने पर ब्रेक, क्लच और एक्सेलरेटर सब उनके हवाले कर दिए हैं, इसलिए अब जो भी होगा उसके एकमात्र उत्तरदायी वही होंगे। इस समय वे अपनी मर्जी से भारत भाग्य विधाता हैं, इसलिए जय भी उनको समर्पित की जायेंगी, और पराजय की प्रविष्टियाँ भी उसी शिद्दत से उनके खाते में दर्ज होंगीं । और वे स्वयं भी हर बात के लिए तैयार हैं, यही बात उनके विरोधियों को हज़म नहीं होती, कि कोई व्यक्ति कैसे इतनी आसानी से जय और पराजय दोनों स्वीकार कर सकता है। असल में यही तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति सिखाती है, यही तो सनातन धर्म है, यही तो गीता ज्ञान है, कि सभी स्थितियों में सम रहें। इसीलिए मोदी जी एक योगी की तरह का जीवन जीते हैं, जो उनकी विशेषता है......। बाकी जो है, सो हइये है । मृत्युंजय प्रसाद

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तस्वीरों के साथ एक नारा दिखाई दिया गया जिसमें कहा गया था कि ‘यूपी को ये साथ पसंद है’। जाहिर है ये नारा समाजवादी पार्टी या फिर कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकारों में से किसी एक के रचनात्मक दिमाग की उपज होगा और काफी सोच-विचार कर तैयार किया गया होगा। ये नारा प्रभावकारी भी दिखाई दे रहा है, लेकिन लगे हाथ समाजवादी पार्टी के नेता खुल कर तो नहीं लेकिन दबी जुबान से इस नारे में कुछ फेरबदल के साथ ये भी कह रहे हैं कि‘कांग्रेस से सोनिया-राहुल गांधी-प्रियंका के अलावा किसी और साथ पसंद नहीं है’। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की कांग्रेसियों के प्रति इस तरह की नापसंदगी खुल कर दिखाई भी दे रही है। कांग्रेस के लिए गांधी परिवार से उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ही अभी तक अकेले मोर्चे पर डटे हुए हैं। प्रियंका और सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार को लेकर अभी कुछ तय नहीं है। सोनिया गांधी स्वास्थ्य कारणों से चुनाव प्रचार से दूर हैं वहीं प्रियंका संभवत: रणनीतिक कार्यों की व्यसस्तता और अपनी साख की फिक्र को लेकर प्रचार से दूर हैं क्योंकि इस बार अमेठी-रायबरेली में भी कांग्रेस की जीत पक्की नहीं दिखाई दे रही है। जहां तक राहुल की बात है तो वो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों के ही उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं लेकिन बताया जा रहा है कि उनके अलावा कांग्रेस में दूसरी कतार के नेताओं के चुनाव प्रचार को लेकर समाजवादी पार्टी ही राजी नहीं है। समाजवादी पार्टी में उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार का मुद्दा अभी थमा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद से लेकर चुनावी सभाओं में यूपीए सरकार के समय हुए घोटालों को निशाना बना रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी निशाने पर हैं, इसलिए पार्टी ऐसे हालात में कोई जोखिम लेना नहीं चाहती। सत्ता से बाहर रहा गांधी परिवार निजी आरोपों से दूर है, इसीलिए वो तो चलेगा, लेकिन बाकी कांग्रेसी नेताओं से समाजवादी पार्टी दूरी बरत रही है। समाजवादी प्रियंका गांधी से प्रचार चाहती थी, बल्कि प्रचार के लिए प्रियंका के अभी तक नहीं उतरने से पार्टी में नाराजगी भी है। हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल कहते हैं कि प्रियंका गांधी से चुनाव प्रचार करवाने का मामला कांग्रेस का अपना है, उसे इसके लिए बाध्य नहीं कर सकते। बहरहाल समाजवादी पार्टी के नेता इतनी रियायत जरूर बरत रहे हैं कि वो कांग्रेसी उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं, लेकिन अपने लिए उन्हें कांग्रेस के दूसरी कतार के नेताओं की जरा भी जरूरत नहीं है। यहां तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल और गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद तक की समाजवादी पार्टी की ओर से कोई मांग नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्रियों पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल, जयराम रमेश, आनंद शर्मा, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी जैसे नेताओं के प्रचार को लेकर भी सपा की तरफ से कोई मांग नहीं है, ये नेता कांग्रेसी उम्मीदवारों के लिए ही प्रचार कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेसी उम्मीदवार तक उनके प्रचार से बहुत उत्साहित नहीं हैं। यूपी के चुनावी समर में राहुल गांधी के बाद कांग्रेस की ओर से राज बब्बर ही चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं, कांग्रेसी उम्मीदवार भी बाकी नेताओं की तुलना में उनसे प्रचार चाहते हैं क्योंकि बॉलीवुड से जुड़ा होने की वजह से उनके साथ ग्लैमर भी है।

हिंदी अख़बार का बड़ा नाम दैनिक जागरण अब मुश्क़िलों में घिर गया है। अख़बार के ऑनलाइन एडिटर शेखर त्रिपाठी को आचार संहिता का उल्‍लंघन करने पर गिरफ्तार किया गया है। गाजियाबाद पुलिस ने सोमवार (13 जनवरी) रात को उन्‍हें गिरफ्तार किया। साथ ही लखनऊ और दिल्‍ली में संपादकों के ठिकानों पर छापेमारी भी की। पुलिस ने जागरण न्‍यू मीडिया सीईओ सुकीर्ति गुप्‍ता, जागरण इंग्लिश ऑनलाइन के डिप्‍टी एडिटर वरुण शर्मा और डिजीटल हैड पूजा सेठी के घरों पर छापे मारे। जागरण में प्रकाशित सर्वे में बीजेपी को साफ़ तौर पर बढ़त के साथ दिखाया गया जो कि एक पेड न्यूज़ का मामला है। जो कि दिखाता है कि किस तरह से जागरण ने बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए इस तरह का सर्वे वोटरों को प्रभावित करने के लिए छापा। पत्रकारिता के नाम पर दैनिक जागरण को कलंक के रूप में देखा जा रहा है। इंडिया संवाद ने कल ही बताया था कि इनके संपादकों पर किस तरह से गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही है और उसके बाद देर रात को ही संपादक की गिरफ़्तारी हो गई। दरअसल, इससे पहले चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस ने त्रिपाठी, अखबार के मैनेजिंग एडिटर और सर्वे करने वाली संस्‍था आरडीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इनके खिलाफ उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित करने का आरोप है। चुनाव आयोग ने पहले चरण के 15 जिला निर्वाचन अधिकारियों को सर्वे करने वाली संस्‍था ‘रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड और दैनिक जागरण के मैनेजिंग एडिटर, एडिटर इन चीफ, एडिटर या चीफ एडिटर के खिलाफ तत्‍काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया था। आयोग के प्रवक्ता ने कहा कि रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल के मतदान बाद किये गये सर्वेक्षण के नतीजे का एक हिंदी दैनिक द्वारा प्रकाशन करना ‘‘जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा अनुच्छेद 126ए और बी का स्पष्ट उल्लंघन है और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत चुनाव आयोग के कानून संबंधी निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं करना है।’’ अब सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि जिस तरह से चुनाव आयोग ने अपनी अवहेलना के चलते एक संपादक को गिरफ़्तार कराया है तो क्या उन नेताओं को भी चुनाव आयोग गिरफ़्तार करा पाएगा जो कि सरेआम कई बार आचारसंहिता और चुनाव आयोग का उल्लंघन करते हैं? उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से रिपोर्ट मांगी गई है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में प्राप्त शक्तियों के तहत चुनाव पैनल ने मतदान बाद किये जाने वाले ऐसे सर्वेक्षणों के प्रकाशन और प्रसारण पर पाबंदी लगा रखी है ताकि इसके परिणाम मतदाताओं को प्रभावित ना कर सकें। वहीं इस बारे में दैनिक जागरण अखबार की ओर से कहा गया कि उत्तर प्रदेश के एग्जिट पोल के बारे में खबर अनजाने में उसकी अंग्रेजी वेबसाइट पर प्रकाशित हो गई थी और समूह के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा इसकी जानकारी मिलते ही फौरन इसे हटा दिया गया था। अख़बार ने एक बयान में कहा, ‘‘ये साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सिवाय अंग्रेजी डिजिटल माध्यम के एग्जिट पोल से जुड़ी कोई भी खबर दैनिक जागरण अखबार में प्रकाशित नहीं हुई। अंग्रेजी वेबसाइट पर एग्जिट पोल का जिक्र करते हुए अनजाने में एक खबर प्रकाशित हो गई। हालांकि, जैसे ही समूह के बड़े अधिकारियों के संज्ञान में ये खबर आई, गलती का खुद ही सुधार करते हुए इसे फौरन हटा दिया गया। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हम निर्वाचन आयोग द्वारा जारी दिशा निर्देशों का पूरी तरह अनुपालन करते हैं और चुनाव आयोग के सामने अपनी स्थिति साफ करने के लिए हम तथ्य आधारित विस्तृत जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया में हैं।’’ लेखक: अनूप श्रीवास्तव Email This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. twitter @theanoop18

उत्तर प्रदेश चुनाव के मध्य नजर देखते हुए अलग अलग पार्टियां अपने अपने तरीके से प्रचार प्रचार प्रचार प्रसार करने में जुट गई है अगर मीडिया के हिसाब से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सबसे ज्यादा खर्च भारतीय जनता पार्टी कर रही है वहीं समाजवादी पार्टी जमीनी स्तर पर अपनी साख बटोरने में तत्पर है ... प्रचार प्रसार का सबसे त्वरित माध्यम आधुनिक काल में फेसबुक और व्हाट्सऐप हो चुका है और भारतीय जनता पार्टी का खर्च प्रचार-प्रसार में सर्वाधिक देखने को मिल रहा है.... भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू होने के बाद भी जितना खर्च कमल मेले और अन्य मदों पर कर रही है शायद ही कोई दल उत्तर प्रदेश में कर रहा हो... दैनिक जागरण पर चुनाव आयोग द्वारा fir कराना कहीं ना कहीं इस ओर इशारा कर रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने पत्रकारिता पर अपना कब्जा पूरी तरह से जमा लिया है जिससे कहीं ना कहीं आने वाले समय में पत्रकारिता पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा... वही कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन भी प्रचार प्रसार में लग गए हैं परंतु उनके प्रचार प्रसार का माध्यम जन-जन से मिलने का है जोकि परंपरागत तरीके से निभाया जा रहा है... बहुजन समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों के लिए बहुत ही संयमित और अपने घाटी के वोटरों पर भरोसा कर चल रही है बसपा रैलियों में भी कम विश्वास कर जमीनी स्तर पर कार्य करने में जुट गई है....

इस्लामाबाद.पाकिस्तान में इस बार वेलेन्टाइन्स डे नहीं मनाया जा सकेगा। इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने इस पर बैन लगा दिया। सोमवार को वेलेन्टाइन्स डे के खिलाफ जारी एक पिटीशन पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ये फैसला दिया। मीडिया के लिए भी सख्त गाइडलाइंस जारी की गई हैं।क्या है मामला.... -पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,हाईकोर्ट ने यह आदेश उस पिटीशन पर सुनवाई के दौरान दिया,जिसमें वेलेन्टाइन्स डे को इस्लाम विरोधी बताते हुए इस पर बैन की मांग की गई थी। -हाईकोर्ट ने मीडिया के लिए भी इस मसले पर सख्त गाइडलाइंस जारी कीं। कोर्ट ने कहा कि देश के न्यूज चैनल्स और अखबार भी वेलेन्टाइन्स डे से जुड़ी खबरें और फोटो पब्लिश न करें। -ऑर्डर में साफ कहा गया है कि किसी भी पब्लिक प्लेस पर वैलेंटाइन डे सेलिब्रेट नहीं किया जा सकेगा। पहले भी होता रहा है बवाल -हालांकि,ये पहला मौका नहीं है,जब पाकिस्तान में‘वेलेन्टाइन्स डे’पर बैन की मांग उठी हो,और मामला कोर्ट तक पहुंचा हो। -हाफिज सईद का संगठन जमात उद दावा और जमात-ए-इस्लाम इसका विरोध करते रहे हैं। -पहले भी कई लोग और संस्थाएं‘वेलेन्टाइन्स डे’को इस्लाम विरोधी बताते हुए इस पर बैन लगाने के लिए कोर्ट जा चुकी हैं। -हालांकि,ये पहली बार ही हुआ है कि इस पर सीधे हाईकोर्ट ने बैन लगाया है। -पिछले साल यूनियन होम मिनिस्टर निसार अली खान ने भी वैलेंटाइन डे’पर बैन लगा दिया गया था।

यह पंक्तियाँ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के जीवन पर पूर्णत: खरी उतरती हैं। उनका संपूर्ण जीवन कुछ इस प्रकार का रहा कि उसमें स्वहित नहीं, जनहित ही सर्वोपरी था। उनके दुखद निधन की सूचना जैसे ही लगी, मध्यप्रदेश के कोने-कोने में ही नहीं बल्कि अविभाजित मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ प्रान्त में भी शोक की लहर दौड़ पड़ी। उनको चाहने वाले जो जहाँ थे, वहाँ से अपने नेता के अंतिम दर्शन को चल पड़े। पटवा जी की पहचान भारतीय राजनीति में मध्यप्रदेश के लिए ठीक वैसी ही है, जैसी कि देश में लोह पुरुष के नाम से विख्यात हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल की है। जब वे सत्ता में प्रमुख पदों पर रहे तब और जब वे संगठन के पदों पर रहे तब दोनों ही स्तर पर पटवा जी, अपने लिए निर्णयों को लेकर सदैव सख्त रहे। संगठन के हित में जो है, वह करना एवं प्रदेश व देश के हित में उन्हें जो लगता है, उसे व्यवहार में करना ही उनका स्वभाव था जोकि दिवंगत होने से पूर्व तक उनके जीवन में देखा गया। प्रदेश में मुख्यमंत्री कांग्रेस के समय के रहे हों या उनकी पार्टी के वक्त के शिवराज सिंह चौहान तक वे हर उस बात को उनसे चर्चा में कहने से कभी नहीं चूके जो उन्हें निर्णय के स्तर पर प्रदेश हित में नहीं लगी। अपनी बात कहना, तथ्यों के साथ कहना एवं जो संगठन, सत्ता और प्रदेश के हित में है, उसकी राह तैयार करना यही पटवा जी का स्वभाव था। यही वे कारण हैं जिनके कारण भारतीय राजनीति में सौम्य व्यक्तित्व, शालीन व्यवहार, कुशल संगठन क्षमता, ओजस्वी वक्ता और विभिन्न जनसमस्याओं को उठाने वाले जुझारू नेता के रूप में सुन्दरलाल पटवा जी ने सार्वजनिक जीवन में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। श्री पटवा के व्यक्तित्व विकास और नैतृत्व क्षमता को निखारने की जहां तक बात है तो इसका श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जाता है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडऩे के पश्चात 1942 से 1951 तक विस्तारक रहे। यहीं से उन्होंने सबसे पहले सीखा कि… संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो। भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो॥ युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सीख लो। एकता के स्वर में गीत, गुनगुनाना सीख लो। भूलकर भी मुख में, जाति-पंथ की न बात हो। भाषा, प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो॥ फूट का भरा घड़ा है, फोडक़र बढ़े चलो, संगठन गढ़े चलो…. पटवा जी का पारिवारिक परिवेश श्रेष्ठ था। उनका जन्म मंदसौर जिले के कुकडेश्वर कस्बे में एक प्रगतिशील श्वेताम्बर जैन परिवार में 11 नवम्बर 1924 को हुआ था और उनके पिता मन्नालाल जी अपने क्षेत्र के एक ख्याति प्राप्त व्यवसायी होने के साथ ही प्रतिष्ठत समाज सेवी थे। यहीं श्री पटवा अपनी प्रारंभिक शिक्षा कुकडेश्वर और रामपुरा में लेते हुए रा.स्व.संघ के संपर्क में आ गए थे। अपने पारिवारिक परिवेश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रतिबद्धता के कारण उनका सतत् भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों, सामाजिक मर्यादाओं के प्रति रूझान बढ़ता गया । जिसके बाद अपने विचारों को क्रिया रूप में बदलने के लिए उन्हें जो मार्ग श्रेयस्कर लगा वह राजनीति का था, इसलिए वे इन्टरमीडियेट तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश कर गये। इसके बाद सर्वप्रथम उन्होंने मनासा क्षेत्र से 1957 में मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रवेश किया और अपने क्षेत्र की समस्याओं को मुखरित करने और उनके समाधान के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। अपने क्षेत्र के प्रति जागरूकता के कारण वे पुन: 1962 में निर्वाचित हुए और विधान सभा में प्रतिपक्ष के मुख्य सचेतक बने। विधान सभा की अनेक समितियों में उन्होंने प्रतिनिधित्व किया और भारतीय जनसंघ की प्रदेश शाखा के महामंत्री रहे। सहकार में है सबका भला, इस बात को मानकर चलने वाले श्री पटवा ने अपने जीवन में सहकारिता आंदोलन को भी प्रदेश में एक नई ऊर्जा प्रदान की। उनके इन्हीं प्रयासों का सुफल था कि वे 1967 में नीमच सेन्ट्रल को-आपरेटिव बैंक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और लम्बे समय तक इस बैंक के विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए सहकारिता आंदोलन को जनोन्मुखी बनाने में सफल होते रहे। जिसके परिणाम स्वरूप उनके कार्यकाल में सहकारी संस्थाओं के माध्यम से कमजोर वर्गों, शिल्पियोग और श्रमिकों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के सफल प्रयोग किये गये। प्रदेश में सहाकरिता के क्षेत्र में कई औद्योगिक परियोजनाएं शुरू हुईं। पटवा जी की सदैव मान्यता यही रही कि भारत का विकास, मध्यप्रदेश का विकास तभी होगा जब देश का हर गांव स्वावलंबी होगा, इसके लिए जो जहां है, वहाँ से अपने सकारात्मक प्रयास करे। इसलिए वे अपने स्तर पर सदैव कृषि, शिल्प और दुग्ध व्यवसाय को बढ़ावा देने में लगे रहे। वे कहते भी थे कि जब तक कृषि, शिल्प और दुग्ध व्यवसाय को आधुनिक स्वरूप प्रदान नहीं किया जाता, तब तक ग्रामीण अंचलों का अपेक्षित विकास सम्भव नहीं है, साथ ही उनका मानना था कि सत्ता का संपूर्ण वैभव तभी दिखता है जब ग्राम, नगर के साथ राज्य में सत्ता का अधिकतम विकेन्द्रीकरण दिखाई दे। इसलिए जननेताओं को सभी कुछ अधिकार अपने तक सीमित रखने से बचना चाहिए और उन्हें नीचे तक विकेंद्रीकृत कर देना चाहिए। यह श्री पटवा का अपनी पार्टी के सिद्धांतों एवं आदर्शों के प्रति समर्पित ही था जिसके चलते उन्हें आपतकाल के दौरान 18 माह तक कारावास में बंदी बनाकर रखा गया। इस दौरान वे अपनी पार्टी को जेल में रहते हुए भी सशक्त करने में सफल रहे। 1977 के आम चुनाव में वे विधान सभा के लिए जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए और जनता विधायक दल के महामंत्री के रूप में अपनी अपूर्व संगठन क्षमता का परिचय उन्होंने सभी को दिया। जनता शासन के अंतिम समय 20 जनवरी 1980 से 17 फरवरी 80 तक कुछ समय के लिए वे मुख्यमंत्री भी बनाए गए। इस बात का श्रेय भी श्री पटवा को प्राप्त है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम प्रतिपक्ष के नेता को केबिनेट मंत्री का दर्जा देने का महत्वपूर्ण कदम उठाया था। इसके साथ ही उन्होंने तकनीकी विभागों के सचिव पद पर तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति और शासकीय सेवकों को केन्द्र के समान मंहगाई भत्ता देने का निर्णय लिया था। श्री पटवा 1980 के चुनाव में सीहोर से विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद प्रतिपक्ष नेता के रूप में विधान सभा में अपनी तार्किक ओर ओजस्वी शैली के लिए भी विख्यात रहे हैं। इस समय में विभिन्न जन समस्याओं को उठाकर प्रतिपक्ष की भूमिका को एक नया आयाम प्रदान करने में वे सफल रहे। हरिजन, वनवासियों, ग्रामीणों, किसानों, मजदूरों तथा समाज के गरीब तबकों की विभिन्न समस्याओं को श्री पटवा ने न केवल विधान सभा में अपितु जन आंदोलनों के माध्यम से भी सशक्त रूप से समय-समय पर उठाया। इसमें संदेह नहीं है कि इन्हीं आंदोलनों के कारण भारतीय जनता पार्टी को आगे व्यापक जनाधार प्राप्त हुआ है। श्री पटवा 1986 से भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष और जागरूक विधायक के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने अपने विधायक जीवन में मनासा, मंदसौर, सीहोर और भोजपुर क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर उनके विकास के लिए अथक परिश्रम कर अपनी लोकप्रियता को सदैव बढ़ाया। इतना ही नहीं तो उन्होंने अपने कौशलपूर्ण अपनत्व भरे व्यवहार से मध्यप्रदेश में जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे अनेकों कुशल कार्यकर्ताओं का निर्माण करने में सफलता पाई। हमारे बीच से ऐसे राजऋषि का अचानक चला जाना निश्चित ही एक अत्यंत निष्ठावान स्वयंसेवक, कठोर परिश्रमी एवं दूरदर्शी राजनेता को हमेशा के लिए खो देना है। डॉ. मयंक चतुर्वेदी लेखक: हिन्दुस्थान समाचार के मध्यक्षेत्र प्रमुख एवं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की एडवाइजरी के सदस्य हैं।

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Post by अंकिशा राय
- Feb 23, 2017
जी हां, यहां बात हो रही है दंगल गर्ल फातिमा सना शेख की। खबर है कि फातिमा को यशराज बैनर की फिल्म ठग्स ऑफ हिंदुस्तान के ...
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- Feb 23, 2017
हर किचन में कुछ ऐसी चीजें मौजूद होती है। जो कि आपकी सेहत के साथ-साथ सौंदर्य के लिए भी काफी फायदेमंद ...
Post by सत्य चरण राय (लक्की)
- Feb 23, 2017
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- Feb 09, 2017
लड़कियों का फेवरेट होता है मेकअप , मेकअप में भी लिपस्टिक होती है सब लड़कियों की फेवरेट । लेकिन क्‍या आप जानते हैं ...

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