Sunday, 01 January 2017 05:30

मोदी जी लेकर आये सस्ता ऋण या मौत की गारंटी...

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*सस्ता ऋण या फिर मौत की गैरेंटी* *- किसानों को घर बनाने के लिए उपलब्ध कराया जायेगा सस्ता कर्ज* *- शहरों में जीवन यापन करने वाले भी उठा सकेंगे इस योजना का लाभ* *- बुन्देली किसान की दुर्गति पर दिखाई खाली झोली* *- लोन माफी के नाम पर किसानो की उम्मीदों पर फेरा पानी* *- के सी सी बनवाकर कर्ज तले दबे किसान क्या लेंगें और कर्ज* *- बैंक ऋण की वजह से सैकड़ों स्वीकार चुकें हैं मौत को* *- आसान क्या बैंक ऋण को चुकता करना या फिर आत्महत्या* :* 56 इंच का सीना लिए दहाड़ने वाले देश के प्रधानमन्त्री की छाती किसानों की कर्ज माफ़ी के सवाल पर 6 इंच में क्यों और कब परिवर्तित हो जाती है इस सवाल का जवाब बुन्देली गरीब किसानों को ना ही मोदी जे दे सकें हैं और न ही उनके अनुयायी। हर बार की तरह इस बार भी किसानों के कर्जमाफी पर प्रधानमंत्री ने कोई घोसणा तो छोड़िये चर्चा तक करना उचित नहीं समझा सुरुआत बैंक को अप्रत्याशित लाभ देने से हुयी और समापन भुखमरी की मार झेल रहे किसान को सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने की घोसणा कर बैंक की भेट चढ़ा देने पर कर दिया गया । नव वर्ष की पूर्व संध्या पर देश की जनता को संबोधित करने वाले प्रधानमंत्री ने वैसे तो बहुत से आलाप अलापे लेकिन उस सुर को लगाना वो भूल गए जिसको सुनने के लिए गरीब किसान किसी दुसरे के घर में जमीन पर या चौपाल लगाए रेडियों बीच में रक्खे बैठा था । चन्द रटे हुए शब्दों से शुरुआत करने वाले पीएम ने वैसे तो बहुत सी सहूलियत जनता और कृषकों को देने की बात कही जिसमे घर बनाने के लिए सस्ता ऋण आदि बातें थी परंतु वो शायद अपने सम्बोधन के दौरान ये भूल गए की जिन बैंकों द्वारा आप किसानों को मकान बनाने के लिए कर्ज उपलब्ध कराने जा रहें हैं उन्ही बैंको की वजह से सैकड़ों कृषक अब तक आत्महत्या कर चुकें हैं जो आज भी समाचार पत्रों में अपना स्थान मूल रूप से बनाये हुये है। बुन्देली धरा का वीर किसान जहां पहले ही बैंक द्वारा दिए जाने वाले केसीसी रूपी मायाजाल में फस कर दम तोड़ रहा वहीँ आपकी ये सहूलियत कहीं उसपर कोढ़ और खाज वाली कहावत तो सिद्ध होने नहीं जा रही है।सस्ता कर्ज उपलब्ध करा देने से क्या किसान की भुखमरी को ख़त्म किया जा सकेगा क्या कर्ज से बना मकान उसकी खेत पर फसल और पेट को दो वख्त की रोटी दे सकेगा ऊपर से बैंक और उनके भरस्ट कर्मचारी जो की बिना कमीशन लिए तो किसी गरीब की अर्थी को कफ़न नहीं देते क्या कर सकेंगें किसान का भला। अब तक न जाने कितने किसानों ने बैंकों द्वारा बनाये गए किसान क्रेडिट कार्ड का कर्ज ना चुकता कर पाने के चलते आत्महत्या जैसे रास्ते को अपना चुके हैं। जबरन कर्ज वसूलने की आदत से ग्रस्त बैंक और उनके कर्मचारी क्या वाकई शाहनभूति देंगे किसान और उनके परिवार को। जरूरत किसानो का शोषण रोकने की थी उनको वापिस उनके खोये सम्मान वापिस दिलाने की थी ताकि कम से कम भूख से रोते बिलखते उस गरीब किसान के बच्चों को दो वख्त की रोटी मिल सके और ये सब तब हो सकता था जब उनके बैंक के ऋण को माफ़ कर दिया जाता न की जरूरत थी मकान बनाने के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध करा कर उनके शोषण को और बढ़ाने की।बुन्देली कृषक बैंक के ऋण से छुटकारा पाने के लिए झटपटा रहा है तड़प रहा है अपनी कुंठित जिंदगी को बचाने के लिए अगर बचाना है उसको। शोषण मुक्त करना है उसे। तो बैंको के मायाजाल से छुटकारा दिलाइए ना की सस्ता कर्ज देकर मौत की गारंटी दीजिये। लेखक की व्यग्तिगत राय

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