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Dharm

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उत्त्तर प्रदेश से सामने आया धर्म परिवर्तन चौकाने वाला मामला जहां एक मुस्लिम महिला ने हिन्दू धर्म अपना लिया इस मुस्लिम महिला की हिन्दू धर्म अपनाने की वजह जान कर लोग बेहद हैरान दिख रहें है। शुक्रवार देर शाम जय शिवसेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित आर्यन के नेतृत्व में मुस्लिम महिला शबनम ने हिंदू धर्म अपना लिया। आर्य समाज के विद्वान शास्त्री ने वैदिक रीति से धर्म परिवर्तन कराया। अब ये शबनम नाम की महिला सीमा बन गई है। हिन्दू हुई इस महिला के मुताबिक, वह जय शिवसेना के साथ मिलकर तीन तलाक व मुस्लिम धर्म में व्याप्त अन्य कुरीतियों से पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए लड़ाई लड़ेगी। इसी वजह से उसने धर्म परिवर्तन कराया है। महिला के धर्म परिवर्तन के बाद जय शिवसेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित आर्यन ने कहा कि हमारी पार्टी धर्म बदलने के लिए किसी पर दबाव नहीं डालती, लेकिन हमारे पास जो भी मुस्लिम महिला अपनी परेशानी लेकर आएगी, हम उसकी पूरी मदद करेंगे। प्रशासन ने हमारे इस काम में काफी अड़ंगे लगाए, लेकिन महिला ने धर्म परिवर्तन कर ही लिया। अमित आर्यन ने कहा कि धर्म परिवर्तन का काम वैदिक रीति के अनुसार कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को शुद्धिकरण का अधिकार है। उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में कैला भट्टा में रहने वाली इस महिला को 2014 में उसके पति ने तलाक दे दिया था। ऐसे में इद्दत की अवधि के बाद उसने पति का घर छोड़ दिया था। उस वक्त महिला के 2 बच्चे थे। पीड़िता का आरोप है कि उसके पति ने गुमराह करके उसे वापस बुला लिया। वहीं, हलाला की आड़ में महिला से वेश्यावृत्ति कराई गई।

हेल्थ डेस्क: आज के समय में हर कोई अपनी सेहत को ज्यादा ध्यान देते है। कई लोग तो ऐसे होते है जो खाने से पहले सौ बार सोचते है कि हमारी सेहत के लिए क्या सही है और क्या नहीं। पुराने जमाने में कहा जाता था साथ ही इस बात में जोर दिया जाता था कि उनका बच्चा भरपूर मात्रा में रोटी, दूध, घी का सेवन करे। जिससे कि बुढ़ापे तक उन्हें किसी भी तरह की बीमारी न हो। आज के समय में हम जंकफूड, चावल, रोटी में ज्यादा रहते है। साथ में इस बात की उलझन रहती है कि हमारी बॉडी के लिए चावल खाना ज्यादा सही है या फिर रोटी। चावल और दोनों को ही इंडियन खाना का एक पार्ट माना जाता है। इन दोनों के बिना खाना अधूरा माना जाता है, लेकिन जो लोग अपनी सेहत का अधिक ध्यान रखते है वह इस बात में उलझे रहते है कि उनकी सेहत के लिए ज्यादा क्या सही है। वह कई लोगों के पूछते भी रहते है कि आखिर आपकी सेहत के लिए सबसे ज्यादा पोषण किससे मिलेगा। हम अपनी खबर में बताएंगे कि आखिर आपकी सेहत के लिए सबसे ज्यादा कौन सी चीज ठीक है रोटी या फिर चावल। ब्लड शुगर चावल और रोटी दोनों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स एक सा होता है। यानी कि दोनों से बल्ड प्रेशर एक ही तरह बढ़ता है। इसलिए आपको अगर ब्लड प्रेशर की समस्या है तो आप दोनों चीज का सकते है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि चावल ज्यादा मात्रा में न खाएं। हो वजन बढने की चिंता चावल में भरपूर मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। जिसके कारण ये जल्दी से पच जाता है। साथ ही चावल में फैट अधिक होता है। वही रोटी देर तक नहीं पचती है। जिससे आपको देर तक भूख नहीं लगती है। अगर आप अपनी डाइटिंग, थायराइड, मोटापा पर ध्यान दे रहे है, तो चावल से दूरी बना कर रखें। पाचन तंत्र को कौन रखता ज्यादा फिट चावल में कम कार्बोहाइड्रेट और कै‍लोरी की मात्रा ठीक होती है। वही रोटी में कैलोरी और संयुक्त कार्बोहाड्रेट शामिल होता है। इसलिए अगर आप चावल खाते हैं तो उसमें रोटी की तुलना में कार्बोहाइड्रेट को ब्रेक करने के लिये कम ऊर्जा का प्रयोग होता है। अगर आपका पेट ठीक नहीं रहता है तो आपके लिए चावल सबसे अच्छा ऑप्शन है। पोषण तत्वों से भरपूर चावल में कम मात्रा में फॉस्‍फोरस, पोटेशियम और मैग्‍नीशियम पाया जाता है। वही रोटी में चावल की तुलना में अधिक मात्रा में कैल्‍श‍ियम, फॉस्‍फोरस, आयरन और पोटेशियम जैसे मिनरल्‍स पाए जाते हैं। चावल में कैल्‍श‍ियम, सोडियम नहीं होता। वही रोटी में चावल के मुकाबले ज्‍यादा फाइबर, प्रोटीन, माइक्रोन्‍यूट्र‍िएंट्स और सोडियम मिलता है। चावल में सोडियम नहीं होता। रोटी और चावल, दोनों में फोलेट मिलता है। यह पानी में घुलनशील विटामिन बी है। हालांकि, फोलेट के लिए चावल रोटी के मुकाबले ज्‍यादा बेहतर स्रोत है।

हमारे आस-पास और घर में मौजूद चीजों का किसी न किसी रुप में हम पर जरुर असर होता है। आपने देखा होगा कि कोई चीज आपके घर में आई होगी और उसके बाद से घर में एक के बाद एक खुशखबरी और उन्नति होती गई होगी। वैसे ही नया घर या काम शुरू करने को बाद कई बार घर में सुख-शांति नहीं रहती। धंधा करने वालों को काम में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है कई बार तो धंधा बंद तक करना पड़ जाता हैं। वास्तु विज्ञान में ऐसी ही कुछ चीज का उल्लेख किया गया है जिससे नए मकान-फैक्ट्री व उद्योग के शुरुआत में करने से सुख-शांति औऱ काम में उन्नति मिलती है। वास्तु विशेषज्ञों की मानें तो अगर आप नए मकान-फैक्ट्री व उद्योग को शुरू करने वाले हैं तो उपाय जरूर करें। भूमि-पूजन करके नींव का मूहूर्त अवश्य करना चाहिए। इस मूहूर्त में चांदी का सर्प बनाकर जमीन में जरूर डालना चाहिए। भारतीय मान्यता के अनुसार जिस प्रकार शेषनाग के सिर पर पूरी पृथ्वी का भार है, ठीक उसी प्रकार से इस भवन का भार शेषनाग की तरह सर्प के उपर रखा रहेगा। इससे मकान की नींव कभी नहीं टूटेगी और बनी रहेगी। मकान किसी भी आपदा से बचा रहेगा। यह प्रयोग सैकड़ो बार परीक्षित है। इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य व सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

ज्वालामुखी देवी – यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार – होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा :- ============================== हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलो मीटर दूर स्तिथ है ज्वालामुखी देवी। ज्वालामुखी मंदिर को जोता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता है। इसकी गिनती माता के प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। मान्यता है यहाँ देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहाँ पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं।  इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद के करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया। अकबर और ध्यानु भगत की कथा इस जगह के बारे में एक कथा अकबर और माता के परम भक्त ध्यानु भगत से जुडी है। जिन दिनों भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था,उन्हीं दिनों की यह घटना है। हिमाचल के नादौन ग्राम निवासी माता का एक सेवक धयानू भक्त एक हजार यात्रियों सहित माता के दर्शन के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली मे उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानु भक्त को पेश किया। बादशाह ने पूछा तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहां जा रहे हो। ध्यानू ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया मैं ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहा हूं मेरे साथ जो लोग हैं, वह भी माता जी के भक्त हैं, और यात्रा पर जा रहे हैं।अकबर ने सुनकर कहा यह ज्वालामाई कौन है ? और वहां जाने से क्या होगा? ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया महाराज ज्वालामाई संसार का पालन करने वाली माता है। वे भक्तों के सच्चे ह्रदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है उनके स्थान पर बिना तेल-बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन जाते हैं। अकबर ने कहा अगर तुम्हारी बंदगी पाक है तो देवी माता जरुर तुम्हारी इज्जत रखेगी। अगर वह तुम जैसे भक्तों का ख्याल न रखे तो फिर तुम्हारी इबादत का क्या फायदा? या तो वह देवी ही यकीन के काबिल नहीं, या फिर तुम्हारी इबादत झूठी है। इम्तहान के लिए हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते है, तुम अपनी देवी से कहकर उसे दोबारा जिन्दा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गई। ध्यानू भक्त ने कोई उपाए न देखकर बादशाह से एक माह की अवधि तक घोड़े के सिर व धड़ को सुरक्षित रखने की प्रार्थना की। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा करने की अनुमति भी मिल गई। बादशाह से विदा होकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार मे जा उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि करने के बाद रात भर जागरण किया। प्रात:काल आरती के समय हाथ जोड़ कर ध्यानू ने प्राथना की कि मातेश्वरी आप अन्तर्यामी हैं। बादशाह मेरी भक्ती की परीक्षा ले रहा है, मेरी लाज रखना, मेरे घोड़े को अपनी कृपा व शक्ति से जीवित कर देना। कहते है की अपने भक्त की लाज रखते हुए माँ ने घोड़े को फिर से ज़िंदा कर दिया। यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया | उसने अपनी सेना बुलाई और खुद  मंदिर की तरफ चल पड़ा | वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई | उसने अपनी सेना से मंदिर पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं।| तब जाकर उसे माँ की महिमा का यकीन हुआ और उसने सवा मन (पचास किलो) सोने  का छतर चढ़ाया | लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर गिर कर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया | आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं | पास ही गोरख डिब्बी का चमत्कारिक स्थान : - मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एव भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बाये हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। थोडा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। कहते है की यहाँ गुरु गोरखनाथ जी पधारे थे और कई चमत्कार दिखाए थे।  यहाँ पर आज भी एक पानी का कुण्ड है जो देख्नने मे खौलता हुआ लगता है पर वास्तव मे पानी ठंडा है। ज्वालाजी के पास ही में 4.5 कि.मी. की दूरी पर नगिनी माता का मंदिर है। इस मंदिर में जुलाई और अगस्त के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। 5 कि.मी. कि दूरी पर रघुनाथ जी का मंदिर है जो राम, लक्ष्मण और सीता को समर्पि है। इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा कराया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढी हुई है। चमत्कारिक है ज्वाला : - पृत्वी के गर्भ से इस तरह की ज्वाला निकला वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहाँ पर ज्वाला प्राकर्तिक न होकर चमत्कारिक है क्योंकि अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अन्दर से निकलती ‘ऊर्जा’ का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस ‘ऊर्जा’ को नहीं ढूंढ पाए। वही अकबर लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाए। यह दोनों बाते यह सिद्ध करती है की यहां ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पाद होता ।। सुनील झा " मैथिल"

हाल ही में कुछ मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक पर काफी विवाद हुआ। मंदिर के प्रमुख लोगों का कहना था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए। दरअसल मंदिर प्रमुख का कहना है कि मासिक धर्म टेस्ट करने वाली मशीन के चेक होने के बाद ही महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिलेगी। उन्हें लगता है कि महिलाओं की शुद्धता का पता लगाना मुश्किल होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं महिलाओं को होने वाले मासिक धर्म का उल्लेख हिंदू धर्म ग्रंथो में भी मिलता है। भागवत पुराण के अनुसार स्त्रियों को मासिक धर्म क्यों होता है? इस बारे में एक पौराणिक कथा मिलती है। पुराण के अनुसार एक बार 'बृहस्पति' जो देवताओं के गुरु थे, एक बार वह देवराज इंद्र से काफी नाराज हो गए। इसी दौरान असुरों ने देवलोक परआक्रमण कर दिया और इंद्र को इंद्रलोक छोड़कर जाना पड़ा। तब इंद्र, ब्रह्माजी के पास पहुंचे और उनसे मदद की मांग की। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि, इंद्र देव आपको किसी ब्रह्म-ज्ञानी की सेवा करनी चाहिए ऐसे में आपके दु:ख का निवारण होगा। तब इंद्र एक ब्रह्म-ज्ञानी व्यक्ति की सेवा करने लगे। लेकिन वो इस बात से अनजान थे कि उस ब्रह्म-ज्ञानी की माता असुर थीं। माता का असुरों के प्रति विशेष लगाव था। ऐसे में इंद्र देव द्वारा अर्पित सारी हवन सामग्री जो देवताओं को अर्पित की जाती थी, वह ब्रह्म-ज्ञानी असुरों को चढ़ाया करते थे। इससे इंद्र की सेवा भंग हो गई। जब इंद्र को यह बात पता चली तो वो बहुत नाराज हुए। उन्होंने उस ब्रह्म-ज्ञानी की हत्या कर दी। हत्या करने से पहले इंद्र उस ब्रह्म-ज्ञानी को गुरु मानते थे और गुरु की हत्या करना घोर पाप है। इसी कारण उन्हें ब्रह्महत्या का दोष भी लग गया। ये पाप एक भयानक दानव के रूप में उनका पीछा करने लगा। किसी तरह इंद्र ने स्वयं को एक फूल में छुपाया और कई वर्षों तक उसी में भगवान विष्णु की तपस्या करते रहे। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और इंद्र को ब्रह्म हत्या के दोष से बचा लिया। उन्होंने इस पाप मुक्ति के लिए एक सुझाव दिया। सुझाव के अनुसार इंद्र ने पेड़, जल, भूमि और स्त्री को अपने पाप का थोड़ा थोड़ा अंश देने के लिए मनाया। इंद्र की बात सुनकर वह तैयार हो गए। इंद्र ने उन्हें एक-एक वरदान देने की बात कही। सबसे पहले पेड़ ने ब्रह्महत्या के पाप का एक चौथाई हिस्सा लिया जिसके बदले में इंद्र ने पेड़ को अपने आप जीवित होने का वरदान दिया। इसके बाद जल ने एक चौथाई हिस्सा लिया तो इंद्र ने जल को वरदान दिया कि जल को अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति होगी। तीसरे पड़ाव में भूमि ने ब्रह्म हत्या का दोष इंद्र से लिया बदले में इंद्र ने भूमि को वरदान दिया कि भूमि पर आने वाली कोई भी चोट से उसे कोई असर नहीं होगा और वो फिर से ठीक हो जाएगी। आखिर में स्त्री ही शेष बची थी। इंद्र का ब्रह्म हत्या का दोष स्त्री ने लिया। बदले में इंद्र ने स्त्री को वरदान दिया कि स्त्रियों को हर महीने मासिक धर्म होगा। लेकिन महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा काम का आनंद उठा सकेगीं। पौराणिक मतों के अनुसार स्त्रियां ब्रह्म हत्या यानी अपने गुरु की हत्या का पाप सदियों से उठाती आ रही हैं। इसलिए उन्हें मंदिरों में अपने गुरुओं के पास जाने की इजाजत नहीं है। मान्यता है कि तभी से स्त्रियों में मासिक धर्म का होना शुरू हुआ। हालांकि आधुनिक युग में वैज्ञानिक मत को मानने वाले लोग इन बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं।

सूर्योपासना के महापर्व छठ के दूसरे दिन शनिवार को व्रतियों ने खरना किया। व्रती दिनभर पर उपवास रहे और सूर्यास्त के बाद मिट्टी के नये चूल्हे पर दूध, गुड़ व साठी के चावल से खीर बनाया। गेहूं के आटे की रोटी का प्रसाद बना। केले के पत्ते पर छठी मईया को इसका भोग लगाने के बाद प्रणाम कर व्रत पूरा करने के लिए आशिर्वाद मांगा। इसके बाद परिवार वालों के साथ बैठकर उन्होंने खीर- रोटी का प्रसाद ग्रहण किया। इस प्रसाद के बाद व्रतियों का 36 घंटे का व्रत प्रारंभ हो गया। अब वे सात नवंबर को सुबह उगते सूर्य को अ‌र्घ्य देने के बाद ही अन्न व जल ग्रहण करेंगे। आटा चक्कियों पर रही भीड़ छठ पूजा का गेहूं पिसवाने के लिए शनिवार को शहर की आटा चक्कियों पर भीड़ उमड़ी। आटा चक्की संचालकों ने भी पर्व महत्ता को ध्यान में रखते हुए पहले चक्की की साफ- सफाई की और उसे धोने के बाद पर्व के गेहूं की पिसाई शुरू की। इस दौरान दूसरा कोई अनाज नहीं पीसा गया। पर्व का गेहूं समाप्त होने के बाद ही दूसरे अनाज की पिसाई शुरू की गई. छठ पूजा घरों में बना प्रसाद खरना के बाद उसी चूल्हे पर प्रसाद बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई जिस पर खरना का प्रसाद बनाया गया था। इस दौरान प्रसाद बनाने वाली महिलाएं छठ के गीत गाने के साथ प्रसाद तैयार करने में लगी रहीं। प्रसाद में ठेकुआ, खजूर आदि बनाया गया। घर के पुरुष सदस्य बाजार में छठ के प्रसाद फल- सब्जियों की खरीदारी में जुटे रहे। इस दौरान गन्ना, केला, सेब, संतरा, सिंघाड़ा, शकरकंद, मूली, अनानास, गॉगल, नींबू, सरीफा आदि की खरीदारी की गई.

जय छठि मईया छठ पूजा पूर्ण जानकारी =========================== दीपावली के ठीक छः दिन बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को "सूर्य षष्ठी का व्रत" करने का विधान है। छठे दिन होने के कारण इसे आम बोलचाल में छठ पर्व कहा जाने लगा । इस दिन भगवान सूर्य व षष्ठी देवी की पूजा की जाती है। कहते हैं दुनिया उगते सूरज को हमेशा पहले नमन करती है, लेकिन बिहार के लोगो के लिए ऐसा नहीं हैं। बिहार के लोक आस्था से जुड़े पर्व “छठ” का पहला अर्घ्य डूबते हुए सूरज को दिया जाता हैं। इस पर्व की खास परंपरा है लोग झुके हुए को पहले सलाम करते हैं, और उठे हुए को बाद में। लोक आस्था का कुछ ऐसा ही महापर्व हैं “छठ”। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। सामूहिकता का हैं प्रतीक :- सामूहिकता के मामले में बिहारियों का यह पर्व पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। एक ऐसी मिशाल जो ना केवल आस्था से भरा हैं, बल्कि भेदभाव मिटाकर एक होने का सन्देश भी दे रहा हैं। एक साथ समूह में जल में खड़े हो भगवान् भाष्कर की अर्चना सभी भेदभाव को मिटा देती हैं। भगवान् आदित्य भी हर सुबह यहीं सन्देश लेकर आते हैं, कि किसी से भेदभाव ना करो, इनकी किरणे महलों पर भी उतनी ही पड़ती हैं जितनी की झोपडी पर। इनके लिए ना ही कोई बड़ा हैं ना ही कोई छोटा, सब एक समान हैं। भगवान् सूर्य सुख और दुःख में एक सामान रहने का सन्देश भी देता हैं। इन्ही भगवान् सूर्य की प्रसन्नता के लिए हम छठ पूजा मनाते हैं। मैया हैं छठ फिर क्यों होती हैं सूर्य की पूजा :- व्याकरण के अनुसार छठ शब्द स्त्रीलिंग हैं इस वजह से इसे भी इसे छठी मैया कहते हैं। वैसे किवदंती अनके हैं कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की बहन मानते हैं तो कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की माँ, खैर जो भी आस्था का ये पर्व हमारे रोम रोम में बसा होता हैं। छठ का नाम सुनते ही हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता हैं और हम गाँव की याद में डूब जाते हैं। इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं। दुनिया का सबसे कठिन व्रत :- चार दिनों यह व्रत दुनिया का सबसे कठिन त्योहारों में से एक हैं। यह व्रत बड़े नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। पवित्रता की इतनी मिशाल की व्रती अपने हाथ से ही सारा काम करती हैं। नहाय-खाय से लेकर सुबह के अर्घ्य तक व्रती पूरे निष्ठा का पालन करती हैं। भगवान भास्कर को 36 घंटो का निर्जल व्रत स्त्रियों के लिए जहाँ उनके सुहाग और बेटे की रक्षा करता हैं। वही भगवान् सूर्य धन, धान्य, समृधि आदि प्रदान करते हैं । सूर्यषष्ठी-व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्य के पूर्व षष्ठीदेवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है । व्रत का पहला दिन नहाय खाय :- पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन व्रती कद्दू/लौकी/दूधी की सब्जी, चने की दाल, और अरवा चावल का भात खाती हैं। व्रत का दूसरा दिन लोहंडा और खरना :- दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को व्रती गन्ने के रस की खीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा (मिट्टी के बर्तन) में खीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। इसे ‘खरना’ कहा जाता है । खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला (बिना अन्न-जल) उपवास रखा जाता है।

पटना. लोकआस्था के महापर्व छठ की छटा बिहार में छाने लगी है। हर गली-मोहल्ले में ‘कांचहि बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए..., दर्शन दीहीं ना अपन ये छठी मइया...’ जैसे गीत गूंज रहे हैं। हर साल की तरह इस साल भी छठ पूजा में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले बिहारियों के आने का सिलसिला जारी है। छठ पूजा में शामिल होने के लिए हर साल पांच-छह लाख लोग बिहार आते हैं। अकेले रेलवे ने इस साल 24 स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं। इस बार एक करोड़ घरों में व्रत होगा। पर्व के दौरान पांच दिनों तक करीब 300 करोड़ रुपए के कारोबार का भी अनुमान है। बता दें शुक्रवार से नहाय-खाय के साथ छठ पर्व की शुरुआत हो रही है। जानिए कहां से ज्यादा जाते हैं बिहारी... - में 70 से 80 फीसदी घरों में लोग छठ पूजा करते हैं। इसके अलावा देश के उन सभी राज्यों और दूसरे देशों में जहां भी बिहार के लोग रहते हैं, छठ पूजा हाेती है। - इस दौरान बिहार में प्रसाद, पूजन-सामग्री, फल आदि मिलाकर करीब 300 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार होता है। पटना के बहादुरपुर बाजार समिति में दीपावली के अगले दिन ही छठ के लिए फलों की बिक्री शुरू हो जाती है। - फल कारोबारी शहजाद आलम ने बताया कि पहले तीन दिन बाहर के लोग और व्यवसायी फल खरीदते हैं। पहले अर्घ्य से दो दिन पहले लोकल बिजनेसमैन और जिनके यहां छठ होती है, वे फल खरीदने आते हैं। - वहीं काम करने वाले सरफू खान बताते हैं कि 6 महीने के बराबर फल छठ में 5 दिनों में बिक जाते हैं। अकेले सेब की बिक्री इतनी होती है कि 150 से 175 ट्रक सेब कश्मीर से मंगाए जाते हैं। 24 पूजा स्पेशल ट्रेनें, ज्यादातर में नो रूम; फ्लाइट का किराया 68 हजार रु. तक - देशभर से 246 ट्रेनें पटना जाती हैं। इसके बावजूद छठ के लिए पूर्व मध्य रेल के पांचों मंडलों में 24 पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाने का एलान किया गया है। - फिलहाल ज्यादातर ट्रेनों में 355 से 400 तक की वेटिंग चल रही है या नो रूम है। यानी इनमें वेटिंग का टिकट भी नहीं बचा है। - पटना के लिए 20 फ्लाइट्स हैं, लेकिन दिल्ली से पटना के लिए 7 से 22 हजार रुपए तक का किराया लग रहा है। मुंबई-पटना का किराया 68 हजार रुपए तक है। दिल्ली से पटना तक किराया (रु. में) डेट मिनिमम मैक्सिमम 03 नवंबर 7011 26155 04 नवंबर 9460 22000 05 नवंबर 7446 22000 मुंबई से पटना तक किराया (रु. में) डेट मिनिमम मैक्सिमम 03 नवंबर 11900 21254 04 नवंबर 11957 33013 05 नवंबर 9566 68166 यहां से जाते हैं ज्यादातर बिहारी - छठ पर सबसे ज्यादा लोग दिल्ली से जाते हैं। इसके बाद मुंबई, लखनऊ का नंबर है। कोलकाता, रांची से भी बड़ी तादाद में लोग पहुंचते हैं। - मध्य प्रदेश में इंदौर से पटना जाने वालों की तादाद सबसे ज्यादा रहती है।

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