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Dharm

Dharm (130)

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आपके घर में जब भी कोई पूजा का समापन होता है हवन का आयोजन किया जाता है। क्या आप हवन का अर्थ जानते है ,अगर नहीं तो आइये जाने हवन का अर्थ और महत्व!!
हवन अथवा यज्ञ भारतीय परंपरा अथवा हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है। कुण्ड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुँचाने की प्रक्रिया को यज्ञ कहते हैं। हवि, हव्य अथवा हविष्य वह पदार्थ हैं जिनकी अग्नि में आहुति दी जाती है (जो अग्नि में डाले जाते हैं).हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करने के पश्चात इस पवित्र अग्नि में फल, शहद, घी, काष्ठ इत्यादि पदार्थों की आहुति प्रमुख होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि आपके आस पास किसी बुरी आत्मा इत्यादि का प्रभाव है तो हवन प्रक्रिया इससे आपको मुक्ति दिलाती है। शुभकामना, स्वास्थ्य एवं समृद्धि इत्यादि के लिए भी हवन किया जाता है।
*हवन के विज्ञान-सम्मत लाभ*
राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान द्वारा किये गये एक शोध में पाया गया है कि पूजा —पाठ और हवन के दौरान उत्पन्न औषधीय धुआं हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करता है जिससे बीमारी फैलने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
लकड़ी और औषधीय जडी़ बूटियां जिनको आम भाषा में हवन सामग्री कहा जाता है को साथ मिलाकर जलाने से वातावरण मे जहां शुद्धता आ जाती है वहीं हानिकारक जीवाणु 94 प्रतिशत तक नष्ट हो जाते हैं।
उक्त आशय के शोध की पुष्टि के लिए और हवन के धुएं का वातावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के लिए बंद कमरे में प्रयोग किया गया। इस प्रयोग में पांच दजर्न से ज्यादा जड़ी बूटियों के मिश्रण से तैयार हवन सामग्री का इस्तेमाल किया गया। यह हवन सामग्री गुरकुल कांगड़ी हरिद्वार संस्थान से मंगाई गयी थी। हवन के पहले और बाद में कमरे के वातावरण का व्यापक विश्लेषण और परीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि हवन से उत्पन्न औषधीय धुंए से हवा में मौजूद हानिकारक जीवाणु की मात्र में 94 प्रतिशत तक की कमी आयी।
इस औषधीय धुएं का वातावरण पर असर 30 दिन तक बना रहता है और इस अवधि में जहरीले कीटाणु नहीं पनप पाते।
धुएं की क्रिया से न सिर्फ आदमी के स्वास्थ्य पर अच्छा असर पड़ता है बल्कि यह प्रयोग खेती में भी खासा असरकारी साबित हुआ है।
वैज्ञानिक का कहना है कि पहले हुए प्रयोगों में यह पाया गया कि औषधीय हवन के धुएं से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक जीवाणुओं से भी निजात पाई जा सकती है। मनुष्य को दी जाने वाली तमाम तरह की दवाओं की तुलना में अगर औषधीय जड़ी बूटियां और औषधियुक्त हवन के धुएं से कई रोगों में ज्यादा फायदा होता है और इससे कुछ नुकसान नहीं होता जबकि दवाओं का कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर होता है।
धुआं मनुष्य के शरीर में सीधे असरकारी होता है और यह पद्वति दवाओं की अपेक्षा सस्ती और टिकाउ भी है।
*यज्ञाग्नि की शिक्षा तथा प्रेरणा*

*अग्नि भगवान से ऐसी प्रार्थना यजमान करता है कि-*
ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेदसे इध्मस्वचवर्धस्व इद्धय वर्धय। -आश्वलायन गृह्यसूत्र
यज्ञ को *अग्निहोत्र* कहते हैं। अग्नि ही यज्ञ का प्रधान देवता हे। हवन-सामग्री को अग्नि के मुख में ही डालते हैं। अग्नि को ईश्वर-रूप मानकर उसकी पूजा करना ही अग्निहोत्र है। अग्नि रूपी परमात्मा की निकटता का अनुभव करने से उसके गुणों को भी अपने में धारण करना चाहिए एवं उसकी विशेषताओं को स्मरण करते हुए अपनी आपको अग्निवत् होने की दिशा में अग्रसर बनाना चाहिए।
*नीचे अग्नि देव से प्राप्त होने वाली शिक्षा तथा प्रेरणा का कुछ दिग्दर्शन कर रहे हैं*
(1) अग्नि का स्वभाव उष्णता है। हमारे विचारों और कार्यों में भी तेजस्विता होनी चाहिए। आलस्य, शिथिलता, मलीनता, निराशा, अवसाद यह अन्ध-तामसिकता के गण हैं, अग्नि के गुणों से यह पूर्ण विपरीत हैं। जिस प्रकार अग्नि सदा गरम रहती है, कभी भी ठण्डी नहीं पड़ती, उसी प्रकार हमारी नसों में भी उष्ण रक्त बहना चाहिए, हमारी भुजाएँ, काम करने के लिए फड़कती रहें, हमारा मस्तिष्क प्रगतिशील, बुराई के विरुद्ध एवं अच्छाई के पक्ष में उत्साहपूर्ण कार्य करता रहे। (2) अग्नि में जो भी वस्तु पड़ती है, उसे वह अपने समान बना लेती है। निकटवर्ती लोगों को अपना गुण, ज्ञान एवं सहयोग देकर हम भी उन्हें वैसा ही बनाने का प्रयत्न करें। अग्नि के निकट पहुँचकर लकड़ी, कोयला आदि साधारण वस्तुएँ भी अग्नि बन जाती हैं, हम अपनी विशेषताओ से निकटवर्ती लोगों को भी वैसा ही सद्गुणी बनाने का प्रयत्न करें। (3) अग्नि जब तक जलती है, तब तक उष्णता को नष्ट नहीं होने देती। हम भी अपने आत्मबल से ब्रह्म तेज को मृत्यु काल तक बुझने न दें। (4) हमारी देह, भस्मान्तं शरीरम् है। वह अग्नि का भोजन है। न मालूम किस दिन यह देह अग्नि की भेट हो जाय, इसलिए जीवन की नश्वरता को समझते हुए सत्कर्म के लिये शीघ्रता करें।
(5) अग्नि पहले अपने में ज्वलन शक्ति धारण करती हैं, तब किसी दूसरी वस्तु को जलाने में समर्थ होती है। हम पहले स्वयं उन गुणों को धारण करें जिन्हें दूसरों में देखना चाहते हैं। उपदेश देकर नहीं, वरन् अपना उदाहरण उपस्थिति करके ही हम दूसरों को कोई शिक्षा दे सकते हैं। जो गुण हम में वैसे ही गुण वाले दूसरे लोग भी हमारे समीप आवेंगे और वैसा ही हमारा परिवार बनेगा। इसलिये जैसा वातावरण हम अपने चारों ओर देखना चाहते हों, पहले स्वयं वैसा बनने का प्रयत्न करें।
(6) अग्नि, जैसे मलिन वस्तुओं को स्पर्श करके स्वयं मलिन नहीं बनती, वरन् दूषित वस्तुओं को भी अपने समान पवित्र बनाती है, वैसे ही दूसरों की बुराइयों से हम प्रभावित न हों। स्वयं बुरे न बनने लगें, वरन् अपनी अच्छाइयों से उन्हें प्रभावित करके पवित्र बनावें।
(7) अग्नि जहाँ रहती है वहीं प्रकाश फैलता है। हम भी ब्रह्म-अग्नि के उपासक बनकर ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलावें, अज्ञान के अन्धकार को दूर करें। तमसो मा ज्योतर्गमय हमारा प्रत्येक कदम अन्धकार से निकल कर प्रकाश की ओर चलने के लिये बढ़े।
(8) अग्नि की ज्वाला सदा ऊपर को उठती रहती है। मोमबत्ती की लौ नीचे की तरफ उलटें तो भी वह ऊपर की ओर ही उठेगी। उसी प्रकार हमारा लक्ष्य, उद्देश्य एवं कार्य सदा ऊपर की ओर हो, अधोगामी न बने। (9) अग्नि में जो भी वस्तु डाली जाती है, उसे वह अपने पास नहीं रखती, वरन् उसे सूक्ष्म बनाकर वायु को, देवताओं को, बाँट देती है। हमें जो वस्तुएँ ईश्वर की ओर से, संसार की ओर से मिलती हैं, उन्हें केवल उतनी ही मात्रा में ग्रहण करें, जितने से जीवन रूपी अग्नि को ईंधन प्राप्त होता रहे। शेष का परिग्रह, संचय या स्वामित्व का लोभ न करके उसे लोक-हित के लिए ही अर्पित करते रहें।
*स्वास्थ्य के लिए हवन का महत्त्व*
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हलकापन, धूल, धुँआ, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है। इसलिए कई बार वायुमण्डल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं, जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।

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'विष्णु पुराण' समस्त पुराणों में सबसे छोटे आकार किन्तु वैदिक काल का महत्त्वपूर्ण पुराण माना जाता है। इसकी भाषा साहित्यिक व काव्यमय गुणों से भरपूर है। 'विष्णुपुराण’ में लगभग तेईस हजार श्लोक हैं।
विष्णु पुराण के भाग (Parts of Vishnu puran in Hindi)
विष्णुपुराण छः भागों या अंशों में विभाजित है जो इस प्रकार हैं:

· प्रथम अंश: ‘विष्णुपुराण’ के प्रथम अंश में सर्ग और भू-लोक का उद्भव, काल का स्वरूप तथा ध्रुव, पृथु व भक्त प्रह्लाद का विवरण दिया गया है। · द्वितीय अंश: द्वितीय अंश में तीनों-लोक के स्वरूप, पृथ्वी के नौ खण्ड, ग्रह नक्षत्र, ज्योतिष व अन्य का वर्णन किया गया है। · तृतीय अंश: तृतीय अंश में मन्वन्तर, ग्रन्थों का विस्तार, गृहस्थ धर्म और श्राद्ध विधि आदि का महत्त्व बताया गया है। · चतुर्थ अंश: चतुर्थ अंश में सूर्य व चन्द्रवंश के राजा तथा उनकी वंशावलियों का वर्णन किया गया है। · पंचम अंश: पंचम अंश में भगवान श्री कृष्ण के जीवन चरित्र की व्याख्या की गई है। · छठा अंश: छठे अंश में मोक्ष तथा समाप्ति का विवरण देखने को मिलता है, जो हिन्दू धर्म का परम लक्ष्य होता है।
विष्णुपुराण के मुख्य संदेश (Teachings of Vishnu Puran in Hindi)
विष्णुपुराण में स्त्री, साधु व शूद्रों के कर्मों आदि का वर्णन किया गया है। इस पुराण में विभिन्न धर्मों, वर्गों, वर्णों आदि के कार्य का वर्णन है और बताया गया है कि कार्य ही सबसे प्रधान होता है। कर्म की प्रधानता जाति या वर्ण से निर्धारित नहीं होती। इस पुराण में कई प्रसंगों और कहानियों के माध्यम बड़े स्तर पर यही संदेश देने का प्रयास किया गया है।

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मां लक्ष्मी
जब भी कभी हिन्दू धर्म में हम धन को किसी देवी-देवता से जोड़ते हैं तो सबसे पहले ‘मां लक्ष्मी’ का नाम सामने आता है। अपने पति भगवान विष्णु के वरदान द्वारा पूजनीय कहलाने वाली तथा घर में सुख-समृद्धि लाने वाली मां लक्ष्मी को सारा संसार पूजता है।
शुक्रवार के दिन करें पूजा
मां लक्ष्मी की उपासना अमूमन हफ्ते के सात दिनों में से शुक्रवार को खास रूप से की जाती है। मां लक्ष्मी के आशीर्वाद से धन पाने का तरीका भी शुक्रवार के संदर्भ से ही जुड़ा है।
महीने का पहला शुक्रवार इस उपाय के अंतर्गत आपको किसी भी महीने के पहले शुक्रवार के दिन स्नान करने के बाद घर के पूजा स्थान में घी का दीपक जलाकर मां लक्ष्मी को मिश्री और खीर का भोग लगाना है। इसके बाद मां लक्ष्मी के ‘ॐ श्रीं श्रीये नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
कन्याओं को भोजन कराएं
पूजा करने के तत्पश्चात 7 वर्ष की आयु से कम की कन्याओं को घर बुलाकर पूरे श्रद्धाभाव से भोजन कराएं। भोजन में खीर और मिश्री जरूर खिलाएं। ऐसा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर आपकी आर्थिक परेशानी को खत्म करेंगी।
लाल वस्त्र धारण करें
मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जाप के साथ लाल या सफेद वस्त्र भी धारण करें। इसके अलावा आप किसी ज्योतिषी की राय से हाथ में चांदी की अंगूठी या छल्ला भी धारण कर सकते हैं।

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जम्मू-कश्मीर की अमरनाथ गुफा जाने वाले श्रद्धालुओं को अब चिकित्सीय प्रमाणपत्र देना होगा. वहीं 13 वर्ष से कम एवं 75 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को यात्रा की अनुमति नहीं दी जाएगी. वार्षिक तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले श्री अमरनाथ मंदिर बोर्ड (एसएएसबी) ने यात्रियों के लिए एक परामर्श जारी किया है. इस यात्रा में श्रद्धालुओं को 14,000 फुट की ऊंचाई चढ़नी होती है.

29 जून से सात अगस्त तक चलेगी अमरनाथ यात्रा

इस साल तीर्थयात्रा 29 जून से शुरू होकर सात अगस्त तक चलेगी. अधिक ऊंचाई के कारण श्रद्धालुओं को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना होता है. यात्री अक्सर भूख की कमी, मिचली, उलटी, थकान आदि की शिकायत करते हैं. परामर्श में कहा गया है कि अगर इन बीमारियों का समय से इलाज नहीं किया गया तो मौत भी हो सकती है.

परामर्श में कहा गया है कि शारीरिक रूप से फिट होकर तीर्थयात्रा की तैयारी कीजिए. इसमें सलाह दी गयी है कि तैयारी के रूप में तीर्थयात्रा से कम से कम एक महीना पहले सुबह या शाम प्रति दिन चार-पांच किलोमीटर पैदल चलिए.

आवेदन पत्र के साथ देना होगा स्वास्थ्य प्रमाणपत्र
तीर्थ यात्रा की अनुमति के लिए हर तीर्थयात्री को आवेदन पत्र के साथ स्वास्थ्य प्रमाणपत्र (सीएचसी) अनिवार्य रूप से जमा कराना होगा. आवेदन पत्र और सीएचसी का प्रारूप, डॉक्टरों की सूची, सीएचसी देने के लिए अधिकृत चिकित्सीय संस्थानों की जानकारी एसएएसबी की वेबसाइट पर दी गई है.

परामर्श में बताया गया है कि लोग विशिष्ट बैंक शाखाओं से पंजीकरण करा सकते हैं. परामर्श के अनुसार 13 साल से कम एवं 75 साल से अधिक आयु वाले लोगों और छह सप्ताह से अधिक की गर्भवती महिलाओं को तीर्थयात्रा के लिए पंजीकृत करवाने की अनुमति नहीं है. बोर्ड ने तीर्थयात्रियों के लिए सांसों का अभ्यास और योग खासकर प्राणायाम करने की सलाह दी है. तीर्थयात्रियों से कहा गया है कि वे उनी कपड़े भी अपने साथ लेकर आएं क्योंकि तापमान में तेजी से गिरावट आ सकती है.

यात्रा के दौरान रखनी होगी ये सामग्री 

क्षेत्र में मौसम की अनिश्चिता को देखते हुए यात्रियों को छाता, विंड-चीटर, रेनकोट और खास जूते लाने को भी कहा गया है. महिला तीर्थयात्रियों से कहा गया है कि वे यात्रा के दौरान साड़ी नहीं पहनें और वे सलवार कमीज, शर्ट-पैंट या ट्रैक सूट आदि पहनें. अमरनाथ गुफा श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर और 12,756 फुट की ऊंचाई पर स्थित है.

एकादशी उपवास निर्जला ( उपवास 5 जून 2017 (सोम) 05:23 पारण समय - 6 जून 2017 (मंगल) 05:23 - 10:01  युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये । भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं । तब वेदव्यासजी कहने लगे: दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहलेब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए । यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यहीकहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी । भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना । भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृकनामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथाजिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा । व्यासजी ने कहा: भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डालसकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्णहोता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनीएकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानवसबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’ एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवालेऔर मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदिउसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक-एकप्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण काकथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डालके समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है । जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जातेहैं । कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करनाचाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब


निर्जला एकादशी
5 जून को निर्जला एकादशी है,ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है इस व्रत मे पानी का पीना वर्जित है इसलिये इस निर्जला एकादशी कहते है।
निर्जला एकादशी कथा
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और किये गए जप-तप दान आदि का बहुत अधिक महत्व है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश जी में भगवान विष्णु जी को जगत का पालनहार अर्थात पालने वाला माना गया है और एकादशी भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तिथि है अत: इस दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए जिससे भगवान श्री हरि की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके ।
क्या ना करें
शास्त्रों के अनुसार एकादशी को कई कार्य ऐसे है जो हमें नहीं करने चाहिए , अन्यथा मनुष्य को घोर पाप का भागी बनना पड़ता है । आज हम आपको उन कार्यों के बारे में बता रहे है जिन्हे निर्जला एकादशी के दिन नहीं करना है भले ही हमने निर्जल व्रत रखा हो या न रखा हो हमें इन बातों का ध्यान जरूर रखना है,आइये पढ़ते है:     
फलाहार
निर्जला एकादशी व्रत पर जलपान के निषिद्ध होने पर भी फलहार के साथ दूध लिया जा सकता है।
ऐसा ना करें
इस दिन फूल और वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है, एकादशी के दिन किसी भी प्रकार का दातुन नहीं करना चाहिए वरन दशमी की रात को ही अच्छी तरह दातुन और कुल्ला करके मुँह साफ करना चाहिए चावल ना खये
इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए, शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल खाने वाला पाप का भागी बनता है।

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वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ पहनना बहुत ही लाभदायक है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अत: इसको सदैव धारण करना चाहिए।
चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।
जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मलविसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।
मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।
वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।
माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।
विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिस्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।
यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिनेकान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए। यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए। यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिनेकान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए। यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।
जनेऊ की 5 गांठ – यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।
जनेऊ की लंबाई – यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

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आज का राशिफल(29मई 2017)
मेष:-शुभ समाचार की प्राप्ति होगी। निवेशादि से लाभ होगा। प्रतिष्ठा वृद्धि तथा रोजगार के अवसर मिलेंगे। विद्यार्थी सफल होंगे। संतान की चिंता दूर होगी।
वृष:-यात्रा होगी। निवेशादि से लाभ होगा। साक्षात्कार, परीक्षा में सफलता मिलेगी, फैशन पर खर्च होगा। विरोधी शांत रहेंगे। व्यापार में नई योजनाएं बनेंगी।
मिथुन:-व्यय वृद्धि तथा चिंता वृद्धि होगी। वाहन-मशीनरी का प्रयोग सावधानी से करें। जोखिम न लें। व्यापार मंदा चलेगा। उपहार मिल सकता है।
कर्क:-भागदौड़ ज्यादा होगी। धनागम होगा। यात्रा शुभ रहेगी। कार्यों में गति आएगी। विवाद से बचें। शत्रु शांत रहेंगे। कार्यक्षेत्र का विकास एवं विस्तार होगा।
सिंह:-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। कार्यप्रणाली सुधरेगी। नई योजनाएं लाभ देंगी। रोजगार, नौकरी लाभ देंगे। बौद्धि कार्य सफल होंगे। भूल करने से विरोधी बढ़ेंगे।
कन्या:- आवश्यक वस्तु गुम हो सकती है। हानि-दुर्घटना से बचें। धर्म-कर्म में रुचि बढ़ेगी। रुके हुए कार्यों में गति आएगी। सतर्कता से कार्य करें। तुला:- शारीरिक कष्ट हो सकता है। दुर्घटना-चोरी इत्यादि से हानि संभव है। जोखिम न लें। विवाद से बचें। व्यापार मंदा चलेगा। व्यापार में नए अनुबंध न करें।
वृश्चिक:- घर में प्रसन्नता रहेगी। कार्य की रुकावट दूर होगी। निवेश से लाभ तथा नौकरी, साक्षात्कार मनोनुकूल होंगे। विरोधी शांत रहेंगे। कामकाज होगा।
धनु:- शत्रु परास्त होंगे। निवेश से लाभ तथा रोजगार प्राप्ति संभव है। साक्षात्कार, नौकरी में सफलता तथा परीक्षा में सफल होंगे। अनुकूलता रहेगी।
मकर:- विरोध होगा। मिष्ठान्न का आनंद मिलेगा। विद्यार्थी सफलता प्राप्त करेंगे। निवेश से लाभ होगा। रोजगार मिल सकता है। ईश्वर में रुचि बढ़ेगी।
कुंभ:- कार्य में रुकावटें आएंगी। अप्रसन्नता रहेगी। जोखिम न लें। हानि-दुर्घटना से बचें। विवाद से बचें। विवाद से प्रतिष्ठा हानि हो सकती है।
मीन:- व्यापार-व्यवसाय ठीक चलेगा, कार्य होंगे, शांति रहेगी। हानि-दुर्घटना से बचें। कार्य की प्रशंसा होगी। यात्रा होगी। आर्थिक तंगी रहेगी।
मां दुर्गा प्राच्यविद्या अनुशीलन केंद्र प्रयागराज इलाहाबाद से आचार्य संजय कुमार मिश्र !!

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