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गोरखपुर में धूमधाम के साथ मनाई जा रही है लोहड़ी, पंजाबी भाई खूब कर रहे हैं भांगड़ा

Lohiri manai ja rha hai Gorakhpur me

भारत देश विविधताओं में एकता का समन्वय करते हुए पूरे विश्व में अपनी अलग संस्कृति के लिए जाना जाता है यहां हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सब मिलकर त्यौहारों में सम्मिलित होते हैं और एक दूसरे के साथ अपने अपने विचारों को बांटते हुए राष्ट्र के विकास पर जोर देते हैं।। गोरखपुर के लिहाज से भी सभी त्योहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है और आज लोहड़ी के अवसर पर पंजाबी भाइयों द्वारा विभिन्न स्थानों पर लोहिड़ी जलाई गई और भांगड़ा करते हुए जश्न मनाया गया।। इस संबंध में सरदार जसप्रीत सिंह से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया यह पर्व आपके खिचड़ी से पूर्व मनाया जाता है और हमारे पंजाब में इसकी विशेष महत्ता है इस दिन हम हर्षोल्लास के साथ मूंगफली और रेवड़ी का सेवन करते हैं।।। इसी के साथ वहां उपस्थित लोगों ने एक सुंदर सा गीत प्रस्तुत किया जो कुछ इस प्रकार है:-   सुंदर मुंदरिए – हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया – हो!  आखिर क्यों मनाई जाती है लोहड़ी, क्या है दुल्ला भट्टी वाला की सच्चाई
लोहड़ी पर्व पंजाब में बीते कई सौ सालों से मनाया जा रहा है। तभी से ही दुल्ला भट्टी की कहानी काफी फेमस है। हम में से काफी कम लोगों को ही पता है कि आखिर हम लोहड़ी मनाते क्यों हैं।
उत्तर भारत और खासकर पंजाब का सबसे प्रसिद्ध त्योहार है लोहड़ी। इस दिन सभी अपने घरों और चौराहों के बाहर आग जला कर इस पर्व को मनाते हैं। आग का घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए रेवड़ी, मूंगफली खाते हैं लेकिन ये लोहड़ी क्यों जलाई जाती है और इस दिन दुल्ला भट्टी की कहानी का क्या महत्व है जानते हैं-
कैसे मनाते हैं लोहड़ी?
पारंपरिक तौर पर लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुड़ा एक विशेष त्यौहार है। इस दिन अलाव जलाकर उसके इर्दगिर्द भांगड़ा डाला जाता है। लड़कियां और महिलाएं गिद्धा डालती है।
कहां से आया लोहड़ी शब्द?
अनेक लोग मानते हैं कि लोहड़ी शब्द ‘लोई (संत कबीर की पत्नी) से उत्पन्न हुआ था, लेकिन कई लोग इसे तिलोड़ी से उत्पन्न हुआ मानते हैं, जो बाद में लोहड़ी हो गया। वहीं, कुछ लोग यह मानते है कि यह शब्द लोह’ से उत्पन्न हुआ था, जो चपाती बनाने के लिए प्रयुक्त एक उपकरण है।
कौन था दुल्ला भट्टी?
किसान सुंदरदास की दो बेटियां थी सुंदरी और मुंदरी। नंबरदार की नीयत खराब हो गई और सुंदरदास को धमकाया कि बेटियों की शादी उससे कर दे।
सुंदरदास ने दुल्ला भट्‌टी से फरियाद की कि नंबरदास से उनकी बेटियों को बचाए। भट्‌टी ने सुंदरदास को कहा तेरीयां धीआं तेरी मर्जी नाल ही व्याहियां जाणगीयां…ऐह मेरी जुबान ऐ… दुल्ला अपने साथियों को साथ लेकर नंबरदार के गांव गया और उसके सारे खेत जला दिए। जिससे नंबरदार डरकर भाग गया।  इसके बाद दोनों को बेटियां माना और शादी करा दी। शगुन में शक्कर भी दी। इसी रात आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है और बच्चे सुंदर मुंदरिए और दुल्ला भट्टी की बोलियां गाकर लोहड़ी मांगते हैं।।

मोहदीपुर,जटा शंकर,पैडलेगंज,राप्ती नगर,रेल विहार,मोहरीपुर,सूरजकुंड,सिंधी कॉलोनी इत्यादि कई जगहों पर धूम धाम से मनाई जा रही लोहड़ी..