Public Opinion

Public Opinion (214)

विषय:- एक युवा का कोर्ट और चुनाव आयोग से गम्भीर प्रश्न:-जब धर्म और जाति पर वोट नही मांग सकते तो आरक्षित सीटें क्यो?? अभी दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक आदेश पारित हुआ की कोई भी पार्टी या प्रत्याशी धर्म जाती एवं भाषा के आधार पर वोट नही मांग सकता और अगर ऐसा करता है तो उसको दण्ड दिया जायेगा!! मै पुनीत पांडेय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए सम्मान करता हु!! जनहित में ये फैसला बहुत ही अच्छा साबित होगा!! पर मेरी आपत्ति चुनाव आयोग और कोर्ट दोनों से है जब कोई व्यक्ति धर्म या जाति के नाम पर वोट नही मांग सकता तो वो धर्म या जाति के नाम पर चुनाव लड़ कैसे सकता है?? कल हुए चुनावी समर की घोषणा में चुनाव आयुक्त जी ने कहा कि लगभग 600 सीटो पर चुनाव एक साथ होंगे जिसमे से 133 सीट आरक्षित सीट घोषित किये गए है!! इन आरक्षित सीटो पर सिर्फ आरक्षित व्यक्ति यानी किसी विशेष सम्प्रदाय या जाति का ही व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है!! क्या चुनाव आयोग को इस पर रोक नही लगानी चाहिए थी ?? क्या सुप्रीम कोर्ट को इस पर ध्यान नही देना चाहिए और इस प्रकार के आदेश को निरस्त करना चाहिए?? क्या ये प्रक्रिया धर्म और जाति के राजनीति को बढ़ावा नही देगा!! द्वारा:-पुनीत पांडेय युवा नेता ,गोरखपुर

जय श्री राम शुभ बुधवार भारत माता की जय श्री गणेशाय नमः पांच राज्यो में चुनाव बिगुल बज गया है अब आपको फिर बहुत सारा प्रलोभन देकर आपके वोट के बदले प्रदेश को लूटा जायेगा बहुत से लोग कहेंगे कि हम तो सेकुलर है हम तो ब्राह्मण है हम तो क्षत्रिय है या हम तो दलित है सिर्फ अपने समाज को देखेंगे पर बंगाल कैराना अख़लाक़ राम बृक्ष जैसे हजारो उदाहरण याद कर लेना बंगाल में हिन्दू भी सेकुलर थे जो ममता बनर्जी को जिताये पर पहले मालदा और अब धुलागढ़ में आप अपने घर में सुरक्षित नही घर में सो रहे लोगो पर बम विस्फोट किया गया कोई सुनवाई नहीं वोट करने से पहले अपने परिवार की बहन बेटियों की सुरक्षा भी देख लेना नही तो वही परिवार आपको कहेगा पापा भैया आप तो लैपटॉप के लिए हमारा जीवन अंधकारमय कर दिया हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय सँयोजक तिरपाल से मंदिर निर्माण मुहीम अयोध्या

चुनाव और राजनीति के भंवर में आम बजट भी फंसा। जीएसटी भी एक अप्रैल से लागू होना मुश्किल। इस बार केन्द्र सरकार के आम बजट को लेकर देश भर के लोगों में उत्सुकता के साथ-साथ अपेक्षाएं भी है। देश के नागरिक नोटबंदी के माहौल में राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। चूंकि इस बार रेल बजट भी आम बजट में शामिल है, इसलिए बजट का महत्व और बढ़ गया है। इस बार के आम बजट की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार 28 फरवरी के बजाए एक फरवरी को ही बजट प्रस्तुत करने जा रही है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इस बार का आम बजट चुनाव और राजनीति के भंवर में फंस गया है। 4 जनवरी को चुनाव आयोग ने जैसे ही 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा की, वैसे ही राजनीतिक दलों ने मांग शुरू कर दी कि अब एक फरवरी को आम बजट प्रस्तुत नहीं किया जाए। ऐसे राजनीतिक दलों के नेताओं को लगता है कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है इसलिए आम बजट में राहत की घोषणाएं कर भाजपा 5 राज्यों में राजनीतिक फायदा उठाएगी। 4 जनवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त जैदी ने भी एक सवाल के जवाब में कहा कि आम बजट के बारे में चुनाव आयोग को जानकारी है। यानि चुनाव आयोग भी यह चाहता है कि केन्द्र सरकार एक फरवरी को आम बजट में ऐसी कोई घोषणा नहीं करें जो चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित करती हो। अब देखना है कि भंवर में फंसे बजट को केन्द्र सरकार किस प्रकार लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप प्रस्तुत करती है। हो सकता है कि एक फरवरी को सरकार का खर्च चलाने के लिए ही अन्तरिम बजट पेश किया जाए। चुनाव परिणाम के बाद राहत वाला बजट प्रस्तुत हो। यह तो तय है कि अब एक फरवरी वाले बजट में नागरिकों को कोई राहत नहीं मिल पाएगी। जीएसटी भी मुश्किल में : देश में एक समान कर प्रणाली यानि जीएसटी और बजट से पहले देशभर के वित्त मंत्रियों की एक बैठक 4 जनवरी को दिल्ली में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली की अध्यक्षता में हुई। सरकार ने जीएसटी बिल को संसद के दोनों सदनों में स्वीकृत करा रखा है और आगामी एक अप्रैल से देश भर में जीएसटी लागू होना है, लेकिन 4 जनवरी को जेटली की बैठक में दिल्ली, केरल, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के वित्त मंत्रियों ने जो तेवर दिखाए, उससे प्रतीत होता है कि देश के सभी राज्यों में जीएसटी लागू होना मुश्किल है। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा तो बैठक का बायकाट कर बाहर आ गए। दलगत राजनीति की वजह से देश में जनता की भलाई की योजनाएं भी लागू नहीं हो पा रही हैं। सब जानते हैं कि जीएसटी के लागु होने से देश में कर प्रणाली एक सी होगी। (एस.पी.मित्तल) 4-01-17)

नोट बंदी के 50 दिन पुरे होते ही सारे शुल्क जो एटीएम और कार्ड पेमेंट पर लगते थे, पुनः लगने शुरू हो गये है। अभी दो महीने होने वाले है लेकिन लोगो को तकलीफे कम होने का नाम नही ले रही है। कैश की किल्लत अभी भी बानी हुयी है। अभी भी आधे से ज्यादा एटीएम काम नही कर रहे है। उस पर से ये शुल्क लोगो और मुसीबत बढ़ा रहा है। अब अगर आप डेबिट कार्ड से 1000 रूपए पे कर रहे है तो आपको 0.5 फीसदी सरचार्ज देना होगा. अगर आप क्रेडिट कार्ड से 1000 रूपए पे कर रहे है तो आपको 25 रूपए सरचार्ज देना होगा। इसके अलावा किसी दुसरे बैंक के एटीएम से पांच से अधिक ट्रांजेक्सन करने पर बैंक 15 से 20 रूपए प्रति ट्रांजेक्सन चार्ज वसूलेगा। ये शुल्क नोट बंदी से पहले भी लगते थे जो 50 दिन के लिए हटा लिए गए थे। किसी भी योजना का असर हर बार केवल आम आदमी पर ही क्यों पड़ता है। अगर देश में कैश की किल्लत है और सरकार लोगो तक कैश नही पहुंचा पा रही है तो इसका खामियाजा एक आम इंसान क्यों भुगते। सरकार को इस बार में सोचना चाहिए। और जल्द से जल्द कोई कदम सरकार को उठाने पड़ेंगे।

जय श्री राम शुभ सोमवार भारत माता की जय ॐ नमः शिवाय आज सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला दिया भारतीय लोकतन्त्र का चेहरा बदल जायेगा । पर आज मीडिया बी सी सी आई और मोदी जी के परिवर्तन रैली तक सिमित रह गया और हो सकता है प्राइम टाइम भी इसमें ही खत्म हो । जबकि अगर आज का फैसला जन जन तक सही से पहुचाया जाय तो कल से लगभग 99 % राजनैतिक पार्टियो का भविष्य अंधकारमय और राजनितिक दुकान बन्द हो गई । अगर सही से इम्पलिमिटेशन से हुवा तो भारत का चुनाव सिर्फ इस बात पर होगा की आपके पास भविष्य की क्या योजना है और अपने कार्यकाल में देश प्रदेश को आप कहा लेकर गए क्योकि आज के फैसले के बाद लालू मुलायम नितीश ममता मायावती केजरीवाल ठाकरे बन्धु ओवेसी जैसे की दुकान तो तुरन्त बन्द क्योकि यह लोग धर्म जाति भाषा समुदाय की ही राजनीति करते है और अब कर नही सकते है वास्तव में टी एन शेषन के जैसे शायद टी एस ठाकुर भी अपने आपको भारतीय इतिहास में अमर कर गए । क्योकि जबसे यह मुख्य न्यायाधीश बने थे तबसे अब तक मतलब आज उनका कार्यकाल का आखिरी दिन है तक विवादों में रहे पर जो लोकतंत्र और देश के लिये फैसला दिये यह तो नोट बन्दी के बाद वोट बन्दी जैसा हो गया पर जिस फैसले पर महीनो बहस होनी चाहिए थी उसपर कुछ मिनट भी चर्चा नही हो पाना यह दर्शाता है की भारतीय मिडिया और भ्र्स्ट राजनेता के गठजोड़ पर कड़ा प्रहार था जिसे मिडिया जनता तक जाने नही दिया जब तक जनता जानेगी तब तक कोई न कोई रास्ता नेता निकाल लेगे क्योकि आपस में भ्र्ष्टाचार पर लड़ने वाले कांग्रेस और बीजेपी भी कहा एक थे अनुराग ठाकुर के सर्वोच्च न्यायालय में वकील कपिल सिब्बल ही थे जो अनुराग ठाकुर की नैया डुबो दिए अब राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड में भी उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिये हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मन्दिर निर्माण मुहीम अयोध्या

पाकिस्तानी कलाकारों के हिमायती चीन से देशभक्ति का सबक लें। 15 जनवरी तक कोई चीनी नागरिक भारत नहीं आ पाएगा। मुम्बई के फिल्म उद्योग में पाकिस्तानी कलाकारों के भाग लेने की हिमायत करने वाले फिल्म स्टारों, नेताओं और प्रगतिशील बुद्धिजीवी माने जाने वालों को चीन की देशभक्ति से सबक लेना चाहिए। चीन ने एक आदेश निकालकर भारत में ट्यूरिस्ट वीजा पर आए सभी चीनी नागरिकों को तत्काल भारत छोडऩे को कहा है। इतना ही नहीं चीन सरकार ने आगामी 15 जनवरी तक किसी भी चीनी नागरिक को भारत का वीजा नहीं देने का फैसला किया है। जो चीनी नागरिक इस आदेश को नहीं मानेगा, उसका पासपोर्ट रद्द कर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। इस आदेश के बाद चीनी नागरिकों ने पूरी तरह देशभक्ति दिखाते हुए भारत छोड़ दिया और न ही कोई चीनी नागरिक नए वर्ष का जश्न मनाने के लिए भारत आया है। ताजा हालातों में भारत सरकार की ओर से ऐसा कोई काम नहीं किया गया है, जो चीन सरकार को नाराज करें। लेकिन इसके बावूजद भी चीन ने जो सख्त कदम उठाया है उसके पीछे बोद्ध धर्मगुरु दलाई लामा की महाकाल चक्र पूजा है। दलाई लामा इन दिनों बिहार के बोध गया में इस पूजा को करवा रहे हैं। चूंकि बोद्ध धर्म के अनुयायियों में इस पूजा का विशेष धार्मिक महत्त्व हैं, इसलिए चीन को लगता है कि जो चीनी नागरिक इन दिनों भारत में होगा। वह महाकाल चक्र पूजा में ही भाग ले सकता है। जबकि चीन सरकार यह नहीं चाहती कि जो पूजा दलाई लामा करवा रहे हैं उस पूजा में कोई चीनी नागरिक भाग लें। चीन की इस कार्यवाही से हमारे उन लोगों को सबक लेना चाहिए जो पाकिस्तान के कलाकारों के भारत में काम करने के हिमायती हैं। एक तरफ चीन है जो दलाई लामा की पूजा में अपने नागरिकों को भाग लेने से रोक रहा है और दूसरी ओर जो पाकिस्तान आए दिन सीमा पर हमारे जवानों को शहीद कर रहा है तथा कश्मीर में आतंकवादी वारदातें करवा रहा है, उसी पाकिस्तान के कलाकार हमारे देश में धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। जब कभी इन कलाकारों का विरोध किया जाता है तो अनेक लोग हिमायती बनकर खड़े हो जाते हैं। इन हिमायतियों की वजह से ही भारत सरकार में इतनी हिम्मत नहीं की है कि वह चीन सरकार की तरह वीजा नहीं दे। (एस.पी.मित्तल) (02-01-17)

विषय :- कलह की भेंट चढ़ेगा या नाटक है सपा परिवार का झगड़ा?? देश की राजनीति का सबसे बड़ा सियासी परिवार आज कलह की भेंट चढ़ने को तैयार है !! सपा परिवार की इस नोटंकी से प्रदेश की जनता त्रष्त आ चुकी है!! कभी चाचा अंदर तो भतीजा बाहर कभी भतीजा अंदर तो चाचा बर्खास्त !! इतने के बाद की सपा परिवार का कहना है हम टूटे नही हम समाजवादी सरकार बनाएंगे!! ये सब कुछ जनता के ध्यान को आकर्षित करने के लिए तो कुछ ध्यान बाटने के लिए किया गया एक नाटक मात्र है!! वास्तविक में सब एक ही परिवार के चट्टे बट्टे है!! अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए और प्रदेश की जनता से भवनात्मक अपेक्षा के लिए ये परिवार इस नोटंकी को कर रहा है!! द्वारा:- पुनीत पांडेय युवा नेता ,गोरखपुर

*सस्ता ऋण या फिर मौत की गैरेंटी* *- किसानों को घर बनाने के लिए उपलब्ध कराया जायेगा सस्ता कर्ज* *- शहरों में जीवन यापन करने वाले भी उठा सकेंगे इस योजना का लाभ* *- बुन्देली किसान की दुर्गति पर दिखाई खाली झोली* *- लोन माफी के नाम पर किसानो की उम्मीदों पर फेरा पानी* *- के सी सी बनवाकर कर्ज तले दबे किसान क्या लेंगें और कर्ज* *- बैंक ऋण की वजह से सैकड़ों स्वीकार चुकें हैं मौत को* *- आसान क्या बैंक ऋण को चुकता करना या फिर आत्महत्या* :* 56 इंच का सीना लिए दहाड़ने वाले देश के प्रधानमन्त्री की छाती किसानों की कर्ज माफ़ी के सवाल पर 6 इंच में क्यों और कब परिवर्तित हो जाती है इस सवाल का जवाब बुन्देली गरीब किसानों को ना ही मोदी जे दे सकें हैं और न ही उनके अनुयायी। हर बार की तरह इस बार भी किसानों के कर्जमाफी पर प्रधानमंत्री ने कोई घोसणा तो छोड़िये चर्चा तक करना उचित नहीं समझा सुरुआत बैंक को अप्रत्याशित लाभ देने से हुयी और समापन भुखमरी की मार झेल रहे किसान को सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने की घोसणा कर बैंक की भेट चढ़ा देने पर कर दिया गया । नव वर्ष की पूर्व संध्या पर देश की जनता को संबोधित करने वाले प्रधानमंत्री ने वैसे तो बहुत से आलाप अलापे लेकिन उस सुर को लगाना वो भूल गए जिसको सुनने के लिए गरीब किसान किसी दुसरे के घर में जमीन पर या चौपाल लगाए रेडियों बीच में रक्खे बैठा था । चन्द रटे हुए शब्दों से शुरुआत करने वाले पीएम ने वैसे तो बहुत सी सहूलियत जनता और कृषकों को देने की बात कही जिसमे घर बनाने के लिए सस्ता ऋण आदि बातें थी परंतु वो शायद अपने सम्बोधन के दौरान ये भूल गए की जिन बैंकों द्वारा आप किसानों को मकान बनाने के लिए कर्ज उपलब्ध कराने जा रहें हैं उन्ही बैंको की वजह से सैकड़ों कृषक अब तक आत्महत्या कर चुकें हैं जो आज भी समाचार पत्रों में अपना स्थान मूल रूप से बनाये हुये है। बुन्देली धरा का वीर किसान जहां पहले ही बैंक द्वारा दिए जाने वाले केसीसी रूपी मायाजाल में फस कर दम तोड़ रहा वहीँ आपकी ये सहूलियत कहीं उसपर कोढ़ और खाज वाली कहावत तो सिद्ध होने नहीं जा रही है।सस्ता कर्ज उपलब्ध करा देने से क्या किसान की भुखमरी को ख़त्म किया जा सकेगा क्या कर्ज से बना मकान उसकी खेत पर फसल और पेट को दो वख्त की रोटी दे सकेगा ऊपर से बैंक और उनके भरस्ट कर्मचारी जो की बिना कमीशन लिए तो किसी गरीब की अर्थी को कफ़न नहीं देते क्या कर सकेंगें किसान का भला। अब तक न जाने कितने किसानों ने बैंकों द्वारा बनाये गए किसान क्रेडिट कार्ड का कर्ज ना चुकता कर पाने के चलते आत्महत्या जैसे रास्ते को अपना चुके हैं। जबरन कर्ज वसूलने की आदत से ग्रस्त बैंक और उनके कर्मचारी क्या वाकई शाहनभूति देंगे किसान और उनके परिवार को। जरूरत किसानो का शोषण रोकने की थी उनको वापिस उनके खोये सम्मान वापिस दिलाने की थी ताकि कम से कम भूख से रोते बिलखते उस गरीब किसान के बच्चों को दो वख्त की रोटी मिल सके और ये सब तब हो सकता था जब उनके बैंक के ऋण को माफ़ कर दिया जाता न की जरूरत थी मकान बनाने के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध करा कर उनके शोषण को और बढ़ाने की।बुन्देली कृषक बैंक के ऋण से छुटकारा पाने के लिए झटपटा रहा है तड़प रहा है अपनी कुंठित जिंदगी को बचाने के लिए अगर बचाना है उसको। शोषण मुक्त करना है उसे। तो बैंको के मायाजाल से छुटकारा दिलाइए ना की सस्ता कर्ज देकर मौत की गारंटी दीजिये। लेखक की व्यग्तिगत राय

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