Dharm

Dharm (152)

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श्री राम की आराधना करें शिव के साथ , जानिये क्यों ? ============================
'भगवान शिव' राम के इष्ट एवं 'राम' शिव के इष्ट हैं। ऐसा संयोग इतिहास में नहीं मिलता कि उपास्य और उपासक में परस्पर इष्ट भाव हो इसी स्थिति को संतजन 'परस्पर देवोभव' का नाम देते हैं।   शिव का प्रिय मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' एवं 'श्रीराम जय राम जय जय राम' मंत्र का उच्चारण कर शिव को जल चढ़ाने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 
भगवान राम ने स्वयं कहा है : -

'शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा।'  - अर्थात्‌ जो शिव का द्रोह कर के मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्वपूर्ण होता है।  मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्ष के वनवास काल के बीच जब जाबालि ऋषि की तपोभूमि मिलने आए तब भगवान गुप्त प्रवास पर नर्मदा तट पर आए। उस समय यह पर्वतों से घिरा था। रास्ते में भगवान शंकर भी उनसे मिलने आतुर थे, लेकिन भगवान और भक्त के बीच वे नहीं आ रहे थे। भगवान राम के पैरों को कंकर न चुभें इसीलिए शंकरजी ने छोटे-छोटे कंकरों को गोलाकार कर दिया। इसलिए कंकर-कंकर में शंकर बोला जाता है।  जब प्रभु श्रीराम रेवा तट पर पहुंचे तो गुफा से नर्मदा जल बह रहा था। श्रीराम यहीं रुके और बालू एकत्र कर एक माह तक उस बालू का नर्मदा जल से अभिषेक करने लगे। आखिरी दिन शंकरजी वहां स्वयं विराजित हो गए और भगवान राम-शंकर का मिलन हुआ।  शिवप्रिय मैकल सैल सुता सी, सकल सिद्धि सुख संपति राशि..., रामचरित मानस की ये पंक्तियां श्रीराम और शिव के चरण पड़ने की साक्षी है।
साभार:- सुनील झा 'मैथिल'

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ऐसे पहुंचे शनि महाराज शिंगणापुर !!
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पूरे भारत में शनि महाराज के दो प्रमुख निवास स्थान हैं जिनमें एक मथुरा के पास स्थित कोकिला वन है और दूसरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित शिंगणापुर धाम। इनमें शिंगणापुर का विशेष महत्व है। यहां पर शनि महाराज की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि एक बड़ा सा काला पत्थर है जिसे शनि का विग्रह माना जाता है। शनि के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए देश विदेश से लोग यहां आते हैं और शनि विग्रह की पूजा करके शनि के कुप्रभाव से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माना जाता है कि यहां पर शनि महाराज का तैलाभिषेक करने वाले को शनि कभी कष्ट नहीं देते।
शनि मराहाज के शिंगणापुर पहुंचने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सदियों पहले शिंगणापुर में खूब वर्षा हुई। वर्षा के कारण यहां बाढ़ की स्थिति आ गई। लोगों को वर्षा प्रलय के समान लगने लग रही थी। इसी बीच एक रात शनि महाराज एक गांव वासी के सपने में आए।

शनि महाराज ने कहा कि मैं पानस नाले में विग्रह रूप में मौजूद हूं। मेरे विग्रह को उठाकर गांव में लाकर स्थापित करो। सुबह इस व्यक्ति ने गांव वालों को यह बात बताई। सभी लोग पानस नाले पर गए और वहां मौजूद शनि का विग्रह देखकर सभी हैरान रह गये।
गांव वाले मिलकर उस विग्रह का उठाने लगे लेकिन विग्रह हिला तक नहीं, सभी हारकर वापस लौट आए। शनि महाराज फिर उस रात उसी व्यक्ति के सपने में आये और बताया कि कोई मामा भांजा मिलकर मुझे उठाएं तो ही मैं उस स्थान से उठूंगा। मुझे उस बैलगाड़ी में बैठाकर लाना जिसमे लगे बैल भी मामा-भांजा हो । अगले दिन उस व्यक्ति ने जब यह बात बताई तब एक मामा- भांजे ने मिलकर विग्रह को उठाया । बैलगाड़ी पर बिठाकर शनि महाराज को गाँव में लाया गया और उस स्थान पर स्थापित किया जहां वर्तमान में शनि विग्रह मौजूद हैं । इस विग्रह की स्थापना के बाद गाँव की समृधी और खुशहाली बढ़ने लगे।।
साभार:- सुनील झा 'मैथिल'

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कंकालिन मंदिर, इस सिद्धपीठ में गिरा था देवी सती का कंगन ! ========================== छतीसगढ़ के रायपुर जिला मुख्यालय पर पहाड़ ताज के समान है। इसी पहाड़ के नीचे कंकालीन देवी लोगों की मन्नतें पूरी करती हैं। यहां स्थित कंकालीन देवी की शक्तिपीठ रियासत काल से ही लोगों की आस्था का केंद्र है। इस पीठ को देवी की 51 शक्तिपीठों में माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर देवी सती का कंगन गिरा था। नवरात्र के दिनों में तो यहां दूर-दूर से लोग देवी का दर्शन करने आते हैं। कंकालीन मंदिर की पौराणिक कथा :-
पौराणिक कथानुसार कनखल (हरिद्वार) में राजा प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन अपने जमाता व देवी सती के पति भगवान शंकर को निमंत्रित नहीं किया। जब देवी सती ने इसका कारण पूछा तो भगवान शंकर के बारे में भला बुरा कहा जिससे आहत होकर देवी सती ने यज्ञ अग्निकुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिये। सती के वियोग में भगवान शंकर व्यथित हो गए। उनके तांडव से तीनों लोकों में प्रलय के आसार हो गए। भयभीत देवताओं ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को खंड-खंड करते गये। जहां-जहां देवी के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बनीं।
कंड्रा वंश के शासन काल में हुई मंदिर की स्थापना:-
कहा जाता है कि सोमवंश के पतन के बाद चौदहवीं सदी में कंड्रा वंश के शासक पद्मदेव के कार्यकाल में यहां मंदिर की स्थापना की गई।
मंदिर व मूर्ति स्थापना की एक और प्रचलित कहानी :-
कंकालीन मंदिर के वर्तमान पुजारी अभिषेक सोनी के अनुसार उनके पूर्वज स्वर्णकार सुखदेव प्रसाद को राजा ने आभूषण बनाने के लिए यहां बुलाया था। कुछ दिनों के पश्चात मां कंकालीन देवी ने उन्हें स्वपन में कहा कि वे जोगी गुफा पहाड़ के नीचे चट्टानों से ढ़की हैं। सुखदेव ने राजा को यह बात बताई जिस पर शुरुआत में तो राजा को विश्वास नहीं हुआ। लेकिन स्वपन फिर से आया तो राजा ने शर्त रखी कि यदि कुछ नहीं मिला तो उन्हें 100 कोड़े लगाए जांएगें। इसके बाद हुई खुदाई में मां कंकालीन और भैरों नाथ की मूर्तियां निकली जिनकी राजा ने विधिवत स्थापना करवाई। आज भी सुखदेव के परिवार की पांचवी पीढ़ी के लोग ही जो कि मूल रुप से उत्तर प्रदेश लखनऊ के पास स्थित कड़ा मानिकपुर से हैं मंदिर में पूजा-पाठ करते हैं। मंदिर से जुड़ी अनहोनी घटनाएं :-
ऐसा कहा जाता है, कि पहले इस मंदिर में महिलाएं प्रवेश करते ही बेहोश हो जाती थी या उनके साथ कोई अनहोनी हो जाती। इसलिए यहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। 1990-91 में माता की विशेष पूजा-अर्चना के बाद महिलाओं का प्रवेश कराया गया।
मंदिर परिसर की चट्टान पर खुदा रहस्य :-
मंदिर परिसर में चट्टान पर कुछ लिखा हुआ है। यह लिपि आज भी एक रहस्य बनी हुई है। किसी के द्वारा इस लिपि को पढ़े जाने के प्रमाण नहीं हैं। हालांकि यह मान्यता है कि जो इस लिपि को पढ़ लेगा उसे खजाने की प्राप्ति होगी। साथ ही यह भी कहा जाता है कि इस लिपि में 84 लाख जीव-जंतुओं के भोजन के खर्च का ब्यौरा लिखा हुआ है।।
साभार:-सुनील झा 'मैथिल'

क्यों देते हैं हम गाय को माँ का दर्ज़ा? प्राचीन काल से ही गाय (cow) को खज़ाना माना गया है और ये आज भी इंसान की ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है| उस समय हमारे पास खाने के ज़्यादा साधन दूध और दूध से बने उत्पाद जैसे दही, मक्खन, लस्सी, घी, मलाई और मिठाई ही थे जिसके लिए हम पूरी तरह से गाय पर निर्भर थे और आज भी हैं| न केवल खाना बल्कि गाय से जुड़ा हर एक उत्पाद हमारे बहुत काम आता है जैसे गाय का गोबर हम अपने खेतों में खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं जिससे हमारी भूमि उपज़ाऊ रहती है| गाय के गोबर से उपले भी बनते हैं जिसे ईंधन के लिए प्रयोग किया जाता है| इतना ही नहीं गाय का गोबर भूमि को शुद्ध करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है| गोबर से कच्चे घरों की दीवारें और भूमि को लेपा जाता है जो कि बहुत ही शुभ माना जाता है| इतना ही नहीं गौमूत्र भी बहुत लाभदायक है| वैद्य आज भी गौमूत्र को आयुर्वेदिक औषधियाँ बनानें में प्रयोग करतें हैं| गौमूत्र से बनी औषधियाँ कैंसर, मधुमेह, त्वचा संबंधी समस्याएं, दिल की बीमारी, तनाव इत्यादि बीमारियों को दूर करने के लिए प्रयोग होती हैं| पर क्यों देते हैं हम गाय को माँ का दर्ज़ा? गाय की तुलना माँ से क्यों की गई है| गौ को हम माँ का दर्ज़ा इसलिए देते हैं क्योंकि यह हमारा एक माँ की तरह ध्यान रखती है| गाय माँ की तरह हमें अच्छा खाने-पीने को देती है| गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है| माना जाता है कि भैंस का बच्चा दूध पीने के बाद सो जाता है जबकि गाय का बछड़ा अपनी माँ का दूध पीने के बाद उछल कूद करता है| एक माँ यही तो चाहती है| पुराने वक़्त से ही गाय को एक परिवार का सदस्य माना गया है, जैसे घर में कोई दुख़ हो तो माँ की आँखों में आँसू आ जातें हैं वैसे ही गाय की आँख में पानी आ जाता है| क्योंकि कहते है ‘अपनों का दुख अपने ही समझ सकतें हैं’| माँ की तरह ये घर की साफ़ सफ़ाई में भी योगदान देती है| हम सब जानतें हैं कि गाय का गोबर घर को शुद्ध करता है और इसके प्रयोग से कीटाणु भी घर से दूर रहतें हैं| गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है| वास्तु के अनुसार, सकारात्मक ऊर्जा पड़तालकर्ता(Positive Energy Checker) को जब गाय के पास लेकर जाया गया तो पाया की गाय से सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) उत्पन्न होती है| जिस घर में गाय होगी उस घर में रहने वाले लोग ज़यादा स्वस्थ और खुश रहते हैं| पौराणिक मान्यता के अनुसार गाय में ३३ करोड़ देवी देवताओं का निवास है| भगवान श्री कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता| इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है| इन्हीं सब कारणों से हम गाय को गौ माता कहतें हैं| जैसे माँ जब तक हमारे साथ रहती है तब तक ह्मारा पालन पोषण करती है वैसे ही गाय भी ह्मारे जीवन को खुशहाल बनाने में अपना योगदान देती है ।

क्यों नहीं करने चाहिए भगवान गणेश की पीठ के दर्शन ? ============================
श्री गणेश के दर्शन मात्र से हमारे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। गणेशजी सभी सुखों को देने वाले माने गए हैं। अपने भक्तों के दुखों को दूर करते हैं और शत्रुओं से रक्षा करते हैं। इनके नित्य दर्शन से हमारा मन शांत रहता है और सभी कार्य सफल होते हैं, लेकिन इनकी पीठ के दर्शन नहीं करना चाहिए।

जब श्री राम को हरा दिया भक्त हनुमान जी ने, पढ़े कथा । ========================== उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया। सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे।  इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं । धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है। प्रभु श्रीराम ने सोचा, "ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं"।  श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं। श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा। राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा।  इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे।  तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। साभार:- सुनील झा 'मैथिल'

भगवान् भोलेनाथ का नाम कैसे हुआ नीलकंठ, पढ़े सम्पुर्ण कथा !! ========================== एक बार दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ शिवजी के दर्शन के लिए जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों को विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया। तब दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद देकर भगवान विष्णु का पारिजात पुष्प प्रदान किया। इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा भगवान विष्णु के समान तेजस्वी हो गया। उसने इन्द्र का परित्याग कर दिया और दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया। इन्द्र द्वारा भगवान विष्णु के दिव्य पुष्प का तिरस्कार होते देखकर दुर्वासा ऋषि के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने देवराज इन्द्र को वैभव (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा मुनि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और धनहीन हो गए। उनका वैभव लुप्त हो गया। इन्द्र को बलहीन जानकर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित करके स्वर्ग के राज्य पर अपना परचम फहरा दिया। तब इन्द्र देवगुरु बृहस्पृति और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजी बोले- ‘देवेंद्र! भगवान विष्णु के भोगरूपी फूल का अपमान करने के कारण रुष्ट होकर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गई हैं। उन्हें पुनः प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपा-दृष्टि प्राप्त करो। उनके आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव पुनः मिल जाएगा।’ इस प्रकार ब्रह्माजी ने इन्द्र को आश्वस्त किया और उन्हें लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। वहां भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान थे। देवगण भगवान् विष्णु की स्तुति करते हुए बोले- ‘भगवन! आपके चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम। भगवन! हम सब जिस उद्देश्य से आपकी शरण में आए हैं, कृपा करके आप उसे पूरा कीजिए। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण माता लक्ष्मी हमसे रुठ गई हैं और दैत्यों ने हमें पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है। अब हम आपकी शरण में है, हमारी रक्षा कीजिए। ’ भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी थे। वे पल भर में ही देवताओं के मन की बात जान गए। तब वे देवगण से अपने वैभव लौटाने के लिए, दानवों से दोस्ती कर उनके साथ मिलकर समुद्र मंथन करने को बोले। उन्होंने समुद्र की गहराइयों में छिपे अमृत के कलश और मणि रत्नों के बारे में बताया कि उसे पाने से वे सभी फिर से वैभवशाली हो जाएंगे। भगवान विष्णु के कहे अनुसार इन्द्र सहित सभी देवता दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया। समुद्र मंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। तत्पश्चात दोनों पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने लगे। अमृत पाने की इच्छा से सभी बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे। सहसा तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। जिस समय भगवान शिव विषपान कर रहे थे, उस समय विष की कुछ बूंदें नीचे गिर गईं। जिन्हें बिच्छू, सांप आदि जीवों और कुछ वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया। इसी विष के कारण वे विषैले हो गए। विष का प्रभाव समाप्त होने पर सभी देवगण भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे। हलाहल के बाद समुद्र से कामधेनु (गाय) प्रकट हुईं। वह यज्ञ-हवन आदि सामग्री उत्पन्न करने वाली थी, अतः उसे ऋषि-मुनियों ने ग्रहण किया। उसके बाद उच्चैःश्रवा नामक सात मुखों वाला एक अश्व निकला। वह चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण का था। उसकी सुंदरता से प्रभावित होकर उसे दैत्यराज बलि ने ग्रहण कर लिया। समुद्र से श्वेत वर्ण का ऐरावत निकला। उसे अपना वाहन बनाने के लिए इन्द्र ने ग्रहण कर लिया। इसके बाद कौस्तुभ नामक मणि प्रकट हुई। उसे श्रीविष्णु ने धारण किया। समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष तथा अनेक सुंदर अप्सराएं भी प्रकट हुई। इनके बाद ऐश्वर्य और भोगों की देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। वे भगवान विष्णु की नित्यशक्ति हैं। देवी लक्ष्मी समुद्र की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुईँ थी। उन्होंने प्रकट होते ही भगवान विष्णु को वरमाला डालकर पति रूप में स्वीकार कर लिया। अंत में समुद्र से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। दिव्य वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित वे दिव्य पुरुष श्रीविष्णु के अंशावतार और आयुर्वेद के प्रवर्तक वैद्य धन्वन्तरि थे। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। उन्हें देखकर दैत्यों ने समुद्र मंथन छोड़कर उनसे अमृत का कलश छीन लिया। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण करके देवताओं को अमृत पान करवाया। इस प्रकार सभी देवता वैभव से संपन्न होने के साथ-साथ अमृतपान कर अमर हो गए। साभार-सुनील झा 'मैथिल'

क्यों दंड देते हैं शनि, पढ़ें लक्ष्मी और शनि का संवाद !!
●~●~●~●~●~●~●~●~●~●~●~● एक बार लक्ष्मीजी ने शनिदेव से प्रश्न किया कि हे शनिदेव, मैं अपने प्रभाव से लोगों को धनवान बनाती हूं और आप हैं कि उनका धन छीन भिखारी बना देते हैं। आखिर आप ऐसा क्यों करते हैं?  लक्ष्मीजी का यह प्रश्न सुन शनिदेव ने उत्तर दिया- 'हे मातेश्वरी! इसमें मेरा कोई दोष नहीं। जो जीव स्वयं जानबूझकर अत्याचार व भ्रष्टाचार को आश्रय देते हैं और क्रूर व बुरे कर्म कर दूसरों को रुलाते तथा स्वयं हंसते हैं, उन्हें समय अनुसार दंड देने का कार्यभार परमात्मा ने मुझे सौंपा है। इसलिए मैं लोगों को उनके कर्मों के अनुसार दंड अवश्य देता हूं। मैं उनसे भीख मंगवाता हूं, उन्हें भयंकर रोगों से ग्रसित बनाकर खाट पर पड़े रहने को मजबूर कर देता हूं।' इस पर लक्ष्मीजी बोलीं- 'मैं आपकी बातों पर विश्वास नहीं करती। देखिए, मैं अभी एक निर्धन व्यक्ति को अपने प्रताप से धनवान व पुत्रवान बना देती हूं।' लक्ष्मीजी ने ज्यों ही ऐसा कहा, वह निर्धन व्यक्ति धनवान एवं पुत्रवान हो गया।  तत्पश्चात लक्ष्मीजी बोलीं- अब आप अपना कार्य करें।' तब शनिदेव ने उस पर अपनी दृष्टि डाली। तत्काल उस धनवान का गौरव व धन सब नष्ट हो गया। उसकी ऐसी दशा बन गई कि वह पहले वाली जगह पर आकर पुनः भीख मांगने लगा। यह देख लक्ष्मीजी चकित रह गईं। वे शनिदेव से बोलीं कि इसका कारण मुझे विस्तार से बताएं। तब शनिदेवजी ने बताया- 'हे मातेश्वरी, यह वह इंसान है जिसने पहले गांव के गांव उजाड़ डाले थे, जगह-जगह आग लगाई थी। यह महान अत्याचारी, पापी व निर्लज्ज जीव है। इसके जैसे पापी जीव के भाग्य में सुख-संपत्ति का उपभोग कहां है। इसे तो अपने कुकर्मों के भोग के लिए कई जन्मों तक भुखमरी व मुसीबतों का सामना करना है। आपकी दयादृष्टि से वह धनवान-पुत्रवान तो बन गया परंतु उसके पूर्वकृत कर्म इतने भयंकर थे जिसकी बदौलत उसका सारा वैभव देखते ही देखते समाप्त हो गया। क्योंकि कर्म ही प्रधान है और कर्म का फल भोगने के लिए सभी बाध्य हैं।  लेकिन मैंने इसे इसके दुष्कर्मों का फल देने के लिए फिर से भिखारी बना दिया। इसमें मेरा कोई दोष नहीं, दोष उसके कर्मों का है। शनिदेवजी पुनः बोले- हे मातेश्वरी, ऐश्वर्य शुभकर्मी जीवों को प्राप्त होता है। जो लोग महान सदाचारी, तपस्वी, परोपकारी, दान देने वाले होते हैं, जो सदा दूसरों की भलाई करते हैं और भगवान के भक्त होते हैं, वे ही अगले जन्म में ऐश्वर्यवान होते हैं। मैं उनके शुभ कर्मों के अनुसार ही उनके धन-धान्य में वृद्धि करता हूं।  वे शुभकर्मी पुनः उस कमाए धन का दान करते हैं, मंदिर व धर्मशाला आदि बनवाकर अपने पुण्य में वृद्धि करते हैं। इस प्रकार वे कई जन्मों तक ऐश्वर्य भोगते हैं।  हे मातेश्वरी! अनेक मनुष्य धन के लोभ में पड़कर ऐश्वर्य का जीवन जीने के लिए तरह-तरह के गलत कर्म कर बैठते हैं, जिसका नतीजा यह निकलता है कि वे स्वयं अपने कई जन्म बिगाड़ लेते हैं। भले ही मनुष्य को अपना कम खाकर भी अपना जीवन यापन कर लेना चाहिए लेकिन बुरे कर्म करने से पहले हर मनुष्य को यह सोच लेना चाहिए इसका परिणाम भी उसे खुद ही भोगना पड़ेगा।' इस प्रकार शनिदेव के वचन सुनकर लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं- हे शनिदेव! आप धन्य हैं। प्रभु ने आप पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। आपके इस स्पष्टीकरण से मुझे कर्म-विज्ञान की अनेक गूढ़ बातें समझ में आ गईं। ऐसा कहते हुए लक्ष्मीजी अंतर्ध्यान हो गईं। साभार:-सुनील झा 'मैथिल'

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