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Dharm (123)

पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। पितृ पक्ष का महत्त्व - ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 - वर्ष 2016 में पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं: तारीख दिन श्राद्ध तिथियाँ 16 सितंबर शुक्रवार पूर्णिमा श्राद्ध 17 सितंबर शनिवार प्रतिपदा 18 सितंबर रविवार द्वितीया तिथि 19 सितंबर सोमवार तृतीया - चतुर्थी (एक साथ) 20 सितंबर मंगलवार पंचमी तिथि 21 सितंबर बुधवार षष्ठी तिथि 22 सितंबर गुरुवार सप्तमी तिथि 23 सितंबर शुक्रवार अष्टमी तिथि 24 सितंबर शनिवार नवमी तिथि 25 सितंबर रविवार दशमी तिथि 26 सितंबर सोमवार एकादशी तिथि 27 सितंबर मंगलवार द्वादशी तिथि 28 सितंबर बुधवार त्रयोदशी तिथि 29 सितंबर गुरुवार अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध श्राद्ध क्या है? ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। क्यों जरूरी है श्राद्ध देना? मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। क्या दिया जाता है श्राद्ध में? श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है। श्राद्ध में कौओं का महत्त्व कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध? सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो निम्न हैं: * पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है। * जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई जो यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। * साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है। * जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।..

आपको अंनत चतुर्दशी की हादिर्क वधाई अनंत चतुदर्शी के बारे मे ज्ञानवधर्क जानकारी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन अनंत के रूप में श्री हरि विष्‍णु की पूजा होती है तथा रक्षाबंधन की राखी के समान ही एक अनंत राखी होती है, जो रूई या रेशम के कुंकुम से रंगे धागे होते हैं और उनमें चौदह गांठे होती हैं। ये 14 गांठें, 14 लोक को निरूपित करते हैं इसे अनंत का डोरा भी कहते है और इस धागे को वे लोग अपने हाथ में बांधते हैं, जो इस दिन यानी अनंत चतुदर्शी का व्रत करते हैं। पुरुष इस अनंत धागे को अपने दाएं हाथ में बांधते हैं तथा स्त्रियां इसे अपने बाएं हाथ में धारण करती हैं। अनंत चतुर्दशी का व्रत एक व्यक्तिगत पूजा है, जिसका कोई सामाजिक धार्मिक उत्सव नहीं होता, लेकिन अनन्‍त चतुर्दशी के दिन ही गणपति-विसर्जन का धार्मिक समारोह जरूर होता है जो कि लगातार 10 दिन के गणेश-उत्‍सव का समापन दिवस होता है और इस दिन भगवान गणपति की उस प्रतिमा को किसी बहते जल वाली नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित किया जाता है, जिसे गणेश चतुर्थी को स्‍थापित किया गया होता है और गणपति उत्‍सव के इस अन्तिम दिन को महाराष्‍ट्र में एक बहुत ही बडे उत्‍सव की तरह मनाया जाता है। अनंत चतुर्दशी को भगवान विष्णु का दिन माना जाता है और ऐसी मान्‍यता भी है कि इस दिन व्रत करने वाला व्रती यदि विष्णु सहस्त्र नाम स्त्रोत्र का पाठ भी करे, तो उसकी वांछित मनोकामना की पूर्ति जरूर होती है और भगवान श्री हरि विष्‍णु उस प्रार्थना करने वाले व्रती पर प्रसन्‍न हाेकर उसे सुख, संपदा, धन-धान्य, यश-वैभव, लक्ष्मी, पुत्र आदि सभी प्रकार के सुख प्रदान करते हैं। अनंत चतुर्दशी व्रत सामान्‍यत: नदी-तट पर किया जाना चाहिए और श्री हरि विष्‍णु की लोककथाएं सुननी चाहिए, लेकिन यदि ऐसा संभव न हो, तो उस स्थिति में घर पर स्थापित मंदिर के समक्ष भी श्री हरि विष्‍णु के सहस्‍त्रनामों का पाठ किया जा सकता है तथा श्री हरि विष्‍णु की लोक कथाऐं सुनी जा सकती हैं। अनंत चतुर्दशी पर सामान्‍यत: भगवान कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर से कही गई कौण्डिल्य एवं उसकी स्त्री शीला की कथा भी सुनाई जाती है, जिसके अन्‍तर्गत भगवान कृष्ण का कथन है कि ‘अनंत‘ उनके रूपों में से ही एक रूप है जो कि काल यानी समय का प्रतीक है। इस व्रत के संदर्भ में ये भी कहा जाता है कि यदि कोई व्‍यक्ति इस व्रत को लगातार 14 वर्षों तक नियम से करे, तो उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। भगवान सत्यनारायण के समान ही अनंत देव भी भगवान विष्णु का ही एक नाम है और इसी कारण अक्‍सर इस दिन सत्यनारायण का व्रत और कथा का आयोजन भी किया जाता है तथा सत्‍यनारायण की कथा के साथ ही अनंत देव की कथा भी सुनी-सुनाई जाती है। अनंत चतुर्दशी के व्रत का उल्‍लेख भगवान कृष्‍ण द्वारा महाभारत नाम के पवित्र धार्मिक ग्रंथ में किया गया है, जिसके सबसे पहले इस व्रत को पांडवों ने भगवान कृष्‍ण के कहे अनुसार विधि का पालन करते हुए किया था। घटना ये हुई थी कि एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय के वास्‍तुविज्ञ जो यज्ञ मंडप निर्माण करते थे, वह बहुत ही सुंदर होने के साथ-साथ अद्भुत भी था। महाराज युधिष्ठिर के लिए वास्‍तुविज्ञों ने जो यज्ञ मंडप बनाया था वह इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। यानी जल में स्थल तथा स्थल में जल की भ्रांति होती थी। सरल शब्‍दों में कहें तो जल में देखने पर ऐसा लगता था, मानों वह स्‍थल है और स्‍थल को देखने पर ऐसा लगता था, मानो वह जल है और पर्याप्‍त सावधानी रखने के बावजूद भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे। एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गए और एक जल से भरे तालाब को स्थल समझकर उसमें गिर गए। संयोग से द्रौपदी वहीं थीं और दुर्योधन को इस जल-थल के भ्रम का शिकार होकर तालाब में गिरते देख उन्‍हें हंसी आ गई तथा उन्‍होंने ‘अंधों की संतान अंधी‘ कह कर दुर्योधन का मजाक उडाया, क्‍योंकि दुर्योधन के पिता धृतराष्‍ट्र स्‍वयं जन्‍म के अन्‍धे थे। दुर्योधन, द्रोपदी के इस ताने भरे उपहास से बहुत नाराज हो गया। यह बात उसके हृदय में बाण के समान चुभने लगी अौर अपने इस उपहासच का बदला उसने पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर लिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा जहां पांडव अनेक प्रकार के कष्ट सहते हुए काफी कष्‍टपूर्ण जीवन जी रहे थे। एक दिन भगवान कृष्ण जब उनसे मिलने आए, तो युधिष्ठिर ने उनसे अपने कष्‍टपूर्ण जीवने के बारे में बताया और अपने दु:खों से छुटकारा पाने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने ऊपाय के रूप में उन्‍हें कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’ जब युधिष्ठिर ने इस अनंत चतुर्दश्‍ाी पर किए जाने वाले अनंत भगवान के व्रत का महात्‍मय पूछा, तो इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई जो कि अनंत चतुर्दशी का व्रत करने वाले सभी व्र‍ती को सुनना-सुनाना होता है। ये कथा निम्‍नानुसार है-

=========================== एक बार देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा, भगवान आप का सबसे बड़ा भक्त कौन है। भगवान विष्णु नारद के मन की बात समझ गए। उन्होंने कहां, अमुक गांव का अमुक किसान हमारा सबसे प्रिय भक्त है। भगवान विष्णु का उत्तर सुन कर नारद जी को निराशा हुई। वह बोले, भगवान आप का प्रिय भक्त तो मैं भी हूं फिर सबसे प्रिय क्यों नहीं। भगवान विष्णु ने कहा, तुम उस किसान के यहां जाकर उसकी दिन भर की दिनचर्या देख कर मुझे आकर बताओ फिर मैं बताऊंगा। नारद उस विष्णु भक्त किसान के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि किसान सुबह उठ कर कुछ देर भगवान विष्णु का स्मरण किया फिर रूखी सूखी रोटी खा कर हल बैल लेकर खेत जोतने चला गया। शाम को लौटा तो बैलों को चारा पानी दिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए भगवान का नाम लिया और रात को खाना खाकर सो गया। एक दिन उस किसान के घर रह कर नारद जी भगवान विष्णु के पास आए और उसकी आंखों देखी दिनचर्या के बारे में बताया। अंत में नारद ने कहा, प्रभु उसके पास तो आप का नाम लेने का समय भी नहीं है फिर वह आप का सबसे प्रिय भक्त कैसे बन गया। मैं तो दिन रात आप का नाम जपने के सिवाय कोई काम करता ही नहीं फिर भला वह किसान कैसे आप का सबसे प्रिय भक्त बन गया। भगवान विष्णु उस बात को टालते हुए नारद को एक लबालब भरा अमृत कलश देते हुए कहा, देवर्षि तुम इस कलश को लेकर त्रैलोक्य की परिक्रमा करो। लेकिन यह ध्यान रखना कि इसकी एक बूंद भी छलकने न पाए। यदि एक बूंद भी नीचे गिरी तो तुम्हारा अब तक का किया गया सारा पुण्य खत्म हो जाएगा। नारद अमृत कलश लेकर तीनों लोको की यात्रा पर निकल गए और यात्रा पूरी करके वह भगवान विष्णु को कलश देते हुए कहा, प्रभु कलश से एक बूंद भी अमृत नहीं छलकने पाई। भगवान विष्णु ने कहा- नारद, परिक्रमा के दौरान तुमने कितनी बार मेरा नाम स्मरण किया था। नारद ने कहा, प्रभु परिक्रमा के दौरान तो मेरा ध्यान इस कलश पर केंद्रित था इसलिए एक बार भी आप का स्मरण नहीं कर पाया। भगवान विष्णु ने हंस कर कहा, जब तुम परिक्रमा के दौरान एक बार भी अपना ध्यान कलश से हटा कर मेरा स्मरण नहीं कर सके जब कि वह किसान अपने सभी काम करते हुए भी कम से कम दो बार नियमित रूप से मेरा स्मरण करना नहीं भूलता तो वह सबसे बड़ा भक्त हुआ या आप। सबसे प्रिय भक्त वो होता है जो अपना कर्म करते हुए प्रेम से मेरा श्रद्धापूर्वक स्मरण भी करता है। नारद जी को सबसे प्रिय भक्त होने का अहंकार खत्म हो गया ...!!! =========================== जय श्री हरी सुनील झा " मैथिल "

रामायण और महाभारत की कथाओँ को मिथ कहने वाले लोगों को अब अपने शब्द वापस लेने होंगे। क्यों कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने उस स्थान को खोज निकाला का है जिसका उल्लेख रामायण में पाताल लोक के रूप में है। कहा जाता है कि हनुमानजी ने यहीं से भगवान राम व लक्ष्मण को पातालपुरी के राजा अहिरावण के चंगुल से मुक्त कराया था।

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अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा – “मिथ नहीं सत्य हैं राम-रावण और हनुमान”

ये स्थान मध्य अमेरिकी महाद्वीप में पूर्वोत्तर होंडुरास के जंगलों के नीचे दफन है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लाइडर तकनीकी से इस स्थान का 3-डी नक्शा तैयार किया है, जिसमें जमीन की गहराइयों में गदा जैसा हथियार लिये वानर देवता की मूर्ति होने की पुष्टि हुई है।

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अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा – “मिथ नहीं सत्य हैं राम-रावण और हनुमान”
 

स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के निदेशक और वैदिक विज्ञान केन्द्र के प्रभारी प्रो. भरत राज सिंह ने बताया है कि पहले विश्व युद्ध के बाद एक अमेरिकी पायलट ने होंडुरास के जंगलों में कुछ अवशेष देखे थे। अमेरिकी पत्रिका ‘डेली टाइम्स गज़ट’ के मुताबिक इस शहर की पहली जानकारी अमेरिकी खोजकर्ता थिंयोडोर मोर्ड ने 1940 में दी थी। एक अमेरिकी पत्रिका में उसने उस प्राचीन शहर में वानर देवता की पूजा होने की बात भी लिखी थी, लेकिन उसने जगह का खुलासा नहीं किया था। बाद में रहस्यमय तरीके से थियोडोर की मौत हो गई और जगह का रहस्य बरकरार रहा।

गणेश चतुर्थी ५सितम्बर २०१६(सोमवार) गणेश चतुर्थी पूजा मुहूर्त मध्याह्न गणेश पूजा का समय = ११:०४ से १३:३४ अवधि = २ घण्टे २९ मिनट्स ४th को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = १८:५४ से २०:३० अवधि = १ घण्टा ३५ मिनट्स ५th को, चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = ०९:१६ से २१:०५ अवधि = ११ घण्टे ४८ मिनट्स चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = ४/सितम्बर/२०१६ को १८:५४ बजे चतुर्थी तिथि समाप्त = ५/सितम्बर/२०१६ को २१:०९ बजे गणेश चतुर्थी के दिन का पञ्चाङ्ग गणेश चतुर्थी के दिन का चौघड़िया मुहूर्त टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी नई दिल्ली के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)। २०१६ गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है। गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, १० दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं। गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है। हिन्दु समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है। नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये। मिथ्या दोष निवारण मन्त्र चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं। अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये - सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥ गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है I डा़ मीनाक्षी शर्मा

1 सितंबर 2016 गुरुवार को सूर्य ग्रहण लग रहा है। इसी दिन भाद्रपद माह की अमावस्या भी है। हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए इसका सूतक भी मान्य नहीं होगा। दरअसल, ऐसी मान्यता है कि ग्रहण का सूतक वहीं माना जाता है जहां ग्रहण दिखाई देता है भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजकर 48 मिनट पर ग्रहण शुरू होगा और शाम 4 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण अफ्रीका, हिन्द महासागर, ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तटवर्ती इलाके और अन्टार्कटिका में दिखाई देगा। इस सूर्य ग्रहण का 12 राशियों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है- 1. मेष- कुछ लोगों को सामाजिक अपयश का सामना करना पड़ सकता है। वाणी पर नियंत्रण रखें। काम-धंधे में अड़चन आ सकती है। 2. वृष- कार्यो में सफलता प्राप्त होगी। परिवार में सुखद वातावरण बना रहेगा। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत हो सकती है। राय-मशविरा लेकर ही कार्य करें। 3. मिथुन- कुछ लोगों को आर्थिक लाभ हो सकता है। रोजमर्रा की वस्तुओं की खरीददारी कर सकते हैं। सोच-विचार के बाद ही कोई निर्णय लें। 4. कर्क- नये कार्यो में निवेश से बचें अन्यथा हानि हो सकती है। जीवन के प्रति आशावादी विचार रखने की जरूरत है। घर-गृहस्थी में खर्च बढ़ेगा। 5. सिंह- कुछ लोगों को शारीरिक व मानसिक पीड़ा हो सकती है। भाईयों से मनमुटाव हो सकता है। वाणी पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। 6. कन्या- खर्च अधिक हो सकता है जिससे मानसिक परेशानी बढ़ सकती है। दोस्तों पर अधिक खर्च से बचें। घरेलू मामलों में स्थिति सामान्य रहेगी। 7. तुला- अवसरों को पहचानकर आप लाभ प्राप्त कर सकते हैं। नए कार्यो को शुरू करने के लिए समय अनुकूल है। बेवजह के झगड़ों से दूर रहें। 8. वृश्चिक- अच्छी तरह से विचार करने के बाद ही कहीं पैसा लगाएं अन्यथा नुकसान हो सकता है। कुछ लोग अपनी आजीविका को लेकर चिंतित हो सकते हैं। 9. धनु- घर-परिवार को लेकर चिंता बनी रह सकती है। जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी परेशानी दे सकता है। बेवजह किसी पर शक करने से अपना ही मन परेशान होगा। 10. मकर- कुछ लोगों को भौतिक सुख की प्राप्ति होगी। परिवार में आपसी सहयोग से ही विकास होगा। आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। 11. कुंभ- दाम्प्त्य जीवन में तालेमल बनाने से बड़ी से बड़ी मुसीबत भी टल सकती है। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतना ठीक नहीं है। 12. मीन- खान-पान में सावधानी बरतें। कमाई और खर्च में समानता की स्थिति बनी रहेगी। क्रोध पर नियंत्रण रखें अन्यथा टकराव हो सकता है।

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