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आज है बाल दिवस,क्या इन “बालो” का भी दिवस कभी आएगा?सिसकता और मरता बचपन आखिर क्यों?

आज एक तरफ पूरा भारतवर्ष जहाँ भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जयंती ‘बाल दिवस’ के रूप में मना रहा वही कुछ मजबूर बाल अपने और अपने परिजन के लिए आज के दिन भी भूख मिटाने को रोटी की व्यवस्था कर रहे।।घर की परिस्थितियां और पेट के भरण-पोषण करने के लिए काम करने एवं ऐसे घूम-घूम कर तमाशा करने पर मजबूर है।।

ये फोटो आज दोपहर विश्वविद्यालय चौराहे के पास की है जहां एक मजबूर बहन अपने बचपन को भुला कर एक जिम्मेदार माँ की तरह अपने भाई और अपने परिवार के लिए दर-दर भटक ढोल बजा तमाशा दिखा दो जून के रोटी की व्यवस्था कर रही है।।दयनीय स्थिति तो तब होती है जब ये छोटे-छोटे बच्चे बड़े-बड़े करतब अपने पेट को पालने के लिए दिखाते है और आमजन देखते है ताली बजाते पर कुछ देते नही।।परिस्थितियां इन बच्चो को अंधकारमय भविष्य की तरफ ले जा रही है।।ये तस्वीर समाज और सरकार की संवेदनहीनता को बयां करने के लिए पर्याप्त है।।ये तस्वीर आज बाल अधिकार एवम सर्व शिक्षा अभियान को अंगूठा दिखा रही है।।कही चंद पैसो की लालच में बच्चो को काम पर रख दिया जाता है तो कही कुछ बच्चे मजबूरी में खतरनाक खेल दिखाते है।।पर बच्चे को ऐसा करते देख भी समाज की संवेदनशीलता नही जगती है।।
आज भुने भुनाए मुद्दे पर हर राजनैतिक पार्टियां ध्यान दे रही पर इन मजबूर लाचार बच्चो पर सरकारे कब ध्यान देंगी?? क्या इनके भी कभी अच्छे दिन आएंगे??समाज इनके प्रति कब अपनी संवेदनशीलता को जगायेगा??

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