Public Opinion

Public Opinion (238)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जालंधर में कहा है कि कांग्रेस तो अब एक डूबता हुआ जहाज है और इसी के साथ एक प्रसिद्ध हिंदी अखबार ने ‘परिवार’ के बारे में जो खबर छापी है, यदि वह सत्य है तो इस जहाज को डूबने से कोई नहीं बचा सकता। अखिलेश भी नहीं। अखिलेश की सायकिल पर कांग्रेस सवार जरुर हो गई है लेकिन उत्तरप्रदेश के सबसे लोकप्रिय अखबार में छपी यह खबर कांग्रेस को ले बैठेगी। इस सबसे बड़ी खबर में कांग्रेस का नाम एक बार भी नहीं लिया गया है लेकिन ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस ‘परिवार’ के बारे में हमारी जांच एजेंसियों ने जो खोज-पड़ताल की है, उससे पता चलता है कि उसे आगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाॅप्टरों के सौदे में 200 करोड़ रु. की रिश्वत मिली है। यह सौदा 12 बड़े हेलिकाॅप्टरों के लिए मनमोहनसिंह सरकार ने किया था। यह सौदा 5620 लाख रु. का था। इसमें प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को एक पैसा भी नहीं मिला। इस सौदे के दो दलालों-गुइडो हस्के और क्रिश्चियन मिशेल ने परिवार को सिर्फ 200 करोड़ रु. ही पहुंचाए। Rahul Gandhi, राहुल गांधीआधा पैसा वे खुद खा गए। हमारी खुफिया एजेन्सियों ने उन बैंक-खातों के सुराग पा लेने का दावा किया है, जिनके जरिए यह पैसा ‘परिवार’ तक पहुंचा है। जिन कंपनियों के नाम यह पैसा आया है, उनका भी पता चल गया है। हमारी सरकार ने आठ देशों से पूछताछ की है। उनमें से छह देश पूरा सहयोग कर रहे हैं। हो सकता है कि हिंदी अखबार में छपी इस खबर का असर जरा देर से हो, क्योंकि हमारे नेताओं, अफसरों और कुछ पत्रकारों के दिमाग पर अंग्रेजी की गुलामी छाई रहती है लेकिन इसमें शक नहीं कि पांच राज्यों के इस चुनावी दंगल में यह खबर तहलका मचा देगी। यह खबर अगर मनगढ़ंत हैं और अखबार में सरकार ने दबाव देकर छपवाई है तो कांग्रेस चुप क्यों हें? वह ‘परिवार’ को खुली जांच के लिए जनता के सामने पेश क्यों नहीं कर देती? सरकार भी चुप है। यह चुप्पी रहस्यमयी है। अखबार के पहले सरकार को बोलना चाहिए था। यदि यह खबर सच निकल गई तो इसका असर बोफोर्स से भी ज्यादा बुरा होगा।

क्या लखनऊ के हर चौराहे पर लगे यह पोस्टर बैनर आचार संहिता की धज्जियाँ तो नहीं ना उड़ा रहीं? या फिर चुनाव आयोग की इनके प्रति ढ़ील तो नहीं?

अलाउद्दीन खिलजी और मलिक काफूर के प्यार पर क्या कोई संजय लीला भंसाली या अनुराम कश्‍यप फिल्म बनाएगा ? कफूर को कैसा लगता होगा, जबकि उसका प्रेमी किसी और रानी की तारीफ करता होगा... एक खूबसूरत सुल्तान, गोरा, लंबा, तगड़ा, योद्धाओं सा बदन और तीखे नयन-नक्श वाला. ख़ुदा की बनाई इस दुनिया में ज़मीन के एक बहुत बड़े टुकड़े का बादशाह. ये बादशाह जब ग़ुलाम हुआ तो अपने ग़ुलाम का! दूसरा ग़ुलाम भी कम ना था- वो गोरा-चिट्टा, लंबा और प्यारा सा चेहरा, तराशे हुए नयन-नक्श, बहुत तीखे न होते हुए भी एक आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था. इतिहासकारों ने लिखा है कि बादशाह का इश्क़ भी ऐसा था कि अपने मोहब्बत के निशानी के तौर पर वो हर वक़्त गले में ज़ुन्नार डाले घूमता था. कितना मुश्किल होगा उसका इश्क़, जब समाज रूढ़ियों पर चला करता था (आज की तरह नहीं कि फिल्म है... बस फिल्म है बोलकर आप कुछ भी कहने और दिखाने के लिए आज़ाद हो जाते हैं)! सोचिए तब क्या हुआ होगा जब उसके प्यार के बीच धर्म आ गया होगा. एक सुल्तान के लिए उस वक्त ये ज्यादा मुश्किल समय रहता होगा. आज की तरह नहीं कि कोर्ट चले गए और घरवालों के मुंह पर कागज़ का एक टुकड़ा मार दिया. वो वक्त ज्यादा मुश्किल इसलिए होता होगा क्योंकि हर राजा या बादशाह से ये अपेक्षा रहती है कि वो खुद 'अपने' बनाए रास्ते पर चले और लोगों के लिए मिसाल कायम करे. सोचिए किस तरह उसका हाथ पकड़े सुल्तान अपने महल के मुंडेरों से अपनी रियाया और रियासत को चुपके से देखता होगा. चांदनी रातों में दोनों की चहलकदमी कितनी मनोरम होती होगी. कैसे वो महल में साथ साथ चलते हुए अपने साथी को सिर्फ डराने के लिए, केवल मज़ाक में या उसको छेड़ने के लिए ही कभी कभी उसका हाथ पकड़ लेते होंगे. फिर ग़ुलाम सुल्तान की इस हरकत से डर जाता होगा. उनकी तरफ गुस्से से देखता होगा. पहले तो सुल्तान के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान खेल जाती होगी, फिर हालात को भांपते हुए, वो किस तरह और कितने प्यार से काफूर को मानते होंगे. जब दोनों अंतरंग होते होंगे तब का उन दोनों का संवाद कितना रोमांचक होता होगा. कितना मुश्किल होगा सुल्तान के लिए मैदान-ए-जंग में उसके लिए टाइम निकलना. जब तमाम दुश्वारियों के बावजूद वो मिला करते होंगे उन शामों की मुलाकात कितनी रोमांटिक हुआ करती होगी. लेकिन ग़ुलाम की मनोस्थिति तब कैसी रही होगी, जब उसे पता चला होगा कि उसका साथी, उसका सुल्तान किसी राजघराने की महादेवी पर आसक्त है. कितनी पीड़ा और वेदना से वो गुजरा होगा. सुल्तान के मुंह से बार बार महादेवी की सुंदरता की तारीफ सुनकर कैसे उसका चेहरा उतर जाया करता होगा. चेहरे का रंग फीका पड़ जाता होगा. कैसे अचानक उसके मुंह का स्वाद बदल जाया करता होगा जब सुल्तान के पीछे चलते हुए, उसे महादेवी की रमणीयता की कहानी सुननी पड़ती होगी. यही नहीं दिल में टिस होते हुए भी उसे सुल्तान की हां में हां मिलानी पड़ती होगी. इस बात का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं कि उसका जीवन कितना कठिन और अवसाद से घिरा रहा होगा. अगर इस दृष्टिकोण पर फिल्म बनाई जाए तो अभिनय और निर्देशन दोनों आयामों के लिए ये चैलेंजिंग रहेगा. हालांकि ऐसा चैलेंज हिंदुस्तानी सिनेमा के भविष्य लिए ज्यादा अच्छा होगा और दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिलेगा.

सारांश "सचाई का रास्‍ता कंकालों से बना है जिन पर हम चलने की हिम्‍मत कर रहे हैं" मोहनदास करमचंद गांधी, नोआखाली, 1947 बीसवीं सदी में दुनिया महात्मा गांधी की मेधा से चमत्कृत हो गई थी. तीसरी दुनिया के गुलाम देश भारत से निकली इस अद्भुत प्रतिभा ने पूरी दुनिया के गुलाम देशों और नेताओं को रास्ता दिखाया था. आज भारत अपनी उस महान थाती को सहेज पाने में कितना सफल या असफल है, इसका एक आकलन हम अपनी उस नई पीढ़ी के जरिए लगा सकते हैं जिसके हाथों में भारत का भविष्य होगा. हमारे स्कूली छात्रों के मन में महात्मा गांधी की क्या छवि है, उनकी हत्या को आज के छात्र कैसे देखते हैं, इसे जानने की एक कोशिश इस आलेख में की गई है. किसी की हत्‍या की गई हो तो उसकी वजह भी होगी. महात्मा गांधी की भी हत्‍या की गई थी. जाहिर है, इसकी भी कोई वजह होगी. वैसे क्‍या वजह है? हम कह सकते हैं, 68 साल बाद क्‍या यह भी कोई सवाल है? ऐसा सवाल जिसका जवाब तलाशने की जरूरत हो? पिछले दिनों उत्‍तरी बिहार के एक स्‍कूल में कुछ साथियों के साथ जाना हुआ. हमें नौवीं क्‍लास के छात्रों से रू-ब-रू होना था. यह उस शहर का नामी निजी स्‍कूल है. स्‍टूडेंट भी मेधावी हैं. हम इनसे बातचीत का मौजू तलाश रहे थे. जनवरी का महीना है. हमें सूझा, क्‍यों न महात्मा गांधी की हत्‍या पर बात की जाए. देखा जाए बच्‍चे क्‍या सोचते या जानते हैं? तो हमने तय किया कि इसी पर बात होगी. क्‍लास में करीब 60 लड़के-लड़कियां होंगे. सबकी उम्र 15 के आसपास होगी. हमारे सामने सवाल था, कहां से और कैसे शुरू किया जाए. हमने बोर्ड पर लिखा ‘30 जनवरी.’ बातचीत शुरू हुई. क्‍या 30 जनवरी कुछ खास तारीख है? सभी छात्रों से अलग-अलग जवाब मिले- इस दिन गांधी जी की हत्‍या हुई थी...शहीद दिवस है... गांधी जी राष्‍ट्रपिता हैं आदि. हमार अगला सवाल था- अगर हत्‍या हुई थी तो क्‍या आप बता सकते हैं, गांधी जी की हत्‍या किसने की थी? नाथूराम गोडसे- ये जवाब ज्‍यादातर बच्चे जानते थे. इसके बाद सवाल किया गया- नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को क्‍यों मारा? इसके जवाब काफी अलग-अलग थे. कुछ व्‍यक्तिगत जवाब थे तो कुछ सामूहिक. इन जवाबों से ये भी झलक मिलती है कि गोडसे को बच्चे क्‍या समझते हैं? स्‍टूडेंट क्‍या मानते हैं? समाज क्‍या मानता है? समाज में क्‍या-क्‍या प्रचारित है? स्‍टूडेंट से जो जवाब मिले उनके मुताबिक, गांधी जी देश के बंटवारे के लिए जिम्‍मेदार थे. गोडसे यह मानता था कि गांधी जी की वजह से भारत-पाकिस्‍तान का बंटवारा हुआ. गांधी जी मुसलमानों के साथ रहना चाहते थे. वे सब कुछ मुसलमानों को दे देना चाहते थे. कई लोग उनसे सहमत नहीं थे. गांधी जी को केवल मुसलमानों की चिंता थी. गांधी जी पाकिस्‍तान को पैसा दिलाने के लिए अनशन पर बैठ गए थे. गांधी जी भारत के खजाने से पाकिस्‍तान को पैसा देना चाह रहे थे. गांधी जी पाकिस्‍तानी पक्षी थे. नाथूराम को चिंता थी कि आजादी के बाद मुसलमानों को देश का बड़ा भाग मिल जाएगा और उन्‍हें ज्‍यादा संसाधान देना होगा. पाकिस्‍तान पूर्व और पश्चिम दोनों ओर था. गांधी जी पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्‍तान के बीच सम्‍पर्क के लिए भारत के बीच से रास्‍ता बनाने को तैयार हो गए थे. यानी अभी जो बांग्‍लादेश और पाकिस्‍तान है, गांधी जी इनके बीच आने-जाने के लिए भारत से होकर सड़क बनाने पर राज़ी हो गए थे. हमारे घर में घुसकर पाकिस्‍तान जाता. इससे सुरक्षा को खतरा पैदा होता. लड़ाई होती. इसकी वजह से गांधी जी कि हत्‍या की गई. गोडसे आरएसएस (राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ) से जुड़ा था. आरएसएएस हिन्‍दू राष्‍ट्र बनाना चाहता था. गांधीजी सेक्युलर राष्‍ट्र बनाना चाहते थे. यह मांग की जा रही थी कि अगर पाकिस्‍तान एक मुसलिम देश है तो भारत को हिन्‍दू राष्‍ट्र बनना चाहिए. गांधीजी इस राय से सहमत नहीं थे. जिन्‍ना और नेहरू सत्‍ता चाहते थे. इन्‍होंने गांधीजी को मरवा दिया. गोडसे चाहता था कि हिन्‍दू राष्‍ट्र बने. गांधीजी सेक्‍यूलर राष्‍ट्र चाहते थे. इसलिए मार दिया. नाथूराम ने गांधीजी को मुसलमान के भेष में मारा ताकि दंगा हो जाए. गांधीजी हिन्‍दू-मुसलमान एकता चाहते थे. वे सेक्‍युलर थे. हिन्‍दू मुसलमान का साथ नाथूराम को पसंद नहीं था. इसलिए मार दिया. वह दंगों के खिलाफ थे. वह बंटवार नहीं चाहते थे. और गांधी जी बनिया थे, इसलिए वे आरक्षण चाहते थे. गोडसे ब्राह्मण और आरक्षण विरोधी था. इसलिए मार दिया. तीन-चार बातों को छोड़ दें तो ज्‍यादातर बातों को एक से ज्यादा छात्रों का समर्थन था. राय देने वालों में सभी धर्म के बच्चे शामिल थे. यही नहीं, इन शहरी स्‍टूडेंट के अलावा हमने तीन अलग-अलग जिलों और गांवों के करीब 15 लड़के-लड़कियों से भी यही जानने की कोशिश की. कुछ बच्चों को लगता था कि गांधी जी आरक्षण समर्थक थे और गोडसे विरोधी इसीलिए उसने गांधी की हत्या कर दी इनमें अधिकांश बच्‍चे दलित परिवारों के हैं. अलग-अलग सरकारी स्‍कूलों में अलग-अलग क्‍लास में पढ़ रहे हैं. अलग-अलग उम्र के हैं. उनमें से कइयों को न तो 30 जनवरी के बारे में जानकारी थी और न ही वे नाथूराम गोडसे के बारे में जानते थे. सीनियर क्‍लास के दो-तीन लड़कों को गांधीजी की हत्‍या के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी थी. वे नाथूराम को जान रहे थे. उनके मुताबिक, गांधी ने देश का बंटवारा कराया, इसलिए नाथूराम ने उन्‍हें मार दिया. लेकिन ये सभी ग्रामीण बच्‍चे गांधी जी को जानते थे. उनका मानना था कि गांधी जी हिन्‍दू-मुसलमानों के बीच एकता के लिए लड़ रहे थे. गांधी जी की हत्‍या क्‍यों की गई- इस सवाल के जो जवाब मिले उसे हम किस तरह देखें: गांधी जी मुसलमान और पाकिस्‍तान के पक्षधर थे. मुसलमान हर चीज में बड़ा हिस्‍सा चाहते थे. गांधीजी उन्‍हें हिस्‍सा दिलाने के लिए अनशन पर बैठे. वो देश का बंटवारा चाहते थे. वह हिन्‍दू राष्‍ट्र के विरोधी थे. वह धर्मनिरपेक्षता चाहते थे. नाथूराम गोडस आरएसएस से जुड़ा था. भारत को हिन्‍दूराष्‍ट्र बनाना चाहता था. ये परस्‍पर विरोधी विचार हैं, लेकिन पहले दो विचारों की पैठ ज्‍यादा अंदर तक और बड़े समूह तक है. हमने इन सबसे जानना चाहा कि आखिर गांधी जी की हत्‍या के बारे में उन्‍हें ये जानकारियां कहां से मिलीं. ज्‍यादातर का कहना था, सुना है. कुछ ने कहा, कहीं पढ़ा है. कुछ ने बताया, क्‍लास में पढ़ा है. सर ने बताया है लेकिन ज्‍यादतर की जानकारी का स्रोत गैर स्‍कूली शिक्षा है. बच्‍चे-बच्चियों की इस जानकारी में कई चीजें काफी अहम भूमिका अदा करती नजर आ रही हैं. मसलन उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्‍ठभूमि क्‍या है? वे किस धर्म या जाति से आते हैं? कहां पढ़ते हैं? कहां रहते हैं? जानकारियों का जरिया क्‍या है? यही नहीं, गांधीजी की हत्‍या के बारे में बच्‍चों को कई बातें ऐसी पता हैं, जिनका सिर-पैर नहीं है. हालांकि उनके दिमाग में ये बातें हैं, इसका मतलब समाज में भी ये बातें किसी न किसी रूप में हैं. खासकर मध्‍यवर्गीय परिवारों से आने वाले ब‍च्‍चे-बच्चियों की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि इस मुल्‍क में उनके मुताबिक आज जो भी समस्‍याएं हैं, उसके लिए गांधीजी जिम्मेदार हैं. बातचीत के दौरान कई बार ऐसा भी लगा कि गांधीजी की हत्‍या के बारे में जब इतने तर्क प्रचारित या प्रसारित हैं तो क्‍या समाज में कुछ लोग इस हत्‍या को सही ठहराने का तर्क तो नहीं मुहैया कराते हैं? ये खुलकर हत्‍या को जायज नहीं ठहराते हैं. मगर उन तर्कों में जायज ठहराने के बीज छिपे होते हैं. इन जायज ठहराने वाले तर्कों का आधार वे बातें हैं, जिनको आसानी से ‘राष्‍ट्रवाद’ का जामा पहनाया जा सकता है. हालांकि, गांधीजी के विचार की जब बात आई तो कुछ ब‍च्‍चे-बच्चियों ने पुरजोर तरीके से कहा, कि वे हिन्‍दू-मुसलमान की एकता चाहते थे. इनमें ज्‍यादातर गांव के बच्चे थे. हममें से कोई इतिहासकार नहीं है. हमने गांधीजी की कही गई बातों और उन पर लिखी कुछ किताबों के आधार पर ये संवाद जारी रखने की कोशिश की. हमारा जोर इस बात पर था कि सुने पर यकीन न करें. खुद पढ़े, शोध करें, विचार करें तब मानें. खासकर गांधीजी की कही बातों को जरूर पढ़ें. कोई देश एक राष्‍ट्र तब ही बन सकता है जब उसमें दूसरों को अपने में समाहित करने लेने की क्षमता होः महात्मा गांधी गांधीजी को क्‍यों मारा गया, इसका सही-सही जवाब इतिहासकार ही दे पाएंगे. फिर भी इतिहास के किताबों में लिखे तथ्‍यों से इतर भी समाज में घटनाओं की अपनी कहानी होती है. यह कहानी बताती है कि हम घटनाओं और उसके पात्रों को किस रूप में देखते हैं या देखना चाहते हैं. अक्सर एक ही घटना का ब्‍योरा अलग-अलग समाजों में अलग रूपों के साथ मिलता है. इसमें कुछ तथ्‍य होता है. कुछ कल्‍पना. कुछ अपनी इच्‍छा होती है. कुछ विचार की भूमिका होती है. मगर सबसे अहम होता है कि हम घटना को कहां से, किस कोण से क्‍यों देख रहे हैं. इस‍ लिहाज से बच्‍चे-बच्चियों के जरिए यह जानना अहम है कि आखिर गांधी जी को क्‍यों मारा गया. यह हमारे समाज और हमारी शिक्षण प्रणाली का भी आईना है. अगर हम बापू की हत्‍या को इस मुल्‍क के इतिहास की बड़ी अहम घटना मानते हैं तो इतना तय है कि इस अहम घटना की सही तस्वीर पेश करने में हमारी स्‍कूली शिक्षा बुरी तरह से असफल रही है. इसके बरअक्‍स कई ऐसे जरिए हैं, जो बच्‍चों तक जानकारी पहुंचा रहे हैं. तथ्‍य क्‍या बोलते हैं? अब हम जरा ऊपर गिनाए गए गांधी जी की हत्‍या की वजहों पर विचार करते हैं. इतिहासकार या शोधकर्ताओं का सहारा लेते हैं और तथ्‍य की तह तक जाने की कोशिश करते हैं. क्‍या गांधी जी बंटवारा चाहते थे? उन्‍होंने पाकिस्‍तान बनवाया था? गांधी जी इस विचार के पूरी तरह खिलाफ थे कि हिन्‍दू और मुसलमान दो राष्‍ट्र हैं. उनका मानना था, ‘राष्‍ट्रवाद धर्मों से ऊपर है और इस अर्थ में हम भारतीय पहले हैं और हिन्‍दू, मुसलमान, ईसाई या पारसी बाद में.’ एक जगह वे कहते हैं, ‘धर्म, राष्‍ट्रीयता का माप नहीं है. वह तो व्‍यक्ति और उसके भगवान के बीच का व्‍यक्तिगत मसला है.’ गांधी जी एक और जगह लिखते हैं, ‘चूंकि भारत में विभिन्‍न धर्मावलम्‍बी निवास करते हैं मात्र इसलिए ऐसा मानना अनुचित होगा कि भारत एक राष्‍ट्र नहीं है. किसी देश में विदेशियों के आने से वह राष्‍ट्र नष्‍ट नहीं हो जाता बल्कि विदेशी उस राष्‍ट्र में घुलमिल जाते हैं, उसका हिस्‍सा बन जाते हैं. कोई देश एक राष्‍ट्र तब ही बन सकता है जब उसमें दूसरों को अपने में समाहित करने लेने की क्षमता हो. भारत हमेशा से ऐसा ही राष्‍ट्र रहा है. सच तो यह है कि किसी देश में उतने धर्म होते हैं जितने लोग उस राष्‍ट्र में निवास करते हैं परंतु जो लोग राष्‍ट्रीयता की मूल आत्‍मा की समझ रखते हैं वे कभी एक-दूसरे के धर्मों में हस्‍तक्षेप नहीं करते. यदि किसी देश के नागरिक एक-दूसरे के धर्मों में हस्‍तक्षेप करते हैं तो उस देश को सच्‍चा राष्‍ट्र नहीं कहा जा सकता. फिर भी हिन्‍दू, मुसलमान, पारसी ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक-देशी, एक-मुल्‍की हैं. वे देशी भाई हैं और उन्‍हें एक दूसरे के स्‍वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा. दुनिया के किसी भी हिस्‍से में एक-राष्‍ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है, हिन्‍दुस्‍तान में तो ऐसा था ही नहीं.’ राजमोहन गांधी ने अपनी किताब ‘मोहनदास’ में लिखा है कि गांधीजी जबरन बंटवारे और जबरन एकता के खिलाफ थे. वे अंत-अंत तक ‘मजबूरी में’ या ‘द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत’ के आधार पर देश के बंटवारे के खिलाफ थे. वे आपसी समझौते के आधार पर प्रांतीय बंटवारे के बारे में सोचने को तैयार थे. 11 मार्च 1947 को उन्‍होंने कहा, "अगर जिन्‍ना साहब मुझसे कहते हैं: ‘पाकिस्‍तान की मांग मानो वरना मैं तुम्‍हारी हत्‍या कर दूंगा’, मेरा जवाब होगा: अगर आपको लगता है तो आप मेरी हत्‍या कर सकते हैं. लेकिन यदि आप पाकिस्‍तान चाहते हैं तो सबसे पहले आपको मुझे इसकी वजह बतानी होगी. इसकी व्‍याख्‍या करनी होगी. मुझे तर्कों से संतुष्‍ट करना होगा." आजादी के वक्‍त यह मुल्‍क कैसा होगा या इसका भूगोल क्‍या होगा, गांधीजी दूर से ही यह सब देख रहे थे आजादी से पहले के आखिरी चंद महीनों में गांधी को बहुत सारी बातों के बारे में जानकारी नहीं थी. पंजाब के बंटवारे के प्रस्‍ताव के बारे में गांधी जी को अखबारों से पता चला. राजमोहन गांधी के मुताबिक इसके बाद गांधी जी ने वल्‍लभ भाई पटेल को पंजाब के बंटवारे के बारे में जानकारी देने के लिए खत लिखा था. आजादी के वक्‍त यह मुल्‍क कैसा होगा या इसका भूगोल क्‍या होगा, गांधीजी दूर से ही यह सब देख रहे थे. इतिहासकारों के मुताबिक, बहुत सारी बातों का फैसला उनकी जानकारी के बगैर हो रहा था. राजमोहन गांधी ने बहुत विस्‍तार से लिखा है कि कैसे गांधी हर रोज इस प्रयास में जुटे थे कि इस मुल्‍क का बंटवारा न हो. वे इसके लिए किसी हद तक जाने को तैयार थे. यह कहना शायद बेहतर होगा कि आखिरी दिनों में नेहरू, पटेल, कृपलानी, मौलाना आजाद, मुहम्‍मद अली जिन्‍ना, लियाकत अली खां फैसला ले रहे थे. इनके फैसलों पर देश के कई हिस्‍सों में हो रही खूरेंजी असर डाल रही थी. गांधीजी दिल्‍ली से दूर पहले बंगाल और फिर बिहार में खूरेंजी रोकने में जुटे थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्‍तक ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखा है कि गांधी ने आजाद और एकजुट भारत की लड़ाई ताउम्र लड़ी और आखिर में वो विलगाव और उदासीनता के साथ इसका विभाजन ही देख सके... 15 अगस्‍त 1947 के दिन गांधी दिल्‍ली में नहीं थे. वे कश्‍मीर होते हुए कोलकाता चले आए थे. वहां उन्‍होंने आजादी का पहला दिन 24 घंटे उपवास रखकर मनाया. रामचंद्र गुहा लिखते हैं, "जिस आजादी के लिए उन्‍होंने इतना लम्‍बा संघर्ष किया वह एक अस्‍वीकार्य कीमत के बिना पर मिली थी. आजादी का मतलब बंटवारा भी था." इतिहासकार सुमित सरकार ने अपनी किताब ‘आधुनिक भारत’ में कहा है कि आखिरी के साल महात्‍मा गांधी के श्रेष्‍ठतम काल हैं. सरकार लिखते हैं, "कांग्रेसी नेतृत्‍व से अधिकाधिक रूप से कटते हुए 77 साल के इस बूढ़े व्यक्ति ने अदम्‍य साहस के साथ पहले नोआखाली के गांवों, फिर बिहार, और फिर कलकत्‍ता और दिल्‍ली के दंगाग्रस्‍त इलाकों में अपना सब कुछ यह सिद्ध करने के लिए दांव पर लगा दिया कि अहिंसा और हृदय-परिवर्तन के जिन सिद्धांतों को उसने जीवन भर माना है, वे झूठे नहीं हैं." क्‍या इन बातों से ये लग रहा है कि वे मुल्‍क का बंटवारा चाहते थे? तो आखिर ‘द्विराष्‍ट्रवाद का सिद्धांत’ आया कहां से? मुल्‍क को दो टुकड़ों में बांटने वाला विचार ‘द्विराष्‍ट्रवाद का सिद्धांत’ है. इस सिद्धांत का मूल है- हिन्‍दू और मुसलमान दो राष्‍ट्र हैं. एजी नूरानी अपनी पुस्‍तक ‘सावरकर एंड हिन्‍दुत्‍व’ में लिखते हैं कि सावरकर ने सबसे पहले ‘द्विराष्‍ट्रवाद का सिद्धांत’ दिया. उन्‍होंने इसे सबसे पहले 1923 में अपनी पुस्‍तक ‘हिन्‍दुत्‍व’ में इसे पेश किया. उन्होंने 30 दिसम्‍बर 1937 को हिन्‍दू महासभा में अपने अध्‍यक्षीय भाषण में इसे रखा. उन्‍होंने कहा, ‘भारत में हिन्‍दू और मुसलमान, मुख्‍यत: दो राष्‍ट्र हैं.’ एक साल बाद 1938 में उन्‍होंने कहा, "भारत-हिन्‍दुस्‍थान में हिन्‍दू एक राष्‍ट्र हैं और मुसलमान एक अल्‍पसंख्‍यक समुदाय हैं." दूसरी ओर, मुहम्‍मद अली जिन्‍ना ने अपना ‘द्विराष्‍ट्रवाद का सिद्धांत’ 1939 में साफ और औपचारिक तौर पर पेश किया. इसी सिद्धांत की वजह से मुल्‍क का बंटवारा हुआ. इसके बरअक्‍स हमने देखा कि गांधी ने ‘द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत’ का कभी समर्थन नहीं किया. इसलिए गांधी पर यह इल्‍जाम सरासर उनके साथ ज्‍यादती है. 1971 में बांग्‍लादेश के बनने के बाद ‘द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत’ का खोखलापन भी सामने आ गया. गांधी जी कितने सही था, इससे साबित हो गया. गांधी बंटवारे के लिए जिम्‍मेदार थे, इसलिए नाथूराम गोडसे ने उन्‍हें मार दिया? दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद गांधीजी पर कई हमले या हत्‍या की कोशिशें हुईं. एक सूची के मुताबिक 1922 से 1948 के बीच गांधीजी पर हमले या उनकी जान लेने की लगभग 15 कोशिशें हुईं. इनमें 10 गंभीर किस्‍म की थीं. इनमें से छह 1934 से 1946 के बीच की घटनाएं हैं. तब न तो बंटवारा हुआ था और न ही पाकिस्‍तान बना था. यही नहीं 1948 में ही 30 जनवरी से पहले भी इस तरह की दो कोशिश हो चुकी थी. नाथूराम गोडसे अकेला नहीं था. 30 जनवरी 1948 के पहले भी नाथूराम गोडसे दो बार गांधी की जिंदगी लेने की कोशिश कर चुका था. इसलिए ये विचार कि बंटवारे की वजह से नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्‍या की, सही नहीं है. तो क्‍या गांधी जी मुसलमान परस्‍त थे? गांधीजी किसी के परस्‍त नहीं थे. अपने को सनातनी हिन्‍दू कहते थे और गाते थे, ‘वैष्‍णव जन तो तेने कहिए, जो पीर पराई जाणे रे.’ हां, वे मुसलमानों, पारसियों, सिखों, ईसाइयों से नफरत नहीं करते थे. किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ थे. वे मानते थे, ‘हिन्‍दू और मुसलमान दोनों भारत की संतान हैं. वे सब लोग जो इस देश में जन्‍मे हैं और जो इसे अपनी मातृभूमि मानते हैं, वे चाहे हिन्‍दू हों या मुसलमान या पारसी या ईसाई, जैन या सिख, वे सब समान रूप से उसकी संतान हैं और इसीलिए वे भाई-भाई हैं और खून से भी ज्‍यादा मजबूत बंधन से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं.’ अपने जीवन के आखिरी सालों में आजादी से पहले और बाद में उनकी एकमात्र चिंता भारत की संतानों की एकता थी. वे नफरत बोने वाले के खिलाफ कोई मुरव्‍वत नहीं बरतते थे. फिर वह चाहे मुसलमान हों या हिन्‍दू या सिख. वे उस कठिन वक्‍त में एकमात्र ऐसे नेता थे और शायद अब तक हैं जो हिन्‍दुओं, मुसलमानों या सिखों के उत्‍तेजित और हिंसक समूह के साथ आंख में आंख डालकर बात करने की ताकत रखते थे. 1946-47 के उनके विचार को पढ़ते हुए यह साफ है कि उन्‍होंने नोआखाली के मुसलमानों को सामने बैठाकर लानत-मलामत की. आगे उनके कुछ विचार हैं, जो गांधी जी ने नोआखाली और दिल्‍ली में शांति कायम करने के दौरान रखे थे. ‘हम हिन्‍दू हों या मुसलमान, सभी हिन्‍दुस्‍तानी हैं. आजाद हिन्‍दुस्तान में हम एक-दूसरे के दुश्‍मन बनकर नहीं रह सकते. हमें आपस में दोस्‍त और भाई बनकर ही रहना चाहिए.’ ‘भारतमाता ने ऐसे कौन से पाप किए हैं कि उसके हिन्‍दू और मुसलमान बच्‍चे आज आपस में लड़ रहे हैं.’ ‘आप लोग मेरी बात मानें चाहे न मानें, मगर मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूं कि मैं हिन्‍दू-मुसलमान दोनों का सेवक हूं. पाकिस्‍तान जोर जबरदस्‍ती से कायम नहीं किया जा सकता. अपने मुसलमान भाइयों से मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि चाहे आप हिन्‍दुस्‍तान में एक प्रजा बनकर रहें, चाहे अलग होकर दो जुड़ी-जुड़ी प्रजाओं की तरह रहें, हर हालत में आपको चाहिए कि आप हिन्‍दुओं को अपना दोस्‍त बनाकर रहें. एक हजार हिन्‍दुओं का सौ मुसलमानों को घेर लेना या एक हजार मुसलमानों का सौ हिन्‍दुओं को घेर लेना और उन पर जुल्‍म करना बहादुरी नहीं, बुजदिली है. ‘बंगाल में मुसलमानों ने हिन्‍दुओं को कसाई की तरह कत्‍ल किया और कसाईपन से भी बदतर काम किए. उधर बिहार में हिन्‍दुओं ने भी मुसलमानों को उसी तरह कत्‍ल किया. जब दोनों ने ही दुष्‍टता से काम किए हैं, तब दोनों की करतूतों का मुकाबला करना या यह कहना फजूल है कि एक दल दूसरे दल से कम बुरा है. इसी तरह यह पूछने में भी कोई सार नहीं कि पहले दंगा किसने शुरू किया था.’ ‘हिन्‍दुओं और मुसलमानों के लिए यह शर्म की बात है कि हिन्‍दुओं को इस तरह अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा. मुसलमानों के लिए यह शर्म की बात इसलिए है कि हिन्‍दू उन्‍हीं की डर से अपने घर-बार छोड़ कर भाग गए थे. एक इंसान दूसरे इंसान में डर क्‍यों पैदा करे...’ ‘मुझे तब तक शांति और आराम नहीं मिलेगा, जब तक एक-एक मुसलमान, हिन्‍दू और सिख हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान में फिर से अपने घर में नहीं बस जाएगा. अगर कोई मुसलमान दिल्‍ली या हिन्‍दुस्‍तान में नहीं रह सका और कोई सिख पाकिस्‍तान में नहीं रह सकता, तो हिन्‍दुस्‍तान की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद या ननकाना साहब और पंजा साहब का क्‍या होगा? क्‍या इन पवित्र स्‍थानों में दूसरे काम होने लगेंगे? ऐसा कभी भी नहीं हो सकता है. मैं पंजाब जा रहा हूं ताकि वहां के मुसलमानों को उनकी गलती सुधारने के लिए कह सकूं. लेकिन जब तक मैं दिल्‍ली के मुसलमानों के लिए न्‍याय नहीं पा सकता तब तक पंजाब में सफल होने की आशा नहीं कर सकता. मुसलमान दिल्‍ली में पीढ़ियों से रहते आए हैं. अगर हिन्‍दू और मुसलमान फिर से भाई की तरह रहने लगें तो मैं पंजाब की तरफ बढूंगा और पाकिस्‍तान में दोनों जातियों के बीच मेल पैदा करने के लिए कुछ करूंगा या मरूंगा... (18 सितम्‍बर 1947 का प्रवचन) क्या इन विचारों से लगता है कि गांधी सिर्फ मुसलमानों की बात कर रहे हैं? तो गांधी जी ने पाकिस्‍तान को पैसा दिलाने और मुसलमानों को सुविधाएं दिलाने के लिए अनशन किया? आजादी के बाद गांधीजी का पहला सत्‍याग्रह, उनका बेमियादी अनशन था. यह उनकी जिंदगी का आखिरी सत्‍याग्रह साबित हुआ. गांधीजी पाकिस्‍तान के भूगोल और दिल्‍ली में हो रही हिंसा से टूट रहे थे. 12 जनवरी 1948 का दिन. वे प्रार्थना सभा में पहुंचे. उन्‍होंने एलान किया, ‘कोई भी इंसान, जो पवित्र है, अपनी जान से ज्‍यादा कीमती चीज कुरबान नहीं कर सकता. उपवास कल सुबह पहले खाने के बाद शुरू होगा. उपवास का अरसा अनिश्‍चत है. और जब मुझे यकीन हो जाएगा कि सब कौमों के दिल मिल गए हैं, और वह बाहर के दबाव के कारण नहीं मगर अपना अपना धर्म समझने के कारण, तब मेरा उपवास छूटेगा...हिन्‍दुस्‍तान का, हिन्‍दू धर्म का, सिख धर्म का और इस्‍लाम का बेबस बनकर नाश होते देखने के बनिस्‍बत मृत्‍यु मेरे लिए सुंदर रिहाई होगी.’भूखे रहने के मकसद में पाकिस्‍तान का जिक्र नहीं है. पाकिस्‍तान के लिए सुविधाओं की मांग नहीं है. पाकिस्‍तान को दिए जाने वाले पैसे का जिक्र नहीं है. बल्कि फाका के दौरान जब भी मौका हुआ, गांधी जी ने पाकिस्‍तान में चल रही हिंसा का जिक्र तल्‍खी के साथ किया. चुन्‍नीभाई वैद्य ने अपने एक लेख में इसकी पड़ताल की है. यहां तक कि जब दिल्‍ली के चुनिंदा लोगों और डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद के नेतृत्‍व में सौ लोगों के दस्‍तखत से गांधी जी से फाका तोड़ने की अपील की गई, उसमें भी इस तरह का कोई जिक्र नहीं है. हां, यह सच जरूर है कि उस वक्‍त की सरकार ने इसी दौरान पाकिस्‍तान को दिए जाने वाले बाकि पैसे देने पर राज़ी हो गई थी. यह कैबिनेट का फैसला था और उसका इस अनशन से लेना-देना नहीं है. और तो और, इस दौरान वे कहते हैं, ‘पाकिस्‍तान को अपने पापों का बोझ उठाना होगा, जो बड़े भयानक हैं. यूनियन में हमने भी पाकिस्‍तान के पापों की नकल की और उसके साथ हम भी पापी बन गए. तराजू के पलड़े करीब-करीब बराबर हो गए. क्‍या अब भी हमारी बेहोशी दूर होगी और हम अपने पापों का प्रयाश्चित करके बदलेंगे या फिर हमें गिरना ही होगा?’ तो नाथूराम गोडसे कौन था? Nathuram Godse, Narayan Apte and Vishnu Ramkrishna Karkar (बाएं से दाएं) नाथुराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु रामकृष्ण करकरे(तस्वीर- एपी से साभार) नाथूराम गोडसे महाराष्‍ट्र के पुणे का रहने वाला था. उसका जन्‍म 19 मई 1910 को हुआ. गांधी की हत्‍या करने के अपराध में उसे 15 नवम्‍बर 1949 को फांसी हुई. हालांकि उस वक्‍त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गांधीजी के दो बेटों ने उसकी फांसी की सज़ा रद्द करने की अपील की थी. नाथूराम गोडसे हिन्‍दुत्‍ववादी विचारों का था. वह पहले राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़ा और फिर हिन्‍दू महासभा का सदस्‍य हो गया. वह विनायक दामोदर सावरकर के विचारों का समर्थक था. उसने अग्रणी नाम का मराठी अख़बार निकाला. बाद में इसका नाम बदलकर ‘हिन्‍दू राष्‍ट्र’ कर दिया. नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में जो बयान दिया उसके मुताबिक, ‘सन 1925 के लगभग स्‍वर्गीय डॉ. हेडगेवार ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक की नींव डाली. उनके भाषणों का मुझ पर प्रभाव पड़ा. मैं स्‍वयंसेवक बना. मैं महाराष्‍ट्र के उन युवकों में था, जिन्‍होंने संघ में उसके प्रारंभ से भाग लिया. कुछ वर्षों तक मैंने संघ में काम किया. कुछ दिनों पश्‍चात मैंने सोचा कि वैधानिक रूप से हिन्‍दुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीति में भाग लेना चाहिए. जिस कारण मैं संघ छोड़कर हिन्‍दू महासभा में आ गया.‘ लेकिन गांधीजी की हत्‍या के बाद संघ परिवार बार-बार गोडसे से अपने को सीधे-सीधे जोड़ने से बचता रहा है. यही नहीं उसके साथ किसी भी तरह के रिश्‍ते से नकारता रहा है. आरएसएस के साथ नाथूराम का रिश्‍ता था या नहीं, यह उसके भाई गोपाल गोडसे से बेहतर कौन बता सकता है. गोपाल गोडसे गांधीजी की हत्‍या का सह-अभियुक्‍त था. एक इंटरव्‍यू के दौरान फ्रंटलाइन पत्रिका ने गोपाल गोडसे से इस बारे में कुछ सवाल किए थे. गोपाल गोडसे का जवाब कुछ यों था, ‘हम सभी भाई आरएसएस में थे. नाथूराम, दत्‍तात्रेय, मैं और गोविंद. आप कह सकते हैं कि हम अपने घर में बड़े होने की बजाय आरएसएस में पले-बढ़े थे. यह हमारे लिए परिवार जैसा था. नाथूराम आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह बन गया था. उसने अपने बयान में यह कहा था कि उसने आरएसएस छोड़ दी थी. उसने ऐसा इसलिए कहा क्‍योंकि गांधी की हत्‍या के बाद गोलवलकर और आरएसएस काफी मुसीबत में पड़ गए थे. लेकिन उसने आरएसएस नहीं छोड़ी थी. 1944 में नाथूराम ने हिन्‍दू महासभा का काम करना शुरू किया था. उस वक्‍त वह आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह हुआ करता था. इसके बाद नाथूराम और आरएसएस के रिश्‍ते के बारे में कहने को कुछ बचा नहीं रहता. महात्मा गांधी की हत्या की सफाई में नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में क्‍या कहा? नाथूराम गोडसे ने 8 नवम्‍बर 1948 को 90 पेजों वाला अपना बयान कोर्ट के सामने पढ़ा. इसमें उसने गांधी की हत्‍या को जायज ठहराया. उसने अपने वैचारिक आधार के बारे में बात की. उसने कहा, ‘मैंने वीर सावरकर और गांधी जी के लेखन और विचार का गहराई से अध्‍ययन किया है. चूंकि मेरी समझ में पिछले तीस सालों में भारतीय जनता की सोच और काम को किसी भी और कारकों से ज्‍यादा इन दो विचारों ने गढ़ने का काम किया है. इन सभी सोच और अध्‍ययन ने मेरा विश्‍वास पक्‍का किया कि बतौर राष्‍ट्रभक्‍त और विश्‍व नागरिक मेरा पहला कर्तव्‍य हिन्‍दुत्‍व और हिन्‍दुओं की सेवा करना है. 32 सालों से इकट्ठा हो रही उकसावेबाजी, नतीजतन मुसलमानों के लिए उनके आखिरी अनशन ने आखिरकार मुझे इस नतीजे पर पहुंचने के लिए प्रेरित किया कि गांधी का अस्तित्‍व तुरंत खत्‍म करना ही चाहिए.’ जाहिर है, गोडसे ने अपने बयान में ढेर सारी बातें कही हैं लेकिन वस्‍तुत: यह विचारों की लड़ाई थी. गोडसे भी यह बात छिपा नहीं पाया है. इसलिए तर्क चाहे जो दिए जाएं, इतना तो तय है कि नाथूराम गोडसे को गांधी जी के लेखन, विचार और काम से नफरत थी. फिर अलग मुल्‍क क्‍यों बनाया? पाकिस्‍तान की नींव ‘द्विराष्‍ट्रवाद के सिद्धांत’ पर रखी गई. इस सिद्धांत को मानने वाले हमारे देश में भी मौजूद हैं. यह सिद्धांत कितना बनावटी है, यह विचार की बजाय एक रचना के जरिए समझी जा सकती है. इब्‍ने इंशा पाकिस्‍तान के मशहूर शायर और व्‍यंग्‍यकार हैं. उन्‍होंने ‘उर्दू की आखिरी किताब’ लिखी है. इसकी एक रचना है ‘हमारा मुल्‍क.’ यह भारत-पाकिस्‍तान बंटवारे पर सटीक व्‍यंग्‍य है. यह बताता है कि वस्‍तुत: बंटवारा कितना हास्‍यास्‍पद कदम था. हमारा मुल्‍क ‘ईरान में कौन रहता है’? ‘ईरान में ईरानी कौम रहती है’ ‘इंगलिस्‍तान में कौन रहता है’? ‘इं‍गलिस्‍तान में अंग्रेजी कौम रहती है’? ‘फ्रांस में कौन रहता है’? ‘फ्रांस में फ्रांसीसी कौम रहती है’ ‘ये कौन सा मुल्‍क है’? ‘ये पाकिस्‍तान है’ ‘इसमें पाकिस्‍तानी कौम रहती होगी’? ‘नहीं, इसमें पाकिस्‍तानी कौम नहीं रहती है. इसमें सिंधी कौम रहती है. इसमें पंजाबी कौम रहती है. इसमें बंगाली कौम रहती है. इसमें यह कौम रहती है. इसमें वह कौम रहती है’! ‘लेकिन पंजाबी तो हिन्‍दुस्‍तान में भी रहते हैं. सिंधी तो हिन्‍दुस्‍तान में भी रहते हैं. फिर ये अलग मुल्‍क क्‍यों बनाया था?’ ‘गलती हुई, माफ कर दीजिए, आइंदा नहीं बनाएंगे!’

क्या पिता मुलायम की बद्दुआएं लेकर अखिलेश चुनाव जीत सकते हंै? पिता से ज्यादा कांग्रेस पर भरोसा। ====================== मैं यह तो दावा नहीं कर सकता कि 29 जनवरी को मैने अखिलेश यादव और राहुल गांधी के गठजोड़ को लेकर जो ब्लॉग लिखा, उसे पढऩे के बाद ही मुलायम सिंह ने रात को लखनऊ में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया, लेकिन इतना जरूर है कि इस गठजोड़ पर मैंने जो कुछ भी लिखा, उसी के आसपास मुलायम सिंह ने कहा। चंूकि मेरे पास उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों के सैकड़ों वाट्स एप ग्रुप हैं। इसलिए हो सकता है कि मेरा ब्लॉग शाम को ही मुलायम सिंह के पास पहुंच गया हो। 29 जनवरी की रात को मुलायम सिंह ने जो कुछ भी कहा उसमें एक पिता की बेबसी ही झलक रही थी। हालांकि राजनीति में कोई रिश्तेदारी मायने नहीं रखती और अब तो अखिलेश ने साफ कर दिया है कि उनके लिए पिता के बजाय कांग्रेस और राहुल गांधी महत्व रखते हैं। इसलिए यह सवाल उठा है कि क्या पिता की बद्दुआंए लेकर अखिलेश यूपी में चुनाव जीत सकते हैं? भारतीय संस्कृति में भगवान से भी पहले माता-पिता को स्थान दिया गया है। अखिलेश यादव जिस मां की कोख से जनमे, उस मां का तो निधन हो चुका है और अब मुलायम सिंह ही माता और पिता के रूप में अखिलेश के सामने हैं। यह पिता का ही दिल था कि पांच वर्ष पहले समाजवादी पार्टी के अधिकांश दिग्गज नेताओं के विरोध के बाद भी अखिलेश को सीएम बनाया गया। आज भी मुलायम यहीं चाहते हैं कि अखिलेश ही सीएम बने, लेकिन अब पिता की दुआंए अखिलेश के साथ नहीं हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुलायम सिंह आज किस मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहे होंगे। मुलायम ने जिस कांग्रेस के खिलाफ यूपी में सपा को खड़ा किया, उसी कांग्रेस से अखिलेश ने सौदा कर लिया। मुलायम का यह कहना सही है कि कांग्रेस को दी गई 105 सीटों पर सपा के कार्यकर्ताओं का क्या होगा? बेटे को बद्दुआंए देते हुए मुलायम ने कार्यकताओं से कहा है कि कांग्रेस को दी गई सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए जाएं। यानि मुलायम सिंह 105 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर राहुल गांधी और अखिलेश यादव के गठजोड़ पर पानी फैर सकते हंै। यदि कांग्रेस उम्मीदवारों के सामने 105 सीटों पर मुलायम ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए तो कांग्रेस के उम्मीदवारों की हार तो तय है। (एस.पी.मित्तल) (30-01-17)

जय श्री राम शुभ सोमवार भारत माता की जय ॐ नमः शिवाय कल लखनऊ में राहुल गांधी ने कहा की हम बाटने की राजनीति के खिलाफ गठजोड़ किये शायद राहुल गांधी को कांग्रेस का इतिहास नही पता की सत्ता के लिये भारत के टुकड़े कर दिए और 26 जनवरी 1952 को एक भारतीय की जगह यह प्रोड्यूस किये सवर्ण , पिछड़ा अति पिछड़ा , दलित , महादलित और अल्पसंख्यक क्या राहुल जी बतायेगे की अगर भारतीय या हिन्दू थे ही नही तो अल्पसंख्यक कहा से आये और बहुसंख्यक कौन था और इतना बाटने के बाद कहते की संघ बाटने की राजनीति करती है और बेशर्मी से कहते की मुजफ्फरनगर दंगा संघ बीजेपी ने कराया केंद्र में मनमोहन और यूपी में अखिलेश की सरकार थी और अगर उसके बाद संघ बीजेपी दंगे करवा दिया तो इससे साबित होता है की आप दोनों में शाशक की भूमिका नही है क्योकि आप दोनों नकारे युवा अपने शाशन काल में सुरक्षा नही दे सकते सिर्फ आरोप लगा सकते है । और गठबंधन तो 2014 में था जब अखिलेश ने अमेठी रायबरेली से उम्मीदवार नही उतारा नही तो हाथी की तरह पंजे का भी यूपी में स्कोर जीरो ही होता अब तो कांग्रेस प्रतिस्पर्धा की जगह मोदी रोको प्रतियोगिता की आयोजक की भूमिका में आ गई है बिहार में लालू के साथ गठबंधन फिर बंगाल में कम्युनिस्ट के साथ और यूपी में चुनाव बाद सपा बसपा के साथ भी जैसा कल राहुल दरवाजा खोल भी दिए अब कोई क्यों न कहे आपको ,,,,, , हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मन्दिर निर्माण मुहीम अयोध्या

थप्पड़ खाने के बाद भंसाली ने कहा फिल्म में नहीं हैं अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के प्रेम संबंध के सीन। ======================= 29 जनवरी को मुम्बई में फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली ने स्पष्ट किया है कि उनकी फिल्म में तुर्क शासक अलाउद्दीन खिलजी और चित्तौड़ की रानी पद्मावती के प्रेम संबंध वाले सीन नहीं है। भंसाली ने यह सफाई तब दी है जब 27 जनवरी को जयपुर के जयगढ़ किले में शूटिंग के दौरान उन्हें थप्पड़ खाने पड़े थे। सवाल उठता है कि भंसाली ने यह बात पहले क्यों नहीं कहीं? राजस्थान में करणी सेना के प्रमुख लोकेन्द्र सिंह कालवी ने 28 जनवरी को ही पत्रकारों को बताया था कि फिल्म में प्रेम संबंध के दृश्य नहीं है। इस बारे में भंसाली से कई बार जानकारी ली गई। यहां तक कि करणी सेना का एक शिष्ट मंडल भंसाली से मिलने के लिए मुम्बई गया। लिखित में भी नोटिस भेजे गए। फिल्म की कहानी को लेकर हाईकोर्ट में भी एक वाद दायर किया गया है, लेकिन भंसाली ने किसी भी स्तर पर यह नहीं कहा कि उनकी फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पदमावती के प्रेम संबंधों के सीन नहीं है। भंसाली की ओर से लगातार यही प्रसारित किया गया कि फिल्म दोनों के प्रेम संबंधों को लेकर बनाई जा रही है। यह बात भी सामने आई है कि भंसाली फ्लैश बैक में प्रेम दृश्य फिल्माने के लिए ही जयपुर के जयगढ़ किले में शूटिंग कर रहे हैं। चूंकि भंसाली की ओर से कोई सफाई अथवा कथन सामने नहीं आया इसलिए 27 जनवरी को शूटिंग के दौरान करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने हंगामा किया। इस हंगामे में ही भंसाली को थप्पड़ खाने पड़े। इन थप्पड़ों का ही असर हुआ कि मात्र दो दिन बाद ही भंसाली ने मुंबई में कह दिया कि उनकी फिल्म में प्रेम संबंध वाले सीन नहीं है। अच्छा होता कि भंसाली थप्पड़ खाने से पहले ही अपनी सफाई दे देते। भंसाली अब उलटा सवाल कर रहे हैं कि जब प्रेम दृश्य ही नहीं है तो फिर करणी सेना विवाद क्यों कर रही है। सवाल उठाने वाले भंसाली को भी पता है कि यदि करणी सेना विरोध नहीं करती तो भंसाली अपनी फिल्म में प्रेम संबंधों के सीन जरूर दिखाते। यदि भंसाली अपने पेशे के प्रति ईमानदार होते तो अपनी सफाई पहले ही दे देते। भंसाली यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी से बचने के लिए ही रानी पदमावती ने अग्नि कुंड मेंं कूद कर अपनी जान दे दी थी। अच्छा हो कि भंसाली रानी पद्मावती की वीरता को लेकर फिल्म बनाते। यदि आक्रमणकारी तुर्क शासक अलाउद्दीन खिलजी को लेकर फिल्म बनाएंगे तो करणी सेना की भावनाएं आहत होगी। इतिहास गवाह है कि अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासकों ने हमारे देश पर कितना अत्याचार किया है। यदि भंसाली में हिम्मत हो तो अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासकों के अत्याचारों पर फिल्म बनाए। इससे बड़ा अत्याचार और क्या हो सकता है कि पदमावती को हासिल करने के लिए उनके पति रतन सिंह और चित्तौड़ के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। अब यदि भंसाली अत्याचारी शासक का महिमा मंडन करेंगे तो करणी सेना थप्पड़ ही मारेगी। कुछ लोग अपनी विकृत मानसिकता के चलते भंसाली के समर्थन में खड़े हो गए हैं। क्या ऐसे समर्थक अपने परिवार की किसी महिला के प्रेम संबंधों के सीन भंसाली की फिल्म में शामिल करवा सकते हैं? एस.पी.मित्तल) (29-01-17)

अखिलेश के साथ बैठे राहुल ने मायावती के खिलाफ नहीं बोला। कहीं धोखा नहीं हो जाए अखिलेश के साथ 29 जनवरी को राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक साझा प्रेस कान्फ्रेंस की। यूपी के चुनाव में कांग्रेस और सपा में समझौता हुआ है। सपा 298 तथा कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। समझौते के बाद सपा कांग्रेस का मिशन एक ही होना चाहिए, लेकिन 29 जनवरी को राहुल गांधी ने अखिलेश यादव की उपस्थिति में साफ कर दिया कि यूपी में उनका विरोध सिर्फ भाजपा से है। एक पत्रकार ने जब बसपा प्रमुख मायावती के बारे में सवाल किया तो राहुल गांधी ने साफ कहा कि वे मायावती की बेहद इज्जत करते हैं। राहुल ने भाजपा के प्रति जो तीखे तेवर दिखाए, उसके मुकाबले में बसपा के खिलाफ एक प्रतिशत भी नहीं बोला। अखिलेश यादव कांग्रेस की राजनीति को समझे या नहीं, लेकिन राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि समझौते का मकसद सिर्फ कांग्रेस की स्थिति को सुधारना है। गत चुनावों में कांग्रेस के मात्र 28 उम्मीदवार जीते थे, इनमें से भी आठ कांग्रेस छोड़कर भाग गए। यानि आज की तारीख में यूपी में कांग्रेस के मात्र 20 विधायक हैं। अब चूंॅकि 105 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े हैं, इसलिए राहुल गांधी मायावती के खिलाफ बोलकर कांग्रेस के परम्परागत दलित वोटों को नाराज नहीं करना चाहते। राहुल गांधी की राजनीति है कि अखिलेश की साइकिल पर सवार होकर कांग्रेस को कम से कम 60 सीटें तो दिलवा ही दें। ऐसा नहीं कि यूपी के चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी का कोई प्रभाव नहीं है। यूपी के कई क्षेत्रों में सपा और बसपा का ही मुकाबला है। यदि चुनाव प्रचार में भी राहुल गांधी बसपा के खिलाफ नहीं बालेंगे तो इसका नुकसान अखिलेश यादव को ही होगा। अखिलेश को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके पिता मुलायम सिंह कांग्रेस के साथ गठजोड़ के पक्ष में नहीं थे। असल में मुलायम सिंह कांग्रेस के चरित्र को अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन अखिलेश यादव को लगता है कि कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से वे दोबारा से सीएम बन जाएंगे। यह माना कि अखिलेश और राहुल युवा हैं। लेकिन अखिलेश को यह भी समझना होगा कि राहुल गांधी 50 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके हैं और कांग्रेस के तौर-तरीके काफी सीख चुके हैं। एस.पी.मित्तल) (29-01-17)

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