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Dharm

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श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती है ? भगवान गणेश की पूजा के बिना दुनिया का कोई भी कार्य पूरा नहीं होता. श्री गणेश का पूर्ण जीवन ही रोचक घटनाओं से भरा है और इसी में से एक है कि आखिर क्यूं श्री गणेश जी की पूजा पर तुलसी अर्पित नहीं की जाती. प्राय: पूजा-अर्चना में भगवान को तुलसी चढ़ाना बहुत पवित्र माना जाता है। व्यावहारिक दृष्टि से भी तुलसी को औषधीय गुणों वाला पौधा माना जाता है। किंतु भगवान गणेश की पूजा में पवित्र तुलसी का प्रयोग निषेध माना गया है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा है - एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। तभी विवाह की इच्छा से तीर्थ यात्रा पर निकली देवी तुलसी वहां पहुंची। वह श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया। इस बात से दु:खी तुलसी ने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दिया। इस श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारी संतान असुर होगी। एक राक्षस की मां होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारी संतान शंखचूर्ण राक्षस होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा। तब से ही भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।

सोशल मीडिया पर भगवान राम को लेकर एक मैसेज इन दिनों काफी चर्चा में हैं। फेसबुक पर शेयर हो रहे इस पोस्ट में बताया गया है कि दशहरे के 21 दिन बाद ही दिवाली इसलिए मनाई जाती है क्योंकि दशहरे के दिन रावण को मारने के बाद भगवान राम पैदल अयोध्या लौटे थे। श्रीलंका से अयोध्या पहुंचने में भगवान राम को 21 दिन लगे थे। इस पोस्ट में गूगल मैप का एक फोटो भी शेयर किया जा रहा है। वायरल मैसेज पर अलग-अलग राय... - दावा किया जा रहा है कि श्रीलंका से अयोध्या की दूरी 2586 किमी है। इस दूरी को अगर पैदल तय किया जाए तो उसमें भी 21 दिन (514घंटे) लगेंगे। - यानी रोजाना करीब 123 किमी चलना पड़ेगा। मतलब हर घंटे पांच किमी चलना पड़ेगा, वो भी बिना रुके। यह मैसेज फेसबुक के अलावा वॉट्सऐप पर भी बहुत शेयर हो रहा है। - ट्विटर पर भी रामअयोध्यारोडट्रिप के नाम से हैशटेग चल रहा है। इस हैशटेग को लेकर कई लोग ट्वीट कर रहे हैं। - कई लोग इस पोस्ट को सपोर्ट कर रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ लोगों ने सवाल भी उठाया है कि राम पैदल नहीं, पुष्पक विमान से लंका से अयोध्या लौटे थे। गूगल पर राम का यह रूट बताया गया - गूगल पर यह रूट श्रीलंका के डमबुल्ला के चांदना से शुरू होता है। यहां से किंबिसा, गलकुलामा, मिहिंटाले, मेडवाछिया होते हुए तलाईमन्नार तक पहुंचता है। - इसके बाद वहां से समुद्र के जरिए रामेश्वरम पहुंचता है। भारत में यह रामेश्वरम से कुंबोकोणम, कांचीपुरम, तिरूपति, नेल्लोर, ओंगले, सूर्यापेट पहुंचता है। - जहां से महाराष्ट्र के चंद्रपुर, नागपुर होते हुए एमपी के सिवनी, जबलपुर, कटनी, रीवा। इसके बाद यूपी के इलाहाबाद, सारोन, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, रेहट होते हुए अयोध्या जाता है। क्योरा पर 2015 से चल रही बहस, अब तक 41 हजार से लोगों ने देखा है पेज - सवाल-जवाब की वेबसाइट क्योरा पर भी मामले को लेकर बहस छिड़ी हुई है। 2015 में क्योरा पर सवाल किया गया कि दशहरे के बाद राम कितने दिन बाद अयोध्या पहुंचे थे। - इस पर कई लोगों ने अपनी राय दी है। किसी ने फोटो तो किसी ने ग्राफिक्स के जरिए अपना जवाब दिया। - कई लोगों ने अपने तर्क के साथ दूसरी वेबसाइट्स के लिंक भी शेयर किए हैं। सवाल-जवाब के इस पेज को 41 हजार 400 से अधिक लोगों ने देखा है।

नई दिल्ली. तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के रवैये पर एतराज जताया है। बोर्ड से जुड़े हजरत मौलाना वली रहमानी ने गुरुवार को कहा- 'हम यूनिफॉर्म सिविल कोड का बायकॉट करेंगे। ये सोच मुल्क को तोड़ने वाली, गैरवाजिब और नामुनासिब है।' रहमानी ने यह भी कहा, 'मोदी ने ढाई साल की नाकामी और असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए लिए ये शोशा छोड़ा है। हम इसका विरोध करेंगे।' बता दें कि पिछले हफ्ते शुक्रवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर तीन तलाक और बहु विवाह को खत्म करने के लिए यूनिफॉर्म सिविल लॉ की वकालत की थी। केंद्र ने हलफनामे में क्या कहा था... - तीन तलाक पर हलफनामा मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस की एडिशनल सेक्रेट्री मुकुलिता विजयवर्गीय ने दायर किया है। - सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा है- 'भारत में जारी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह का इस्लाम में रिवाज नहीं है। तीन बार तलाक कहना महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। सच तो ये है कि कई मुस्लिम देशों में इस बारे में बड़े सुधार किए जा चुके हैं।' - देश की कॉन्स्टिट्यूशनल हिस्ट्री में पहली बार सरकार ने महिला-पुरुष में बराबरी और सेकुलरिज्म के आधार पर इन पर फिर से विचार करने की अपील की है। - हलफनामे में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह की वैधता का मुद्दा उठाते हुए कहा गया है कि लैंगिक भेदभाव खत्म करने, गरिमा और समानता के सिद्धांत के आधार पर इन पर विचार किया जाना चाहिए। ये ऐसी चीजें हैं जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता। - सरकार की तरफ से ये भी कहा गया है कि भारत में महिलाओं को उनके कानूनी अधिकार देने से इनकार नहीं किया जा सकता। इन मुस्लिम देशों के कानूनों का किया जिक्र - हलफनामा में केंद्र सरकार कहा है- 'मुस्लिम देशों में इसमें पहले ही बदलाव किया जा चुका है।' - केंद्र ने ईरान, इजिप्ट, इंडोनेशिया, तुर्की, ट्यूनीशिया, मोरक्को, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में निकाह कानून में हुए बदलाव का एग्जाम्पल दिया है। - साथ ही कहा है- 'तीन तलाक के मुताबिक, हसबेंड अपनी बीवी को तीन बार तलाक बोलकर ही तलाक दे देता है। निकाल हलाल के मुताबिक, तलाकशुदा कपल तब तक शादी नहीं कर सकते, जब तक कि महिला दोबारा शादी करने के बाद तलाक लेकर या फिर सेकेंड हसबेंड की मौत होने के बाद सिंगल नहीं हो जाती।' सरकार ने क्यों दायर किया हलफनामा? - शायरा बानो समेत कई लोगों की तरफ से दायर पिटीशन में मुस्लिमों में जारी इन प्रथाओं की वैधता को चुनौती दी गई थी। - मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इन पिटीशन को खारिज करने की मांग की थी। कहा था-'इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए।' - जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था। पिछले दिनों केंद्र ने जवाब देने के लिए कोर्ट से 4 हफ्तों का समय मांगा, जिसे कोर्ट ने मान लिया था।

ये आप सभी जानते हें कि दुर्गा पूजा में पूजी जाने वाली माँ दुर्गा की भव्‍य मूर्तियों का एक खास महत्व होता है। जहां तक हम जानते हैं कि आप ये शायद ही जानते होंगे कि उस मिट्टी का भी बेहद महत्‍व होता है जिनसे ये मूर्तियां तैयार की जाती हैं। ये मिट्टी कई विशिष्‍ठ स्‍थानों से ला कर तैयार की जाती है। जैसे पवित्र गंगा के किनारों से। फिर इसमें गोबर, गौमूत्र और थोड़ी सी मिट्टी निषिद्धो पाली से मंगाकर मिलायी जाती है। अब आप सोचेंगे कि निषिद्धो पाली क्या है, तो ये वेशओं के रहने के स्‍थान जिसके बाहर से मिट्टी लायी जाती है। आइये जाने इसकी पूरी कहानी। दुर्गा उत्‍सव और मूर्तियों की कहानी दरसल दुर्गा पूजा या दुर्गा उत्‍सव मूल रूप से पश्‍चिम बंगाल का त्‍योहार है, पर अब ये त्‍योहार पूरे भारत में समान उत्‍साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस मौके पर मां दुर्गा की विशाल मूर्तियों से दुर्गा पूजा के पंडाल सजाये जाते हैं। पश्‍चिम बंगाल में मुख्‍य रूप से में दुर्गा मां की प्रतिमाओं का निर्माण उत्तरी कोलकत्ता के कुमरटली इलाके में होता है। मां लक्ष्मी, सरस्वती और पूजा में प्रयोग होने वाली अन्‍य मूर्तियों का निर्माण करने वाला ये इलाका अपने कारीगरों के लिए पूरे भारत में मशहूर है। साथ ही मशहूर है यहां के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया सोनागाछी से लायी गयी मिट्टी का मूर्तियां बनाने में प्रयोग करना। अब जब भारत के अन्‍य हिस्‍सों में भी मूर्तियों का र्निमाण होने लगा है तो वहां भी इस वेश्‍यालय के बाहर की मिट्टी बोरों में भर कर वहां बिकने जाने लगी है। वैसे कुछ लोग स्‍थानीय वेश्‍यालयों के बाहर की मिट्टी भी प्रयोग करने लगे हैं। क्‍यों होती है वेश्‍यालय के दरवाजे की मिट्टी इसकी भी कई कहानियां प्रचलित हैं। मां के आर्शिवाद का परिणाम कुछ जानकारों का कहना है कि प्राचीन काल में एक वेश्‍या मां दुर्गा की अन्‍नय भक्‍त थी उसे तिरस्कार से बचाने के लिए मां ने स्‍वंय आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई। समाज सुधार का प्रतीक कोलकाता से ही कई सामाजिक सुधार के मूवमेंट भी चले हैं। इन्‍हीं में से एक महिलाओं के सम्‍मान के लिए भी था और इसी लिए ये मान्यता प्रचलित की गयी कि नारी शक्ति का ही एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उससे कहीं गलती होती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है, फिर चाहे वो वेश्‍या ही क्‍यों ना हो। वेश्‍या के घर के बाहर की मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे उन्हें सम्मान देने का यही उद्देश्य है। सांकेतिक मान्‍यता इसके अलावा एक मान्यता ये भी है कि जब एक महिला या कोई अन्‍य व्‍यक्‍ति वेश्‍यालय के द्वार पर खड़ा होता है तो अंदर जाने से पहले अपनी सारी पवित्रता और अच्‍छाई को वहीं छोड़कर प्रवेश करता है, इसी कारण यहां की मिट्टी पवित्र मानी जाती है।

कुछ ही दिनों बाद 30 अक्टूबर को दिवाली यानी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का शुभ मुहुर्त आने वाला है. इस दिन की गई लक्ष्मी पूजा से घर की गरीबी दूर हो सकती है, लेकिन लक्ष्मी पूजा के साथ ही कुछ और बातें भी हैं, जिनका ध्यान हमेशा रखने पर देवी की कृपा हम पर बनी रहती है. गुस्से से बचें : अभी से इस बुरी आदत पर नियंत्रण रखना शुरू कर दें, ताकि दिवाली के त्यौहार पर घर में सुख-शांति रहे. कहा जाता है कि दिवाली पर क्रोध करना और चिलाना अशुभ माना जाता है. जो लोग इन दिनों क्रोध करते हैं उनसे मां लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं. वाद-विवाद से बचें : घर में किसी भी तरह का कलह या झगड़ा ना करें. घर परिवार के सभी सदस्य प्रेम से रहें और ख़ुशी का माहौल बनाकर रखें. जहां झगड़ा और कलह होता है वहां लक्ष्मी जी की कृपा नहीं होती. घर में गंदगी से बचें : दिवाली के त्यौहार पर साफ-सफाई का विशेष महत्व है. घर में गंदगी नहीं होनी चाहिए. घर का कोना-कोना एक दम साफ रखें. किसी भी प्रकार की बदबू घर में या घर के आस पास ना हो. घर में सुगन्धित वातावरण बनाएं रखें. नशे से बचें : दिवाली के समय किसी भी प्रकार का नशा ना करें. कहा जाता है कि जो लोग नशा करते हैं वो हर समय परेशानियों से घिरे रहते हैं. नशे के कारण घर की शांति भांग हो सकती है और तनाव का सामने करना पड़ सकता है.Diwali-festival-Of-lights बुजुर्गों का अपमान ना करें : इस बात का विशेष ध्यान रखें कि किसी भी परिस्थिति में माता-पिता या किसी अन्य बुजुर्ग का अपमान ना करें और वो आपकी वजह से उदास ना हों. सभी का सम्मान करें. जो लोग माता-पिता का सम्मान नहीं करते वो हमेशा दरिद्र बने रहते हैं. शाम को सोने से बचें : कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर दिन में या शाम के समय ना सोएं. यदि कोई व्यक्ति बीमार है वृद्ध है या कोई स्त्री गर्भवती है तो वह दिन में या शाम को सो सकते हैं लेकिन स्वस्थ व्यक्ति शाम को ना सोएं.

धार्मिक स्‍थलों का गढ़ कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में पूरे साल भक्‍तों का डेरा रहता है। यहां पर काफी अद्भुत शक्‍ित वाले मंदिर जो हैं। जिनमें से ही एक मंदिर शक्तिपीठ भलेई है। इस मंदिर में अगर मां की मूर्ति पर पसीना आ जाए तो समझो भक्‍तों की मन्‍नत पूरी हो गई। आइए जानें इस मंदिर के बारे में... मूर्ति पर पसीना देवभूमि हिमाचल प्रदेश में चंबा जिलेसे लगभग 40 कि.मी. दूर पर शक्तिपीठ भलेई माता का मंदिर स्थित है। यह मंदिर बड़ा शक्‍ितशाली माना जाता है। नवरात्रों के अवसर पर श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ होती है। यहां पर मंदिर को लेकर एक बात जो कही जाती है वह यह है कि अगर मां की मूर्ति पर पसीना आ जाए तो समझो भक्‍तों की मुराद पूरी हो गई है। घंटों इंतजार करते ऐसे में यहां पर भक्‍त मां की मूर्ति पर पसीना आने का घंटों इंतजार किया करते हैं क्‍योंकि पसीने के समय जितने भक्‍त मौजूद होते हैं उन सबकी मुराद पूरी हो जाती है। कहा जाता है कि यह मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। माता रानी को यहां पर भलेई को जागती ज्योत के नाम से भी पुकारते हैं। यहां पर पूरे साल ही भक्‍तों का आना जाना लगा रहता है। जगह पसंद आई वहीं इस मंदिर के स्‍थापना के बीच कहा जाता है कि भ्राण नामक स्थान पर एक बावड़ी में यह माता प्रकट हुई थीं। उस समय उन्‍होंने चंबा के राजा प्रताप सिंह को सपने में दर्शन देकर उन्‍हें चंबा में स्‍थापित करने का आदेश दिया था। ऐसे में जब राजा उन्‍हें लेकर जा रहे थे तो उन्‍हें भलेई का स्‍थान पसंद आ गया। इस पर माता ने पुन: राजा को स्‍वप्‍न में वहीं भलेई में स्‍थापित करने को कहा। प्रवेश करने लगीं इसके बाद राजा ने उन्‍हें उसी स्‍थान पर स्‍थापित कराकर माता की आज्ञानुसार एक मंदिर बनवा दिया था। हालांकि कुछ दिन तो इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन बाद में वह भी अंदर प्रवेश करने लगी। आज इस मंदिर में देश के कोने-कोने से बड़ी संख्‍या में भक्‍तगण जाते हैं। इतना ही नहीं माता रानी उनकी मुरादें पूरी भी करती हैं।

बक्सर [गिरधारी अग्रवाल]। 'रामायण सर्किट' बनाकर पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की बात होती है तो इसके लिए बक्सर का नाम सबसे पहले आता है। इस नगरी में श्रीराम के आस्था की परंपरा हजारों साल पुरानी है। रामलीला की जीवंत शुरुआत यहीं सवा सौ साल पहले हुई थी। आयोजन अब हर जगह होने लगा है। लेकिन प्रभु श्रीराम की जीवनी को रामलीला के माध्यम से देखनेवालों को यह जानना चाहिए कि अस्त्र-शस्त्र की विद्या अर्जित करने के बाद सीता स्वयंवर में भाग लेने भगवान यहीं से गुरु विश्वामित्र के साथ जनकधाम गए थे। प्रभु श्रीराम की स्मृतियों को समेटे विश्वामित्र की नगरी में दुर्गोत्सव पर श्रीराम और मां भगवती की वंदना दोनों चरम पर है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र की यह तपोभूमि है। यही वह जगह है जहां श्रीराम व लक्ष्मण ने शस्त्र की शिक्षा ग्रहण कर राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार किया था। कई नाम से वर्णित नगरी पुराणों में सिद्ध भूमि बक्सर के कई नाम वर्णित हैं। जैसे सिद्धाश्रम, व्याघ्रसर, वेदगर्भापुरी, वामनाश्रम व बगसर और अब बक्सर...। धार्मिक आख्यानों के मुताबिक महर्षि विश्वामित्र अपने दोनों शिष्य राम-लक्ष्मण संग यहीं रामरेखा घाट से गंगा पार कर राजा जनक के दरबार में पहुंचे थे और सीता स्वयंवर में भाग लिया था। तब, यज्ञराज साकेत की वरद पुत्री तारिका (ताड़का) का वध भी यहीं हुआ था। यहां रामेश्वर मंदिर में शिवलिंग की स्थापना श्रीराम ने अपने हाथों की थी। सवा सौ साल से रामलीला वयोवृद्ध प्रो.महावीर प्रसाद केसरी का कहना है कि सवा सौ वर्ष पहले रामलीला का आयोजन लोक स्वास्थ्य प्रमंडल कार्यालय परिसर में कराया जाता था। इसके उपरांत व्यवसायियों के सहयोग से इसे श्रीचंद मंदिर के निकट कराया जाने लगा। शनै:-शनै: विस्तार होता चला गया और आज किला का रामलीला मंच भी 'रावण वध' के दिन आस्थावानों की भीड़ को देख छोटा प्रतीत होने लगा है।

नवरात्र माँ दुर्गा नवमं रूप मां सिद्धिदात्री नवरात्रि का नवां दिन मां सिद्धिदात्री का है जिनकी आराधना से व्यक्ति को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है उसे बरे कर्मों से लडऩे की शक्ति मिलती है। मां सिद्धिदात्री की आराधना से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कमल के आसान पर विराजमान मां सिद्धिदात्री के हाथों में कमल, शंख गदा, सुदर्शन चक्र है जो हमें बुरा आचरण छोड़ सदकर्म का मार्ग दिखाता है। आज के दिन मां की आराधना करने से भक्तों को यश, बल व धन की प्राप्ति होती है। मां सिद्धिदात्री का नौंवा स्वरूप हमारे शुभ तत्वों की वृद्धि करते हुए हमें दिव्यता का आभास कराता है। मां की स्तुति हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करती है हमें सत्कर्म करने की प्रेरणा देती है। मां की शक्ति से हमारे भीतर ऐसी शक्ति का संचार होता है जिससे हम तृष्णा व वासनाओं को नियंत्रित करके में सफल रहते हैं तथा जीवन में संतुष्टिi की अनुभूति कराते हैं। मां का दैदीप्यमान स्वरूप हमारी सुषुप्त मानसिक शक्तियों को जागृत करते हुए हमें पर नियंत्रिण करने की शक्ति व सामथ्र्य प्रदान करता है।  आज के दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना हमारी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाए, असंतोष, आलस्य, ईष्र्या, परदोषदर्शन, प्रतिशोध आदि दुर्भावनाओं व दुर्बलताओं का समूल नाश करते हुए सदगुणों का विकास करती है। मां के आर्शीवाद से ही हमारे भीतर सतत क्रियाशीलता उत्पन्न होती है जिससे हम कठिन से कठिन मार्ग पर भी सहजता से आगे बढ़ते जाते हैं। मां दुर्र्गा की नावों शक्तियों का नाम सिद्धिदात्री है ये अष्टसिद्धियां प्रदान करने वाली देवी है देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं शक्ति स्वरूपा देवी की उपासना करके सभी शक्तियां प्राप्त की थीं जिसके प्रभाव से शिव का आधा शरीर स्त्री का हो गया था। शिवजी का यह स्वरूप अर्धनारीश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मां सिद्धिदात्री सिंहवाहिनी, चतुर्भुज तथा सर्वदा प्रसन्नवंदना है। देवी सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल अदि का अर्पण किया जाता है। इस तरह नवरात्र के नवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना करने वाले भक्तों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की होती है। सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का भी स्वरूप कहा जाता है जो श्वेत वस्त्र धारण किए भक्तों का ज्ञान देती है। माँ सिद्धिदात्री का मंत्र :- सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥ सिद्धिदात्री की ध्यान :- वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥ स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥ पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्। कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ :- कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता। नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥ परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥ धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते सिद्धिदात्री की कवच :- ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो। हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥ ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो। कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो

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