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Public Opinion

Public Opinion (355)

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राजनीति आज कल चरम पर है और देखा जाए तो आज भारत के सबसे बड़े कारोबार के रूप में उभर रहा है।। आज कल हर राजनेता राजनीति को अपने व्यवसाय का साधन मात्र समझ कर राजनीति का व्यवसायीकरण कर रहे है ।
हर राजनेता राजनीती करके अपने व्यवसाय को चमकाने में व्यवस्त है चाहे वो राजनीति देश या आमजन के हीत में हो या ना हो।।
केंद्र सरकार द्वारा 30 जून से जीएसटी लागू की जा रही।। अच्छा है सभी कारोबार जीएसटी के दायरे में होंगे पर आश्चर्य तब होता है जब भारत का सबसे बड़ा कारोबार राजनीति ही जीएसटी के दायरे से बाहर है।। जबकि राजनीति का व्यवसायीकरण कर पार्टियों ने हजारों करोड़ रूपए बना लिया और अभी भी बना रहे।।

जब कभी पार्टी फंड को टैक्स के दायरे में लाने की बात होती है तो सभी पार्टियों को साँप सूंघ जाता है और आज तक कभी कोई सरकार इस पर कानून लाने पर विचार भी नही करता है।।


आज इस बदहाल स्थिति पर एक नई सोच के साथ हर युवा को आगे आने की आवश्यकता है जिससे राजनीति का शुद्दीकरण हो सके ।।

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दलित नेता के रूप में भावी राष्ट्रपति का Projection क्यों?
कोई राष्ट्रीय या पार्टी का नेता क्यों नहीं रहा?
सभी किसी जाति के नेता क्यों रह गए हैं?
मैं किसी दलित को राष्ट्रपति बनाने या इस आधार पर उसे रोकने का पक्षधर नहीं हूं। मेरा कहना मात्र इतना है कि कभी भी गांधी बनिया नेता या सरदार पटेल कुर्मी नेता के रूप में नहीं Project किए गए। आज क्या हो रहा है देश को? कायस्थों के स्कूल का नामकरण *सुभाष चंद्र बोस* के नाम पर हो रहा है जिन्हें पूरा देश "नेताजी" कह कर संबोधित करता है। *राणा प्रताप* जिन्हें देश का बच्चा-बच्चा सच्चे देशभक्त के रूप में पूजता है, मात्र एक क्षत्रिय के रूप में अवशिष्ट है, जिनकी मूर्ति स्थापना को लेकर सहारनपुर के दलित बवाल कर रहे हैं। और तो और कभी भी साक्षी जी महाराज, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार आदि की गणना पिछड़े नेता के रुप में नहीं हुई, बल्कि ये सदा धर्म योद्धाओं में अग्रणी माने गए मगर *आज कोविद जी का नाम राष्ट्रपति के रूप में सामने आया तो उनका अभिनंदन तथा विरोध दोनों इस आधार पर हो रहा है कि वे दलित हैं। वे स्वयं संघ परिवार के एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। यह उनके व्यक्तित्व का अपमान है कि वे मात्र एक दलित बनकर रह गए-* विनय कटियार तथा उमा भारती जैसे धर्म योद्धा के रूप में भी उनका चित्र नहीं उभर पाया। केशव मौर्य अशोक सिंघल के अंतरंग शिष्य थे। सोचना होगा कि क्या कमी रह गई कि वे कल्याण सिंह की तरह भाजपा के नेता/हिंदुत्व के नेता तक नहीं बन पाए तथा पिछड़े नेता के रुप में उनकी शिनाख्त हो पाई। *मायावती ने तो सारी हदें पार कर दी। मनुवाद की वे असली स्टार प्रचारिका हैं। उन्होंने न केवल कोविद साहब के दलित होने के तथ्य को उजागर किया, बल्कि उनकी उपजाति "कोरी" तक की व्याख्या कर डाली तथा यह भी बता दिया कि उनकी आबादी बहुत कम है।* हमें खुशी होगी यदि कोविद जी जैसे लोगों को जातिगत नेता के रूप में प्रचारित करने की जगह भारत देश के नेता के रुप में वरना कम-से-कम पार्टी/संघ/हिंदुओं के नेता के रूप में प्रचारित किया जाए।

प्रेषक
सुव्रत त्रिपाठी
अधिवक्ता उच्चतम न्यायालय
राष्ट्रीय अध्यक्ष मनुवादी पार्टी एवं पूर्व महानिदेशक उत्तर प्रदेश पुलिस

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देश के अन्दर रीति-रिवाज बचाने की बात होती है, प्रथाओं-कुप्रथाओं को बचाने के लोग भिड जाते है कोई मजहब बचाने की बात करता है कोई जाति या उनसे उत्पन्न विसंगतियां, लेकिन इस और किसी का ध्यान नहीं है कि पहले राष्ट्र का भविष्य, हमारी भावी पीढ़ी यानि आज का बचपन इसे बचाओं! आज राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेजी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.

बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के जरिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.

नशे की गिरफ्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे खून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन सूंघकर नशे की प्यास बुझाते हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड और 2013 की एक सरकारी रिपोर्ट से पता चला कि भारत में नशे के आदी हर पांच में से एक व्यक्ति की उम्र 21 साल से कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि अपने साथ के लोगों की देखादेखी, साथियों के दबाव और पढ़ाई की चिंता के कारण कई बच्चे तो 11 साल की उम्र से ही नशे के लिए ड्रग्स लेना शुरु कर देते हैं. इनमें से करीब 5 फीसदी की उम्र 12 से 17 साल के बीच पाई गई. बेघर बच्चों के बीच तो यह समस्या और भी गंभीर है. रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के करीब दो करोड़ बेघर बच्चों में से 40-70 फीसदी किसी ना किसी तरह के ड्रग्स के संपर्क में आते हैं और इनमें से कई को तो पांच साल की उम्र से ही नशे की लत लग जाती है.

बात केवल एक शहर या स्थान की नहीं है राजधानी दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर नवी मुंबई के अनेकों कोनों में स्कूली यूनिफॉर्म पहने बच्चों को अक्सर घास रूपी नशीले पदार्थ खरीदते देखा जा सकता है. नशे वाले ये पौधे वहीं उगाए जाते हैं और चोरी-छिपे उन्हें बेचा जाता है. बच्चों को 50 से 100 रुपये अदा करने पर कई दिन के लिए नशे की यह सामग्री मिल जाती है और आजकल इतनी रकम पाना बच्चों के लिए आम बात है.
मांग बढऩे के साथ ही इन नशीली चीजों में भी मिलावट की जाती है और इसमें रसायन, कीटनाशक पदार्थ और यहां तक की जूतों की पालिश भी मिलाकर बच्चों को दे दी जाती है. यह बेहद खतरनाक है और इन चीजों से और भी ज्यादा नशा होता है. ज्यादा समझने के लिए आमतौर पर किसी भी परचून या पान दुकान की से भोला गोली 2 से 5 रुपये में मिल जाती है, जो असल में भांग से ही बनती है. लड़कियां धूम्रपान करने में हिचकती हैं ऐसे में उनके लिए गांजे का पेस्ट होता है ‘वे इसे मसूढ़ों पर रगड़ती हैं और यह खून में मिल जाता है. इसकी खुशबू भी माउथ फ्रेशनर की तरह होती है, इसलिए लड़कियां पकड़ में भी नहीं आतीं.’ जब बच्चों में इस तरह के नशीले पदार्थ की लत बढ़ती है तो उनकी जेबखर्च की मांग भी बढ़ जाती है. लेकिन सभी माता-पिता बच्चों की अधिक जेबखर्च की मांग पूरी नहीं करते. ऐसे में बच्चे चोरी करने लगते हैं. कई बार तो नशीले पदार्थ बेचने वाले लोग शुरुआत में बच्चों को मुफ्त पैकेट देते हैं और बाद में नशे के लिए अधिक रकम वसूलते हैं क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि लत लगने के कारण बच्चे कहीं से भी पैसे का इंतजाम कर ही लेंगे.
नशे के गुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए जरूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, गरीब, अशिक्षित और बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.

इस विषय पर यदि शोधकर्ताओं की माने तो इसका सबसे बड़ा कारण संयुक्त परिवार के खत्म होने और एकल परिवार में माता-पिता दोनों के नौकरीपेशा होने की वजह से कई घंटे तक बच्चे किसी की निगरानी में नहीं रहते हैं और बच्चों की जिंदगी से स्थायित्व हटने लगता है. ऐसे में बच्चे अकेले में वहीं सब कुछ करना चाहेंगे जो उन्हें पसंद आता हो. ऐसी स्थिति में बच्चे अपने दोस्तों और इंटरनेट पर ज्यादा निर्भर रहने लगते हैं, जहां उन्हें गलत सूचना भी मिलती है, मसलन पोर्न मूवी से लेकर भांग और गांजे के लाभ की सूचना.

अधिकांश बच्चे इन बातों पर भी गौर करते हैं कि उनके अभिभावक भी धूम्रपान कहते हैं तो इसका मतलब यह सब कुछ सामाजिक मान्यता प्राप्त कार्य है. इसमें कोई बुराई नहीं है. बीड़ी- सिगरेट, शराब आदि की लत बच्चों में कैसे पड़ती है, इस विषय पर मनोवैज्ञानिकों ने खूब अध्ययन किया है और वे बड़े विचित्र नतीजों पर पहुंचे हैं. उनका कहना है कि छोटा बच्चा जल्दी से जल्दी बड़ा होना चाहता है. आप बड़ों को सुहाने बचपन के गीत गाते सुनेंगे, मगर यथार्थ में ऐसा है नहीं. कोई बच्चा खुश नहीं है बच्चा होने से. उसको लगता है- मैं शक्तिहीन हूं, स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकता. छोटी सी छोटी चीजों के लिए दूसरों से पूछना पड़ता है, मेरी कोई स्वतंत्रता नहीं है. बड़े लोग स्वतंत्र हैं. इसलिए, बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. लेकिन वह यह भूल जाता है उम्र में बड़ा होने की यह चाहत उसकी उम्र की खत्म कर रही है..

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आज के दिन का इतिहास क्या रहा हैं क्या आप जानते हैं उत्तरी-पश्चिमी ईरान में जबरदस्त भूकंप से 261 लोगों की मौत, अनेक लोग घायल। आज ही के दिन सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसके अलावा भी आज के दिन भारतीय एवं विश्व इतिहास में बहुत कुछ हुआ, आइए एक नजर डालते हैं आज के इतिहास पर....
1870 - अमेरिकी कांग्रेस ने न्याय विभाग की स्थापना की।
1906 - स्वीडन ने राष्ट्रीय ध्वज अपनाया।
1932- हिन्दी सिनेमा के स्टार खलनायक अमरीश पुरी का जन्म हुआ।
1939 - सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस से अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
1941 - लिथुआनिया में जून विद्रोह शुरू हुआ।
1941 - हिटलर का तत्कालीन सोवियत रूस पर आक्रमण। 1944 - अमेरिका में सेवानिवृत सैनिकों की मदद का कानून बना।
1948 - ब्रिटिश सम्राट ने भारत के सम्राट की पदवी को त्यागा।
1957 - तत्कालीन सोवियत रूस ने पहली बार आर -12 मिसाइल का प्रक्षेपण किया।
2002- उत्तरी-पश्चिमी ईरान में जबरदस्त भूकंप से 261 लोगों की मौत,अनेक लोग घायल।
2012- पराग्वे के राष्ट्रपति फर्नान्डो लुगो पर महाभियोग चलाकर पद से हटाया गया और फ्रेडरिको फ्रेंको नए राष्ट्रपति बने।
2015- अफगानिस्तान की नेशनल असेंबली इमारत में आत्मघाती हमला, सभी हमलावर मारे गए, 18 लोग घायल।-

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गोरखपुर के इस युवक ने दिया संघ सम्बन्धी बयान पर दिग्विजय सिंह को जवाब...

दिग्विजय सिंह द्वारा दिये गए बयान "संघी आतंकवादी होता है" पर गोरखपुर के पुनीत पांडेय ने दिग्विजय सिंह को जवाब दिया।। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक आतंकवादी होता तो आज हिंदूओ की स्थिति दयनीय नही होती।।अगर संघी आतंकवादी होता तो आज कश्मीर मुद्दा नही होता और भारत के पास कश्मीर होता।। यदि स्वयंसेवक आतंकवादी होता तो केरल में इनकी निर्मम हत्या नही होती।।और तो और दिग्गी साहब अगर संघ आतंकवादी होता तो कांग्रेस 60 साल देश को नही लूट पाती और जो आपके मुँह से विषैले बोल निकल रहे वो भी नही निकलते।।अगर संघी आतंकवादी होता तो हमे शांति समझौते की आवश्यकता नही होती।।संघ अगर आतंकवादी होता तो चीन और पाकिस्तान की इतनी हिम्मत नही होती कि भारत कि तरफ आंख भी उठा कर देख ले।।

दिग्गी साहब खैरियत मनाओ आप की संघी आतंकवादी नही होता वरना आज आप की ये बोली नही होती शायद आप भी नही होते।। संघ का स्वयंसेवक अगर आतंकवादी हो जाए तो आप जैसे 10 -20 घर के कीड़े को तो आराम से निपटा सकता है क्योंकि स्वयंसेवक दृढ़ संकल्पी होता है जो ठानता है वो कर दिखाता है।।

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2004 और 2009 में पीएम इन वेटिंग आडवाणी जी ही थे लेकिन किस्मत में नहीं था तो कुर्सी नहीं मिली । आपको अगर सिर्फ स्वर्ण राष्ट्रपति दीखता है तो आप भूल कर रहे हैं क्योंकि हमें 2019 का लोकसभा चुनाव दिख रहा है । राजनीती अब जंग का रूप ले चुकी है और ये तो आप भी जानते हैं न कि प्यार और जंग में सब जायज होता है ?
आपने कभी सोचा है कि क्या होगा अगर 2019 में बीजेपी हार गयी तो ? पाकिस्तान के जीत पर पटाखे फोड़ने वाले आपको चैन से जीने देंगे ? आडवाणी जी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता न ही उनके कर्ज को राष्ट्रपति बनाकर चुकाया जा सकता है । लेकिन आप ये कैसे कह सकते हैं कि मोदी जातिवादी हो गया है ? किसके लिए जातिवाद करेगा मोदी ? चलिए मोदी पर नहीं लेकिन संघ पर तो यकीन होगा न आपको ? क्या संघ स्वर्ण विरोधी हो सकता है ? अपनी संकीर्ण जातिवादी मानसिकता की केंचुली को उखाड़ फेंकिए और गौर से देखिये ये 2019 के लोकसभा चुनाव की बिसात है । मीम - भीम की एकता की बात करने वाले और दलितों की सौदागर मायावती के मुंह के बोल खत्म हो गए हैं क्योंकि मोदी के इस मास्टरट्रोक ने हलक से जबान खिंच ली है । दोगलों की केंचुली इस महज एक फैसले से उतर रही है , जनता इन ढोंगियों को देख रही है ये सफलता की बानगी है इस मास्टरस्ट्रोक की ।
राष्ट्र निर्माण और बीजेपी की खातिर आडवाणी जी की कुरबानी याद रखी जायेगी । साथ में ये भी कि मोदी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने में सबसे बड़े रोड़े के रूप में आडवाणी जी ही थे और अगर मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं घोषित किया जाता तो आज बीजेपी की औकात राष्ट्रपति चुनने की नहीं होती । मुझे सिर्फ बीजेपी और हिंदुत्व के उत्थान से मतलब है माध्यम दलित हो, स्वर्ण हो या वैश्य या क्षत्रिय फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जंग और मोहब्बत में सब जायज होता है ।

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इस भीषण गर्मी में राजनीति की भी लू चल रही है। देश में राष्ट्रपति पद का चुनाव होने वाला है। एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार घोषित कर दिया है।
एनडीए के उम्मीदवार घोषित करने के बाद सोशल मीडिया पर बहस का दौर शुरू हो गया। लालकृष्ण आडवाणी को एक बार फिर बीजेपी ने दरकिनार कर दिया है। आडवाणी जी से हमदर्दी रखने वाले अपना पूरा विरोध सोशल मीडिया पर जता रहे हैं।
इस विरोध में बीजेपी कार्यकर्ता भी दो खेमें बटते नज़र आए हैं। बीजेपी सासंद शत्रुघन सिंहा ने आडवाणी को राष्ट्रपति के लिए बेहतर विकल्प बताया है। लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद के लिए रेस में माना जा रहा था।

आडवाणी का सपना पहले पीएम बनने का था, फिर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति बनने का। ये सिर्फ उनका ही नहीं बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ऐसा लग भी रहा था कि अगले राष्ट्रपति आडवानी ही हो सकते हैं।

लेकिन रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाकर एनडीए ने आडवाणी समर्थकों के मंसूबे पर पानी फेर दिया। ऐसा लगता है कि अब बीजेपी के एक युग का अंत हो गया है। वो युग है अटल और आडवाणी का। एक समय था जब बीजेपी के लिए ये दोनों वरिष्ठ नेता परचम लहराया करते थे। कहते हैं होइए वही जो राम रच राखा।

इसमें कोई शक नही की बीजेपी को शिखर तक पहुंचाने में अटल और आडवाणी का बहुत योगदान है। अटल और आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी के बहुत से नेता आगे बढ़े हैं। बीजेपी के अधिकांश नेताओं के भविष्य सवांरने की बात करें तो आडवाणी ने एक गुरू की भूमिका निभाई है. इनमें से एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी है।

गुजरात दंगों के बाद भी आडवाणी के कारण नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री पद बने रह सके थे। लेकिन ये राजनीति है इसमें हरपल कुछ न कुछ बदलता रहता है। वक्त भी क्या चीज है अपना कमाल दिखा ही देता है।

1951 में जब जनसंघ की स्थापना श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने की थी। उनके साथ बड़े नेताओं की भूमिका निभाने में प्रोफेसर बलराज मधोक भी थे। बलराज मधोक 1966 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी बने। साथ ही साथ बीजेपी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना भी उन्होने की थी।
लाल कृष्ण आडवाणी के राजनीति में सक्रिय होने से पहले प्रो मधोक दक्षिणपंथी पार्टी जनसंघ के सबसे बड़े नेता माने जाते थे। 1973 कानपुर में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बलराज मधोक ने एक नोट पेश किया था. जिसमें आर्थिक नीति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर जनसंघ की विचारधारा के खिलाफ बातें कही थीं. इसके अलावा संगठन मंत्रियों को हटाकर जनसंघ की कार्यप्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की मांग भी की थी।

उस समय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी थे। आडवाणी ने मधोक बातों से नाराज होकर उन्हें तीन साल के लिये पार्टी से बाहर कर दिया. इस घटना से बलराज मधोक इतने आहत हुए थे कि फिर कभी जनसंघ और बीजेपी में नहीं लौटे। मधोक जब जनसंघ के अध्यक्ष थे उस समय पार्टी कामयाबी के शीर्ष पर थी।

उस समय लोकसभा में जनसंघ गठबन्धन के पास 50 से ज्यादा सीटें थी कहने का तात्पर्य इतना है कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। आज जब बीजेपी आडवाणी को दरकिनार कर रही है। आडवाणी जी को भी संन्यास ले लेना चाहिए। आखिर कब तक अपनी राजनीति की पारी खेलेगें। कभी प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीद, तो कभी राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीद का। अब कोई मतलब नही रह गया है।

हालांकि ये कहना गलत नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भाजपा का चेहरा माना जाता था पर पर्दे के पीछे आडवाणी ने भाजपा जैसी पार्टी को खड़ा करने का काम किया है। पर वो दौर कुछ और था। आज के इस दौर में बीजेपी के लिए जो चेहरा उभरा है वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है।

लेकिन इसमें भी दो राव नहीं है कि आडवाणी को जैसे पूरा देश जानता है, वैसे रामनाथ कोविंद को नहीं जानता। रामनाथ कोविंद बीजेपी के राज्यसभा सांसद और बिहार के राज्यपाल जरूर रह चुके हैं लेकिन आडवानी ने जिस तरह लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई है उससे कोविंद कोसों दूर हैं। कोविंद एक कुशल नेतृत्व वाले अच्छे नेता हो सकते हैं।

पर आडवानी की कुशल नेतृत्व क्षमता पर किसी को कोई शक नही है। देश की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने वाली बात कोई आज की नई नहीं है। भारतीय राजनीति में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां अगली पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी या सरकार पर अधिकार पाने के लिए वरिष्ठ नेता को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के कपड़े तक फाड़ दिए गए थे। नीतीश कुमार को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने वाले जॉर्ज फर्नांडिस की आज स्थिति क्या हुई, ये सभी जानते हैं। कांशीराम के साथ अंत में जो हुआ उससे भी देश वाकिफ है। ये तो पुरानी बातें है अभी हाल में कुछ महीनों पहले मुलायम सिंह का क्या हाल हुआ, इसे बताने की जरूरत नहीं होगी। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को अपमान सहने से अच्छा है कि राजनीति से संन्यास ले लें।

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21 जून भारतीयता के गुण गौरव के गुणगान का दिवस बन गया है। इस दिन सारा देश ही नहीं, अपितु सारा विश्व ही भारतीय संस्कृति की महानता और उसकी सर्वग्राहयता के समक्ष शीश झुकाता है। मां भारती की आरती में सारा संसार नतमस्तक हो जाता है और कह उठता है :- ”हे भारत की पवित्र भूमि! तुझको मेरा नमन है, देवों की वेदवाणी से महकता तेरा चमन है।

हर्षित यह गगन है सारा, नाच रही ये धरा है, बस निनाद एक स्वर का-’मां तेरा वंदन है’।।” पूरा देश आज अपने अतीत पर गर्व कर रहा है और अतीत वर्तमान के साथ गले मिलकर अपना उत्सव मना रहा है। यह कितना सुंदर दृश्य है कि ‘पतंजलि ऋषि प्रणीत’ योग का गौरवमयी अतीत आज हमारे ‘राजपथ’ पर जब अपना उत्सव मनाता है तो वर्तमान उसके सम्मान में पुष्प वर्षा करता है। भारत के प्रधानमंत्री इस दिन ‘लालकिले’ पर झण्डा नहीं फहराते, अपितु जनसाधारण के बीच देश में कहीं भी जा बैठते हैं और अपने अतीत की गौरवपूर्ण स्मृतियों को नमन करते हुए राष्ट्र का नेतृत्व करते हैं। जब वह ऐसा करते हैं तो योगबल से लोगों को अपने उज्ज्वल भविष्य का लंबा रास्ता भी दिखायी दे जाता है।

सचमुच हम सबके लिए 21 जून नमन, अभिनंदन और वंदन का दिन है। इस दिन को दिखाने में पूज्य रामदेव जी महाराज के योगदान को विस्मृत, नहीं किया जा सकेगा, साथ ही देश के प्रधानमंत्री मोदी जी के सहयोग की भी उपेक्षा नही की जाएगी। भारत के महान ऋषियों का चिंतन रहा है कि राष्ट्र तभी उन्नति कर सकता है जब ब्रह्मबल और क्षत्रबल में समन्वय बन जाता है। बाबा रामदेव इस समय भारत के ‘ब्रह्मबल’ के तथा प्रधानमंत्री मोदी जी भारत के ‘क्षत्रबल’ के प्रतीक हैं। दोनों का समन्वय हुआ है तो भारत के लिए सारा विश्व कर रहा है।

पिछले पांच हजार वर्षों के काल में अर्थात महाभारत के पश्चात विश्व में भटकाव बढ़ा। इसका कारण यही रहा है कि भारत की वैदिक संस्कृति के मार्गदर्शन से विश्व वंचित हो गया। फलस्वरूप संसार में मजहबों का प्रादुर्भाव हुआ। इन मजहबों ने मानव को शांति का विश्वास दिलाया कि जिस आत्मिक और मानसिक शांति को भारत का धर्म तुझे देता था-हम उसी शांति को तुझे देंगे। पर बात बनी नहीं। मजहबों ने मानवता को जो वचन दिया था-उसे उन्होंने निभाया नहीं। मजहब ने लोगों को परस्पर लडऩा-झगडऩा सिखाया और भारत के धर्म की सारी श्रेष्ठ परंपराओं को कुचलने में लग गये। इन मजहबों के कारण कलह -कटुता और परस्पर वैमनस्य का भाव संसार में इतना बढ़ा कि करोड़ों लोग इन मजहबों की लड़ाई में ‘स्वाहा’ हो गये। इस मजहब ने मानव को दानव बना दिया।
यह दानव ही आज की भाषा में आतंकवादी है। मजहब संसार के लिए ‘भस्मासुर’ बन गया है। इसने विश्व के गुटों में विभक्त कर दिया है और महाभयंकर विनाशलीला के लिए (अर्थात तीसरे विश्वयुद्घ के लिए) भूमिका व सामान तैयार करने में लगा है। ऐसे में स्वामी रामदेव जी महाराज और श्री मोदी ने विश्व को भारत की जीवन-व्यवस्था से परिचित कराकर सचमुच मानवता पर भारी उपकार किया है। इस उपकार के फलस्वरूप संसार में शाकाहारियों की संख्या बढ़ी है। बड़ी तेजी से पश्चिमी देश मांसाहार छोडक़र शाकाहार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। शाकाहारी होने से लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था और सात्विकता बढ़ेगी। सात्विकता की वृद्घि से संसार में अहिंसा भाव-वर्धन होगा। लोग एक दूसरे के साथ प्रेम और बंधुत्व का प्रदर्शन करेंगे और स्वयं को एक ही भगवान की संतान मानने पर बल देंगे। इस भाव वर्धन से धीरे-धीरे मानवतावादी शक्तियां बलवती होंगी और संसार से आतंकवाद को मिटाने में सफलता मिलेगी।

जब संसार एक मौन क्रांति से बाहर निकलकर अर्थात अपने ‘द्विज’ बनने की साधना को पूर्ण करके अपनी साधना (संसार में सात्विक लोगों के संगठनीकरण की प्रक्रिया) से बाहर आएगा तो उस सफलता में भारत की बड़ी भूमिका होगी। निश्चय ही उस समय भारत का अतीत वर्तमान विश्व के मंचों पर विराजमान होगा और सारा संसार उसकी आरती कर रहा होगा। उस भव्य और दिव्य दिवस की आहट 21 जून ने दे दी है। अभी तो शुरूआत है। आने वाला समय निश्चय ही अच्छा होगा। सारा विश्व इस समय जिस वैश्विक आतंकवाद से जूझ रहा है, वह योग से ही समाप्त किया जा सकता है। योग से समाप्त करने का अभिप्राय है कि मानव के भीतर की आतंकी प्रवृत्ति को और वृत्तियों को उसके हृदय मंदिर के यज्ञकुण्ड में डालकर ही भस्म किया जा सकता है।

जब व्यक्ति निरंतर ‘ब्रह्मयज्ञ’ में अपनी आसुरी शक्तियों के दमन और शमन की तथा उसकी दैवीय वृत्तियों के अथवा दिव्य भावों के वर्धन की प्रार्थना नित्य अपने इष्ट से करने लगता है तो उस समय उसके भीतर भारी परिवर्तन होने लगते हैं। ये परिवर्तन सकारात्मक होते हैं और मानव को मानव से देव बनाने में सहायक होते हैं। सारे संसार को 7.50 अरब देवों (विश्व की कुल जनसंख्या) का कुटुम्ब (वसुधैव कुटुम्बकम्) बना देने की अदभुत क्षमता योग में है। जिसका संदेश स्वामी रामदेव जी अपने प्रवचनों में अक्सर देते हैं। माना जा सकता है कि इतनी बड़ी सफलता में आने से पहले कुछ राक्षस (दानवी शक्तियां अर्थात आतंकवादी) विघ्न डालेंगे तो उसके विनाश के लिए अपेक्षित मन्युभाव अर्थात मानवता के उत्थान के लिए आने वाला सात्विक क्रोध भी हमें योग से ही मिलेगा। दानवी शक्तियों के विरोध और समापन के लिए हमारे पास क्षत्रबल है। जिसकी हमें कभी भी उपेक्षा नही करनी है। बाबा रामदेव ब्रह्मबल और क्षत्रबल के समन्वय के समर्थक हैं वह गांधीजी की भांति केवल ‘ब्रह्मबल’ के ही उपासक नहीं हैं। विश्व के लोग आजकल ‘प्रैक्टिकल’ हो गये हैं। उन्हें गांधीजी की अहिंसा तब तक अधूरी लगती है जब तक हाथ में दण्ड (डंडा) ना हो, और बाबा रामदेव हाथ में डन्डा लेकर चलने के ही समर्थक हैं। उनकी ‘प्रैक्टिकल’ बात को लोग मान रहे हैं और….’भारत बदल रहा है।’

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- Jun 25, 2017
हममें से ज्यादातर लोग अपने दिन की शुरुआत चाय से ही करते हैं. कोई अदरक वाली चाय पीकर दिन की शुरू ...
Post by साकेत सिंह धोनी
- Jun 26, 2017
पिछले कई दिनों से कोच-कप्तान विवाद के चलते आलोचना झेल रहे कप्तान विराट कोहली की लोकप्रियता पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा ...
Post by साकेत सिंह धोनी
- Jun 24, 2017
लड़कों को आकर्षित करने के लिए लड़कियां क्या़-क्या नहीं करती। लड़कियों को हमेशा यही लगता है कि लड़कों को सुंदर लड़कियां ...
Post by साकेत सिंह धोनी
- Jun 27, 2017
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने वेस्टइंडीज के खिलाफ चल रही वनडे सीरीज के तीसरे मैच में विकेटकीपर बल्लेबाज ...
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