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यूपी के लोकप्रिय युवा नेता अखिलेश को गिरफ्तार कर सरकार कर रही लोकतंत्र की हत्या:राजेंद्र चौधरी
17.08.2017   

       जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पुलिस की पक्षपातपूर्ण और उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के विरोध में औरैया जाते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव को उन्नाव में रोक कर हिरासत में लेने की खबर से पूरे प्रदेश में ही नहीं अन्य प्रदेशों में भी जनता का आक्रोश फूट पड़ा। किसान, नौजवान, वकील और महिलाएं सड़क पर निकल पड़ी। जगह-जगह धरना-प्रदर्शन होने लगे। कैसी विड़म्बना है कि आज भाजपा सरकार ने किसानों और जनता के लोकप्रिय नेता अखिलेश जी की गिरफ्तारी उसी समय की जब वह किसान ऋण वितरण समारोह का ठोंग रचती दिखाई दी। जनता आज भी श्री अखिलेश यादव को अपना नेता मानती है भले ही  वह सŸाा में नहीं है। यही लोकतंत्र में लोकसŸाा की ताकत है।
       कल औरैया में जिला पंचायत अध्यक्ष के नामांकन के समय पुलिस ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी और उनके समर्थकों के साथ अभद्र व्यवहार किया और पूर्व सांसद श्री प्रदीप यादव को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उनसे मिलने के लिए जाते समय एक्सप्रेस-वे पर उन्नाव की सीमा में श्री अखिलेश यादव को औरैया जाने से रोक लिया गया। उनके साथ पूर्वमंत्री राजेंद्र चौधरी भी थे। वे जब धरने पर बैठ गये तो उन्हें जबरन पुलिस ने उठाया तथा धौरा स्थिति कृषि विज्ञान केन्द्र में हिरासत में रखा गया। जैसे ही यह खबर फैली उन्नाव के श्री अवस्थी एडवोकेट के साथ बड़ी संख्या में वकील पहुंच गए।  
       लखनऊ आगरा एक्सप्रेस-वे पर पहले टोल प्लाजा पर भारी पुलिस बल ने पूर्वमुख्यमंत्री जी को रोका तो उनके साथ मौजूद सैकड़ों नौजवानों ने धरना देना शुरू कर दिया। विधायक अनिल दोहरे, पूर्व सांसद यशवीर सिंह, पूर्व विधायक बदलू खां, डा0 राजपाल कश्यप, आनंद भदौरिया, संतोष यादव सनी, राजेश यादव, अतुल प्रधान, विजय यादव, राम सागर यादव, राहुल सिंह, दिग्विजय सिंह देव, मो0 एबाद, बृजेश यादव, गौरव दुबे, संजय सविता, प्रदीप शर्मा सहित दर्जनों एमएलसी श्री यादव के साथ धरने पर बैठे। 
       श्री अखिलेश यादव आज पूरी तरह जननेता की भूमिका में थे। उन्नाव के मोहान में उनके लौटते समय भारी भीड़ थी। उनके स्वागत में खूब नारे लगे। संघर्ष में साथ होने का लोगों ने भरोसा दिया। तब तक दूसरे जनपदों के लोग भी श्री अखिलेश जी की गिरफ्तारी की खबर सुनकर आने लगे। हजारों की संख्या में 10-15 किलोमीटर तक हर तरफ लोग ही लोग दिखाई पड़ रहे थे। लोग कह रहे थे कि श्री यादव ने तो कानून का राज स्थापित किया था जबकि भाजपा स्वयं कानून का दुरूपयोग करने पर उतारू है। पूर्व मुख्यमंत्री जी से कैसा खतरा हो गया? 

       श्री अखिलेश यादव ने रास्ते में अपने स्वागत में आए किसानों, बच्चों और गरीबों से उनका हाल चाल लिया। उन्होंने मटरिया गांव के किसानों से पूछा कि उनका कितना कर्ज माफ हुआ है? जवाब था एक पैसा भी माफ नहीं हुआ। प्राथमिक विद्यालय मटरिया के बच्चे जो स्कूली बस्ते लिए थे उन पर अखिलेश जी का ही चित्र थे। गांव में कच्चे घर थे और लोग नंगे बदन थे। मटरिया गांव के लोग कच्छा पहने थे। अखिलेश जी ने कहा यही डिजिटल इंडिया है। 
       रास्ते में अखिलेश जी ने राजेंद्र चौधरी से कहा कि आर्थिक विषमता के कारण ही अमीर-गरीब में भारी अंतर है। गांवों में आर्थिक तंगी है। थोड़े लोगों के पास अकूत संपŸिा है। हमारी लड़ाई इस अंतर को समाप्त करने की हैं। भाजपा का ऋण माफी का टोटका किसानों के साथ धोखा है। भाजपा सरकार में बच्चे बीमारी से मर रहे हैं बाढ़ में किसानों का जीवन तबाह हो गया है। ऐसे ही क्या न्यू इंडिया बनेगा? भाजपा सरकार उत्पीड़न कर रही है। सार्वजनिक गतिविधि और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करना यह प्रभाषित करता है कि राज्य में कानून का राज नहीं है। समाजवादी पार्टी अन्याय के विरूद्ध संघर्ष जारी रखेगी। भाजपा के दमन का जनता उचित उत्तर देगी। इस तरह भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र को पुलिस के हवाले कर दिया। यहां पूरी तरह अराजकता की स्थिति है। 
       श्री अखिलेश यादव की गिरफ्तारी के विरोध में आज बिहार प्रांत की राजधानी पटना में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री किरनमय नंदा धरना दिया और गिरफ्तारी दी। अन्य प्रदेशों से भी विरोध प्रदर्शन की सूचनाएं है।
       समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव के हिरासत में लिये जाने की खबर लगते ही कानपुर में प्रदेश अध्यक्ष श्री नरेश उत्तम पटेल, आगरा में पूर्व सांसद श्रीराम जी लाल सुमन ने धरना प्रदर्शन किया। विधायक अमिताभ बाजपेयी, संजय लाठर (एमएलसी) की गिरफ्तारी हुई। 
       लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, शाहजहांपुर, आजमगढ़, कन्नौज, गोरखपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, प्रतापगढ़, नोएडा, रायबरेली, चन्दौली, गाजीपुर, संतकबीरनगर, में हजारों पार्टी कार्यकर्Ÿााओं ने धरना प्रदर्शन किया। 
                                                   (राजेंद्र चौधरी)
    मुख्य प्रवक्ता

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आखिर कब तक हम पिछली सरकार को दोष और नई सरकार को मौका देते रहेंगें???
आज फिर से नई सरकार पर भरोसा करके वोट देना पीड़ा दे रहा है।। दिल यह मानने को तैयार नही होता कि जिसे हमने चुना वो गलती कर सकता है।। लेकिन बहुत अफसोस होता है कि इस देश मे जब नई सरकार आती है तो पिछली सरकार के दोष गिनाती है और कहती है कि हम को वोट दे हम आपके साथ न्याय करेंगे। हम जनता इस विश्वास पर या कहे कि हमारे पास और कोई विकल्प नही रहता दूसरे सरकार को मौका देने के सिवा वोट देते हैं तो फिर स्थिति जस की तस रहती हैं कुछ आमूल चूल परिवर्तन के सिवा ।। नई सरकार भी सत्ता प्राप्ति के बाद कहती हैं कि हमें वक़्क्त दे हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है ।। लेकिन वक़्क्त देते देते लोगो के जीवन बीत जाते हैं और जनता की स्थिति वही की वही रहती हैं ।। विकास केवल कागजातों में होता हैं,धरती पर नहीं ।।हमारे देश में जब तक जिसकी सरकार होती है उसके कार्य का बखान हर जगह होता है जैसे काम बोलता है।लेकिन जब सरकार का कार्याकाल समाप्त होता है और नई सरकार आती है तो पता लगता हैं और विकास का मुआवना करते है तो पता लगता है कि यहाँ घोटाले हुए यहां कार्य नही हुआ ।।। तब जाकर पिछली सरकार के पोल खुलते हैं। जिसकी वजह से तुरंत हमारे अधिकारियों को जो बहुत पढ़े लिखे होते हैं और कठिनाइयों से परीक्षा पास कर उस पद पर आए होते हैं निलम्बित कर दिया है या ट्रांसफर कर दिया जाता है। और फिर कुछ जनता कहती है पिछली सरकार का दोष था ये सरकार अच्छा करेगी हमारे साथ। कुछ जनता कहती है कि सरकार अच्छा काम नहीं कर रही ।। खैर नई सरकार ये राग अलापती हैं कि अभी तो आये हैं सरकार में सुधारने में समय लगेगा।। बेचारी जनता को इंतज़ार के सिवा कोई विकल्प नही रहता ।। बदलाव कहां हुआ ? उसे केवल महंगाई से ही पता लगता हैं। मैं आपको इसका एक उदाहरण देती हूं क्योंकी कुछ चीज़ें उदाहरणों से आसानी से समझ आती हैं - यूपी में शिक्षित बेरोजगार बीएड युवा हैं जो 2011 से आज तक नौकरी के आस में बैठे हैं 7 साल बीत गए । मगर सात सालों में केवल कोर्ट और सरकार से दिखे के बाद कुछ नही मिला।। मुझे याद है कि उस समय मायावती जो बसपा सुप्रीमो हैं बहुत ही अच्छी विचारधारा के साथ कि उत्तरप्रदेश में शिक्षकों की कमी है बहुत से लोग बीएड कर रहे हैं क्यों न ऐसे विज्ञापन निकाली जाए कि ज्यादा से ज्यादा लोग नौकरी पाए ।। एक ऐसी परीक्षा हो जिसे बीएड करके भरा जा सके और फिर उसके आधार पर चयन हो। जिसमें यदि साइंस के सीट खाली रह जाती है तो उसे आर्ट्स से भर दिया जाए यदि अनुसूचित जाति पिछड़ी जाति की सीट बचे तो सामान्य से भरे । मतलब उसका यह था कि प्राइमरी कक्षा में पढ़ाने के लिए शिक्षकों की कमी पूरी की जाए । क्योंकि काफी संख्या में जगह खाली थी जिसके वजह से सरकार को इतनी मजबूरी आगयी की वो शिक्षामित्रों को भी अध्यापक बना दी। उसके पश्चात लोगो ने पैसे लगाए फॉर्म भरा फिर परीक्षाएं पास की उसमे जितने लोग पास हुए उसके डेटा के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया गया कि सभी को नौकरी मिल जाएगी । मगर कुछ लोगो के कॉपी की फिर से जांच कराई जिससे रिजल्ट काफी कुछ बदल गया। मायावती सरकार गिर गयी फिर सपा सरकार आईऔर उसने उस विज्ञापन को गलत बता कर उसी विज्ञापन के लिए लोगो से फिर फॉर्म भरवाये और अब उसमें चयन आधार उसने एकेडमिक मेरिट रखा। और टेट नाम की परीक्षा को केवल एक पात्रता परीक्षा माना। जनता जो नौकरी की आस में अभी भी है उन्होनो उसी विज्ञापन के लिए दुबारा सेफॉर्मभरे । लेकिन ये मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश के विज्ञापन को2015 में गलत मानकर रद्द कर दिया। लेकिन किसी के पैसो की वापसी नही हुई। फिर मायावती सरकार के विज्ञापन बहाल हुआ और 72865 में से 66000को जहाँ तक बताया गया आंकड़े नियुक्ति मिल गयी । फिर नई सरकार आयी जिसने वादा किया था बीएड 2011 टेट वालो से आपको हम नौकरी दिलाएंगे । सदन में यह बात भी उठाई थी वो सत्तामें आई और यह डेटा दी कि रिक्तयाँ नही बल्कि सरप्लस टीचर्स हैं फ़र्ज़ी आंकड़े पिछली सरकार ने दिए । जिससे अब कोईं नईं नियुक्ति की सम्भावना समाप्त ।।
फिर कोर्ट ने अपना फैसला भी दिया कि एकेडमिक मेरिट से विज्ञापन सही था। यदि सरकार चाहे तो उसे बहाल कर सकती है और जो नियुक्तियां हुई है वो निरस्त नही की जा सकती ।।अब यूपी सरकार पिछली सभी सरकारमे हुई परीक्षा यो में धांधली को मानकर पुनः परीक्षा तथा नये सिरे से विज्ञापन निकाल कर नियुक्ति करने के विचार में है। और आज भी जो 2009में बीएड करके नौकरी के तलाशमें आँखे बिछाए हैं कम से कम7सालोंसे क्या उनमे एक ही विज्ञापन के लिए फिर से फॉर्म भरने की इच्छा होगी क्या कोई उनके पिछले सात साल ल सकेगा। एक मिनट में ज़िन्दगी बदल जाती है यहाँ 7 सालो का इंतज़ार अब तो आशा भी दम तोड़ दी होगी । कुछ लोग कहंगे की काबिल होंगे तो उसी के भरोसे नही रहते , सही कहना है लेकिन कितनो की क्या मजबूरी होंगी ये उनलोगों को नही पता जिनको जनता को बेवकूफ बनाने में मजा आता हैं।
क्योंकि हमारे देश मे सरकार प्रति 5 वर्ष बाद बदल जाती हैं और ये सरकार नई नियम लाकर लोगो के किस्मत का फैसला करती है।। यहाँ इंसान खुद नही सरकार इंसान की किस्मत बनाती है ।। कोई सरकार ऐसे अंक देने के नियम लाती है कि कोई भी फेल न हो क्योंकि मेरिट के ज़माने है तो कोई ऐसे की लगे कि बहुत सख्ती से अंक प्रदान किये गए कही गलती नही हुई । कभी मेरिट में आने वाले का अंक 99.5फीसदी(सपा) मुलायम के सरकार में जाता है तो कभी 65फीसदी( बीजेपी ) कल्याण सिंह के कार्यकालऔर वही फैसला हो जाता है उस छात्र के भविष्य का । और साथ ही साथ हमारे देश का ।
मगर अब यह सवाल उठाना जरूरी हैं कि आखिर हम कब तक धोखा खाते रहेगे ।। कबतक यही गलती दुहरायेगे । आखिर उन को सज़ा की मांग क्यों न करे जिन्होंने सही में हमे धोखा दिया हमारे साथ छल कर के गये और आज भी उनकी हिम्मत हैं कि वो हमारे बीच ऐशो आराम की ज़िंदगी बिता रहे हैं की अगर कोईं मामूली इंसान ऐसा करता है तो उसको कानून सख्त सजा देता है मगर हमारे नेता जो घोटाले और जनता के साथ हर 5 वर्षो तक छल करते हैं उन्हें कोई कानून सज़ा नही देता यदि कोई आरोप लगते भी हैं तो या तो बरी हो जाते हैं या फिर केस लड़ते लड़ते भगवान को प्यारे हो जाते हैं ।।

मैं चाहती हूँ कि कोई ऐसा कानून बने जो नेताओं को जनता से छल करने के यानी जो वादा किया वो नही निभाने के आरोप में ऐसी कठिन सज़ा पाए कि आगे की नेताओं को सबक मिले और वो कुछ कहने से पहले सोचे कि यदि हम न कर सके तो हमारा क्या हश्र होगा।।
मैं ये सब इसलिये कह रही हूँ क्योंकि हाल ही में बीआरडी मेडिकल में हुई मासूमो की आक्सीजन की कमी से हुई मौते दिल को झकझोर दी हैं। पिछली सरकार ने क़र्ज़ अदायगी नही की जिसकी सज़ा हमारे उन नादानों को मिली जो जीवित रहने की उम्मीद से आये थे। पिछली सरकार इसकी बहुत बड़ी दोषी है और उसकी भी हिम्मत की वो नई सरकार पर दोष मढ़ कर उन परिजनों से मिलने भी जाने का सोच रही है।
मेरे दृष्टि में सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश पर विशेष कानून बनाकर कार्रवाई करनी चाहियेऔर सर्वप्रथम उसे सख़्त सजा मिलनी चाहिए।।
गोरखपुर टाइम्स सम्पादिका रोली त्रिपाठी

दुनिया समझती थी ताकतवर लेकिन बहुत कमजोर लीडर निकले अहमद पटेल, जीतकर भी हारे: पढ़ें क्यों अहमद पटेल को कांग्रेस का दूसरा सबसे ताकतवर नेता माना जाता है, पहले नंबर पर सोनिया गाँधी हैं और दूसरे नंबर पर अहमद पटेल, कांग्रेस की 10 साल की सरकार में उन्हें सुपर पीएम माना जाता था क्योंकि वे सोनिया गाँधी के सलाहकार हैं, मनमोहन सिंह का रिमोट सोनिया गाँधी के हाथों में था और सोनिया गाँधी का रिमोट अहमद पटेल के हाथों में था, वे सरकार को जैसे चाहते थे चलाते थे. अब तक अहमद पटेल को बहुत ताकतवर नेता और रणनीतिकार माना जाता था लेकिन गुजरात राज्य सभा चुनाव ने उन्हें एक कमजोर नेता साबित कर दिया, यह भी साबित हो गया कि रणनीति बनाने के मामले में वे बहुत कमजोर हैं और उनकी इन्हीं रणनीतियों की वजह से देश ने कांग्रेस के 10 वर्षों का कुशासन देखा और लाखों करोड़ रुपये के घोटाले हुए. अब आप खुद देखिये, गुजरात विधानसभा चुनाव से एक महीना पहले कांग्रेस के पास 59 विधायक थे, अहमद पटेल को राज्य सभा चुनाव जीतने एक लिए केवल 45 विधायकों के वोटों की जरूरत थी लेकिन चुनाव के दिन उन्हें सिर्फ 41 कांग्रेसी विधायकों ने वोट दिए. मतलब एक ही महीनें में उनके 18 विधायक भाग लिए. अब आप बताइये, जो नेता अपने विधायकों को ना रोक पाए, उनके भागने से रोकने के लिए होटल में बंद करना पड़े. क्या ऐसे नेता को पॉवरफुल नेता माना जाएगा, कत्तई नहीं. विधायकों को होटल में बंद करना गुंडागर्दी है और एक अच्छा नेता ऐसी हरकत करने की सोच भी नहीं सकता लेकिन अहमद पटेल ने ऐसा किया. आप यह भी देखिये, अहमद पटेल ने 44 कांग्रेसी विधायकों को होटल में कैद किया लेकिन उसमें से भी उन्हें सिर्फ 41 वोट मिले, इतना सब कुछ करने के बाद भी वह अपने तीन विधायकों को बगावत करने से नहीं रोक पाए जो साबित करना है कि उनके अन्दर लीडरशिप के गुण नहीं हैं. 15 अतिरिक्त वोट होने के बाद भी अहमद पटेल को 44 वोट लेने के लिए पता नहीं क्या क्या करना पड़ा, अपने विधायकों को बैंगलोर भेजा, सुरक्षा में रखा, ऐश कराया, उन्हें वापस बुलाकर गुजरात में फिर से रिजोर्ट में बंद किया, वोट के वक्त एक एक हरकत की निगरानी किया, उन्होंने पता नहीं क्या क्या किया, अपना पूरा सिस्टम लगा दिया फिर भी उन्हें सिर्फ आधे वोट से जीत मिली. अगर एक बीजेपी नेता उन्हें वोट नहीं करता तो वे कदापि ना जीतते. अगर अहमद पटेल वाकई में एक अच्छे लीडर होते तो 59 कांग्रेस विधायक उनपर विश्वास करते और हँसते हँसते उन्हें वोट दे देते, उन्हें इस तरह से विधायकों पर पहरा नहीं बिठाना पड़ता और 59 में से सिर्फ 41 वोट नहीं मिलते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसलिए अहमद पटेल ने खुद को एक कमजोर नेता साबित कर दिया. पूरे देश में सन्देश गया है कि अहमद पटेल अपने विधायकों को कण्ट्रोल नहीं कर सकते. राहुल जामवाल जी द्वारा

     अगस्त क्रांति और समाजवादः राजेन्द्र चौधरी
     भारत की आजादी के लिए और अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए पहली जनक्रांति 1857 में हुई थी। 1885 ई0 में कांग्रेस की स्थापना के वर्षों बाद उसमें लोकमान्य तिलक का प्रवेश हुआ और जनअसंतोष की आवाज उभरने लगी। सन् 1919 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह ने लाखों लोगों को आकृष्ट किया। गांधी जी पहले ऐसे नेता थे जिनकी भारत के किसानों, गरीबों, वंचितों सहित समाज के हर वर्ग में पैठ बनी। उन्होंने अपने आंदोलनों से जनता को संगठित किया। अपने लंबे राजनीतिक संघर्ष से गांधी जी ने जनता के उत्साह को विशेषकर नौजवानों को आजादी के अन्तिम संघर्ष के लिए तैयार कर लिया था।
     भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक लड़ाई थी। क्रिश्स मिशन की विफलता से भारत में क्षोभ की लहर थी। दूसरे महायुद्ध में जापान प्रारम्भिक तौर पर अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था। भारतीय जनमानस में असंतोष था। गांधी जी ने 5 जुलाई 1942 को ‘हरिजन‘ पत्र में लिखा ‘अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारतीयों के लिए भारत को व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।‘ 
      8 जुलाई 1942 को भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी की बैठक बंबई में हुई। इसमें निर्णय लिया गया कि भारत अपनी सुरक्षा स्वयं करेगा। अंग्रेज भारत छोड़े अन्यथा उनके खिलाफ सिविल नाफरमानी आंदोलन किया जाएगा। बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में कांग्रेस के अधिवेशन में गांधी जी का ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो‘ प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को स्वीकार कर लिया गया। इस प्रस्ताव पर गांधी जी ने अपने भाषण में देश को ‘करो या मरो‘का मंत्र दिया। 
      9 अगस्त 1942 की भोर से ही कांग्रेस के सभी बड़े नेता पकड़ लिए गए। इसके बाद तो देश में भूचाल आ गया। जिसको जो सूझा उसने अपने ढंग से अंग्रेजीराज की खिलाफत शुरू कर दी। उ0प्र0 के बलिया और बस्ती में तो अस्थायी सरकारें तक स्थापित हो गई।
      कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद समाजवादी विचारधारा के नेता श्री जय प्रकाश नारायण, डा0 राम मनोहर लोहिया, अरूणा आसिफ अली आदि ने आंदोलन का नेतृत्व सम्हाला। 9 अगस्त 1942 का ऐसा आंदोलन था जिसमें देश का हर वर्ग स्वतः स्फूर्त सक्रिय था। 
भारत के विशाल जनांदोलन से अंग्रेज समझ गए थे कि उनकोभारत छोड़ने में अब देर नहीं होगी। इसलिए जाते-जाते उन्होंने भारत विभाजन का षड़यंत्र रच दिया। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की घड़ी आ गई। 
      आजादी के बाद भारत के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां उठ खड़ी हुई। गांधी जी ने स्वराज के साथ ग्राम राज का जो सपना देखा था वह कांग्रेस के नए नेतृत्व को रास नहीं आया और देश उनके पश्चिमी प्रभाव वाले रास्ते पर चल पड़ा। 
       स्वतंत्रता आंदोलन में भारत के सभी समुदायों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों ने अपनी कुर्बानी देकर भारत को आजाद कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आजादी के बाद शासन सŸाा में जिनके हाथ नेतृत्व आया उन्होंने उन मूल्यों एवं आदर्शों को परे रख दिया जिनके आधार पर गांधी जी ने नए भारत के निर्माण का सपना देखा था। देश में गरीबी, बीमारी, भूख, अशिक्षा, की लड़ाई मंद पड़ गई। गैर बराबरी का दैत्य सब पर भारी पड़ने लगा। जाति और संप्रदाय की राजनीति ने समाज को बांटने और सद्भाव तथा परस्पर सहयोग की भावना को धूमिल कर दिया।         भारत की आजादी के साथ ही कुछ प्रबुद्ध युवा नेतृत्व ने विचारधारा के आधार पर राजनीति चलाने का मन बना लिया था। इस देश की माटी और परम्पराओं से चूंकि समाजवादी विचारधारा की ज्यादा निकटता थी इसलिए देश में समाजवादी आंदोलन को बल मिला। श्री जय प्रकाश नारायण, डा0 राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्द्र देव ने इस आंदोलन की कमान सम्हाली। 
      भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में, जिसकी अगुवाई महात्मा गांधी ने की थी, कई मूल्य एवं आदर्श स्थापित हुए थे। गांधी जी सिद्धांतहीन राजनीति को सामाजिक पाप मानते थे। उनका मानना था कि राजनीति सेवा का माध्यम है। गांधी जी साध्य साधन की पवित्रता पर बल देते थे। नैतिक मूल्यों के प्रति उनका आग्रह था। वे मानते थे कि किसी भी कार्य या योजना के केंद्र में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को रखना चाहिए। भारत के संविधान में एक व्यक्ति एक वोट के माध्यम से व्यक्ति की गरिमा को, जाति-धर्म के भेदभाव के बिना, सम्मान दिया गया। लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल प्रस्तावना में शामिल किया गया।
       वैसे भी आज दो तरह की विचारधाराओं में टकराव है। एक तरफ लोकतंत्र है तो दूसरी तरफ अपने को सर्वोपरि दिखने की सŸाालिप्सा। इसमें हमें तय करना है कि हमें किधर जाना है? मूल अधिकार उस समाज और व्यक्ति द्वारा प्रयोग किए जा सकते हैं जो कानून के प्रति आदर रखते हैं, जो जिम्मेदारी तथा नियंत्रण के सम्यक व्यवहार के लिए तैयार हों। लेकिन जब कोई एक समूह या दल राज्य को कैद करने को संगठित होते हैं, या इसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं, तो किसी समाज के लिए इनका सामना करना बिना किसी अहिंसक प्रतिरोध के संभव नहीं हो सकता है। हम लोकतंत्र की परिधिमें रहकर ही संविधान के मूल उद्देश्यांे को बचा सकते हैं। 
       आज देश के समक्ष जो समस्यायें और चुनौतियां हैं उनके समाधान का रास्ता सिर्फ समाजवादी विचारधारा के पास ही है। जेपी-लोहिया की समाजवादी रीति-नीति पर चलने का काम राजनैतिक दल के रूप में समाजवादी पार्टी ही कर रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने को संकल्पित है। 
       समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव यह मानते हैं कि सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक लोकतंत्र के प्रमुख तंत्र हैं इसलिए वे समाजवादी व्यवस्था और समतामूलक समाज के निर्माण पर बराबर जोर देते रहते हैं। वे डा0 लोहिया के इस सिद्धांत के कायल हैं कि गैरबराबरी मिटनी चाहिए तो संभव बराबरी लक्ष्य होना चाहिए। उनकी सप्तक्रान्ति समानता, राष्ट्र और लोकतंत्र के उन्नयन की कुंजी मानी जा सकती है। 
       श्री अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में सामाजिक न्याय की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। उन्होंने पिछड़ों और वंचितों के सम्मान पूर्वक जीने के लिए विशेष अवसर प्रदान करने का कार्य किया। श्री यादव मानते हैं कि सामाजिक प्रगति के साथ व्यक्ति और समाज की आर्थिक प्रगति भी होनी चाहिए तभी लोकतंत्र फल फूल सकता है। 
       आखिर किसानों की हितों की रक्षा का नीतियों, नेतृत्व और नियत से गहरा सम्बंध है। किसान ही भारत का प्राण है। प्राणहीन समाज में कोई जीवन नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में विचारधारा के आधार पर नीतिगत बंटवारा आवश्यक हो चला है। गंाव, कृषि और किसान की आवाज की चिंता खुद चैधरी चरण सिंह जी ने राष्ट्रीय फलक पर उठाई थी। बाद में उनके अनुयायी समाजवादी आंदोलन के साथ जुड़ गए। आज वे श्री अखिलेश यादव की अगुवाई में उसी रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे है। युवा पीढ़ी की चिंता भी अखिलेश जी ही करते नजर आते है। वे मानते हैं कि समाजवाद का रास्ता ही शोषण विहीन समाज का निर्माण कर सकेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत ही आर्थिक विषमता और सामाजिक गैरबराबरी मिटाने में सफल हो सकती है। लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि सभी प्रकार की सŸाा का विकेन्द्रीकरण हो। इसमें ही अगस्त क्रांति की सार्थकता निहित है। 
                   (राजेंद्र चौधरी, उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टीके मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं।)

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लोहिया की सोशलिस्ट धारा के सादगीपसंद एवं लोकप्रिय व्यक्तित्व-जनेश्वर
आज जनेश्वर मिश्रा का जन्मदिन है।उनका सबसे बड़ा परिचय यह था कि वे भारत की जाति व्यवस्था में तथाकथित उच्च जाति में पैदा होकर भी जकड़न भरे जातीय दंभ से दूर रहते हुए विचार एवं कर्म से समाज के निचले तबके को सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में सम्मान दिलाने के लिए आजीवन समर्पित रहे।90 के दौर में मंडल-कमंडल के बाद हुए ध्रुवीकरण में जनेश्वर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े रहते हुए सामाजिक न्याय और सम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए हाशिये पर चले गए सोशलिस्ट धारा को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी धारा के सभी प्रमुख लोगों को जोड़ते हुए समाजवादी पार्टी की स्थापना का कार्य किया।जिससे उस दौर में तेजी से फैल रहे जातीय वैमनश्य और धार्मिक कट्टरता के असर को कम करने में बड़ी मदद मिली।वंचितों के प्रति अपनी इसी सोच की वजह से वे अपने नाम के आगे लगने वाले जातीय पहचान से स्वयं को आजीवन दूर रखे।


जनेश्वर को लोहिया की परंपरा को व्यवहारिक जीवन में जीने की वजह से छोटे लोहिया के नाम से ख्याति मिली।लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण पहचान सोशलिस्ट धारा में लोहिया के बाद लोकबन्धु राजनारायण के सान्निध्य में रहते हुए समाजवाद को नयी ऊंचाईयां प्रदान करने में सहयोगी भूमिका निभाने वाले समाजवादी योद्धा के रूप रही।

बलिया की माटी में जन्में और इलाहाबादी परंपरा में रचे बसे जनेश्वर को कभी भी कोई लोभ छू भी नही पाया।पचास साल से भी अधिक के सशक्त राजनीति में केंद्र से लेकर कई राज्यों के समाजवादी सरकारों में पूरी दखल रखने की हैसियत होने के बाद भी निजी संपत्ति और भष्टाचार से दूर और बेदाग बने रहने की खूबी ने उन्हें सामान्य और विशिष्ट लोगो के बीच अपार सम्मानीय एवं श्रद्धेय बना दिया।पारिवारिक आग्रहों से दूर रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने सम्पर्क में रहते हुए किसी भी परिचित व्यक्ति के गलत कार्यो में कोई भी मदद नही की बल्कि उसे कानून के दायरे में लाने में जरूर कड़ाई से पालन किया।राग-द्वेष से दूर रहते हुए वे सदैव रिक्शा वाले,ठेले वाले,असंगठित मजदूरों,कूड़ा बीनने वाले लड़को,विधवाओं,उपेक्षितों की मदद और जरूरी सहयोग करने में तत्पर रहते थे।जनेश्वर जी ने कभी भी अपने सम्पर्को और सम्बंधो का बेजा इस्तेमाल नही किया।


देश की शक्ति के चुम्बकीय केंद्र लुटियन्स जोन में लगभग पांच दशकों तक रहते हुए जनेश्वर जी पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ सड़क से संसद तक हल्ला बोलते रहे।जिसकी वजह से कारपोरेट घराने हमेशा उनसे खौफजदा रहते थे।इतना ही नही दिल्ली की राजधानी के सबसे वीआईपी क्षेत्र में जहां आम आदमी या गरीबों को घुसने में भी असहज हो जाना पड़ता था वहीं जनेश्वर जी का राजेन्द्र प्रसाद मार्ग स्थित लोहिया के लोग के नाम से विख्यात आवास गरीबों/मजलूमों के लिए किसी मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारे/चर्च से कम नही था।जहाँ आम आदमी पूरी ठसक और हिम्मत के साथ अपनी बात रख सकता था।साथ ही उसे पूरा भरोसा भी रहता था कि उसकी फरियाद पर तत्काल सुनवाई भी होगी।


पांच अगस्त के दिन दिल्ली में उनके आवास पर पूरे देश के लोगों का जमावड़ा होता था जहां न केवल वैचारिक गोष्ठी होती थी बल्कि कवि सम्मेलन सहित हास्य विनोद का उत्सवपूर्ण माहौल होता था।सभी पार्टियों के बड़े सियासतदां वहां आम लोगों के बीच बड़े होने का अभिमान ही भूल जाते थे।इलाहाबाद सहित यूपी, बिहार,मध्यप्रदेश के बहुतेरे लोगों का उनके जन्मदिन के बहाने दिल्ली आने के क्रम में जनेश्वर जी न केवल ठहरने और खाने का प्रबंध करते थे बल्कि उन लोगों को अगले कई दिनों तक दिल्ली घुमाते भी थे।

जनता के साथ उनका गजब का जुड़ाव था।एक बार जो उनके सम्पर्क में आया उन्ही का होकर रह गया।उनके फक्कड़पन जीवन शैली का ऐसा असर रहता था कि जो अपने काम के सिलसिले में मिलने आता वह उनकी सोहबत में रहते हुए असल काम ही भूल जाता था और जाते समय इसका अफसोस भी नही करता कि काम ही नही हुआ।सभी चिंताओं से मुक्त वो जब तक जिये अपने जीवन दर्शन से ही गैर बराबरी मिटाने का रास्ता दिखाते रहे।साथ ही लोहिया की नीतियों पर चलते हुए समाजवादी व्यवस्था के समता और सम्पन्नता आधारित समाज बनाने की दिशा में सरकार और पार्टी को प्रेरित करते रहे।


आज की राजनीति में जब देश को एक ही रंग-ढंग में रंगने के लिए शासन-प्रशासन की शक्तियों का बखूबी दुरुपयोग किया जा रहा है।आतंकवाद से देश की सीमाएं असुरक्षित हैं और धार्मिक कट्टरता से आंतरिक अशांति एवं भीड़तंत्र की अराजकता हावी हो रही है, ऐसे में जनेश्वर के संसदीय राजनीति में उपस्थिति की स्मृतियाँ जीवंत हो रही हैं।संसद में उनके धारदार बहस के असल मायने लोकतंत्र में राजशाही के स्थान पर लोकशाही की सर्वोच्चता हमेशा बनाये रखने की थी। उनके द्वारा उठाये गए मुद्दे सरकारों के लिए एक नजीर थे कि कैसे जन हितैषी नीतियों के माध्यम से जनता का लोकतंत्र में भरोसा कायम रखा जा सके।
छोटे लोहिया जनेश्वर राजनीति में युवाओं को आगे बढ़ाने में विशेष रुचि दर्शाते थे।उनका मानना था कि समाज की कुरीतियों और विषमताओं के खिलाफ नौजवान ही मजबूत लड़ाई लड़ते हुए जोखिम उठा सकता है।इसीलिए उन्होंने भोपाल अधिवेशन में समाजवादी पार्टी में नया नेतृत्व लाने की मजबूत वकालत करते हुए पार्टी फोरम में प्रस्ताव पारित करवाते हुए अखिलेश यादव को समाजवादी राजनीति में भविष्य के नेता के तौर पर आगे बढ़ाया।इतना ही नही अखिलेश यादव को यूथ फ्रंटल की जिम्मेदारी दिलवाने के साथ उन्हें जमीनी संघर्ष करने की दिशा काम करते हुए संसदीय राजनीति में स्थापित करने में भरपूर सहयोग दिया।पिछले दशक में नेता जी मुलायम सिंह यादव की सरकार बनाने में अखिलेश यादव के नेतृत्व में पूरे प्रदेश में रथयात्रा को उन्होंने ही आगे बढ़वाया।राष्ट्रीय राजनीति सहित यूपी की राजनीति में जन नेता के तौर पर समाजवादी पार्टी के अंदर और बाहर युवा नेतृत्व को पहचान दिलाने में जनेश्वर जी का श्रमसाध्य प्रयास सदैव याद किया जाएगा।


उनके न रहने पर समाजवादी सरकार द्वारा एशिया के सबसे बड़े जैव विविधता युक्त पार्क की स्थापना सहित उनके आदमकद मूर्ति की स्थापना के साथ कालीदास मार्ग पर उनके नाम पर जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट से एक केंद्र स्थापित किया जाना उनके सार्वजनिक जीवन के महत्व की याद दिलाता रहेगा।

जनेश्वर को याद करते हुए सार्वजनिक जीवन में आम जन को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने की लड़ाई लड़ते हुए बेदाग और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने की सीख लेना ही छोटे लोहिया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मणेंद्र मिश्रा’मशाल’
संस्थापक-समाजवादी अध्ययन केंद्र

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अहमद पटेल के रोकने के पिछे के कारण . (वी.के.द्विवेदी की कलम से) गुजरात में राज्यसभा के तीन सीटों पर कल चुनाव होना है जिसमें दो पर भाजपा का जीतना तो तय है लेकिन एक सीट जो कांग्रेस के खाते की थी उस पर भाजपा ने ऐसा चक्रव्युह रच दिया है कि सोनिया गांधी के रणनीतिकार अहमद पटेल को दिन में तारे दिख ने लगा है। ...भाजपा ने अहमद पटेल को हराने के लिए जो एड़ी-चोटी की जोर लगा रही है उसके पिछे एक नही अनेक कारण है। ...पहला यह कि बहुत लोगों को यह पता नही होगा कि कांग्रेस में सोनिया और राहुल के बाद अहमद पटेल का ही सिक्का चलता है।सोनिया गांधी अहमद पटेल से बिना सलाह लिए कोई काम नही करती है।कांग्रेस के पार्टी फंड में धन जुटाने से लेकर रणनीति बनाने का काम अकेले यही अहमद सम्हालते हैं। सिर्फ कांग्रेस पार्टी में ही नही मनमोहन सरकार में भी इनका सिक्का जमकर चलता था जिसका खुलासा कुछ दिन पहले मनमोहन सिंह के सलाहकार संजय बारू ने भी अपनी एक किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनीस्टर ' में किया था। ....किताब के अनुसार अहमद पटेल पीएमओ में सिधा दखल देते थे कौन सा नेता मंत्री बनेगा और कौन नही इसका सूची अहमद पटेल ही तैयार कर खुद पीएमओ में लाते थे।कब मंत्रीमंडल विस्तार होगा यह निर्णय भी वहीं करते थे।राष्ट्रीय बैंको से लेकर सार्वजनिक उद्यमों के बोर्ड में कांग्रेसी नेताओं और रिश्तेदारों को शामिल करवाने के लिए जमकर लाॅबिंग भी करते थे इसके बदले इच्छुक लोगों की ओर से करोड़ो रूपया जो मिलता था वह पार्टी के फंड बन जाता था। ...यह ऐसे तो यह ईमानदार और सादगी पसंद नेता हैं लेकिन इनका चरित्र हिंदू विरोधी रहा है।गोधरा कांड के आरोपीओं को इन्होने बचाने के लिए अपनी जी-जान लगा दी।मनमोहन सरकार बनने के ठिक दो महीने बाद जुलाई 2004 में एक जांच कमेटी बनाई गयी।उस बैनर्जी समिती जांच गठित करवा कर काल्पनीक रिपोर्ट दिलवाया गया कि गोधरा कांड साजिश नही ब्लकि एक दुर्घटना मात्र था जो आग लगायी नही गयी ब्लकि अंदर से ही किसी के गलती के कारण लग गई थी।यह अलग बात है इस काल्पनीक रिपोर्ट को न तो न्यायालय ने स्वीकार किया और न ही भारत की जनता ने। लेकिन यह काल्पनिक रिपोर्ट आने से पहले पूर्व के ही जांच रिपोर्ट पर कारवाई हो रही थी। ....गोधरा कांड के सभी अभियुक्तो पर पोटा के तहत के केस चल रहा था जिसमें आरोप सिद्ध होने पर फांसी होना तय था।इसे बचाने के लिए तत्कालीन रेल मंत्री से लालू प्रसाद यादव से जुलाई 2004 में घोषणा करवाया गया कि आरोपीओं पर लगाया गया पोटा कानुन हटाया जाएगा।लेकिन जब विरोध हुआ तो आनन-फानन में अहमद पटेल के इशारे पर सन 2004 में पोटा कानुन को ही संसद में बहुमत के बल पर रद्द कर दिया गया।क्योंकी जब तक पोटा आस्तित्व में रहता तब तक उसी के आधार पर कारवाई चलती। ... उसके बाद 16 मई 2005 को यह कहा गया कि गोधरा के आरोपीओ पर पोटा नही लगाया जाएगा।किंतु दुसरे पक्ष के वकील ने विरोध में जब जोरदार दलील दी तो न्यायालय भी किर्तव्यमुढ बनकर रह गया।उसके बाद सन 2009 में पोटा विचार समिती के द्वारा यह घोषणा करवाया गया कि आरोपीओं पर पोटा के तहत कारवाई नही होगी।इस तरह अहमद पटेल ने गोधरा के आरोपीओं को बचाने के लिए अपने जी-जान लगा दिया। ....अहमद पटेल के ही इशारे पर कांग्रेस सरकार द्वारा नरेन्द्र मोदी को बुरी तरह से परेशान किया गया।किंतु तमाम चक्रव्युह रचने के बाद भी जब मोदी इसको नाकाम बनाते गयें तो अहमद पटेल ने मोदी के सबसे निकट सहयोगी और विश्वस्त गृहमंत्री अमित शाह को फंसा कर गंदी राजनीति खेली।इस अहमद पटेल ने अमित शाह को पुलिस एनकाउंटर के मामले में सलाखों के पीछे भिजवाया था। .....जिस देश में निर्दोष व्यक्तियों के एनकाउंटर में दरोगा भी जेल नहीं जा पाता है उसी देश में लश्कर तोएबा के आतंकवादियों के एनकाउंटर में गुजरात के गृह मंत्री अमित शाह को जेल भेजा गया था। ...अभी हाल ही गुजरात के सीआईडी ने अपने जांच में पाया है मोदी सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के लिए अहमद पटेल ने ही दलित संबधी उना कांड की साजिश रची थी इस कांड के साजिशकर्ता वंशभाई भीमभाई है जो अहमद पटेल के विश्वस्त सिपाही हैं। ..यही सब कारण है कि अहमद पटेल को हराने के लिए अमित शाह जी-जान की कोशिश कर रहे है।कहते हैं न कि समय बहुत बलवान होता है और समय जब आज पलटा तो अहमद पटेल आज सड़क पर हैं अमीत शाह आज एकक्षत्र शहशांह हैं जिनके साथ कभी गंदी राजनीति खेलकर लश्कर तोएबा के एक आतंकवादी के इंकाउटर पर अहमद पटेल ने जेल भीजवाया था। ....बहुत कम लोग यह जानते हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा निवारण बिल और सच्चर कमेटी रिपोर्ट लागु कर बहुसंख्यक हिंदूओ को आर्थिक और कानुनी रूप से सड़क पर लाने का सोंची-समझी साजिश इसी अहमद पटेल की थी।
प्रो0 वी के द्विवेदी जी के कलम से... लेखक दिल्ली आईआईटी में प्रोजेक्ट कन्सलटेंट,दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक,एवम वैज्ञानिक,पिलानी रह चुके है।।

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गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर विशेष ============================ कलियुग के प्रारम्भ होने के पश्चात् सनातन हिन्दू धर्म यदि किन्हीं महापुरुषों का सबसे अधिक ऋणी है तो वह हैं-
आदि गुरु शंकराचार्य और गोस्वामी तुलसीदास।
शंकराचार्य जी ने 2500 वर्ष पूर्व बौद्ध मत के कारण लुप्त होती वैदिक परम्पराओं को पुनर्स्थापित करके दिग्दिगंत में सनातन हिन्दू धर्म की विजय वैजयंती फहराई।
विदेशी आक्रमणकारियों के कारण मंदिर तोड़े जा रहे थे, गुरुकुल नष्ट किये जा रहे थे, शास्त्र और शास्त्रग्य दोनों विनाश को प्राप्त हो रहे थे, ऐसे भयानक काल में तुलसीदास जी प्रचंड सूर्य की भाँति उदित हुए। उन्होंने जन भाषा में 'श्री रामचरितमानस' की रचना करके उसमें समस्त आगम, निगम, पुराण, उपनिषद आदि ग्रंथों का सार भर दिया और वैदिक हिन्दू सिद्धांतों को सदा के लिए अमर बना दिया था।
अंग्रेज़ों ने हज़ारों भारतीयों को ग़ुलाम बना कर मॉरीशस और सूरीनाम आदि के निर्जन द्वीपों पर पटक दिया था। उन अनपढ़ ग्रामीणों के पास धर्म के नाम पर मात्र 'श्रीरामचरितमानस' की एक आध प्रति थी।
केवल उसी के बल पर आज तक वहां हिन्दू धर्म पूरे तेज के साथ स्थापित है। अनेकों ग्रंथों के रचियेता भगवान् श्री राम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी भले ही तलवार लेकर लड़ने वाले योद्धा ना हों
लेकिन उन्होंने अपनी भक्ति और लेखनी के बल पर इस्लामी आतंक को परास्त करके हिन्दू धर्म की ध्वजा फहराए रखने में अपूर्व योगदान दिया था।। साभार:- परमानन्द पाण्डेय लखनऊ

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जीवन की मूलभूत नैसर्गिक जरूरतों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा और मकान होता है। जिसमें शिक्षा और कृषि का दायरा अगर जीवन में ऊंचे ओहदे का है। फिर जीवन में अन्य चीजों की पूर्ति की जा सकती है।

भोजन और स्वास्थ्य की आवयश्कता का निर्वहन प्रारंभिक काल में बच्चों के लिए इंतजाम उसके माता-पिता करते हैं। लेकिन शिक्षा ही ऐसा साधन है, जो बच्चों को जीवन में किसी अन्य चीजे को साध्य बनाने का अवसर प्रदान करती है। शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिकता का पाढ़ पढ़ता है, और अगर वह सरकारी नौकरी के योग्य नहीं बनता। तो वर्तमान दौर में हमारे देश में एक चलन जोर पकड़ रहा हैं, कि अच्छी शिक्षा प्राप्तकर युवा खेती-किसानी की ओर अग्रसर हो।

लेकिन वर्तमान दौर की शिक्षा प्रणाली की बात हो। उस परिवेश मेें दिखता है, कि भारतीय परिदृष्य में शिक्षा का पैमाना दुनिया में सबसे गर्त में जाता दिख रहा है। शिक्षा न रोजगार सृजन का साधन बन पा रहा है, न ही शिक्षा में संस्कारों का कोई उचित साक्ष्य दृष्टिकोण दिखता है। शिक्षा का भविष्य मात्र डिग्री धारकता का प्रमाण दृष्टिगोचर हो रहा है। इसका प्रमाण यह है, कि यूपी बोर्ड की जो परीक्षा कभी एशिया की सबसे कठिन परीक्षा लेने वाली संस्था कहलाती थी, वह अभी शिक्षा माफियों के दुष्चक्र में अटककर सर्टिफिकेट बाॅटने तक सीमित दिख रही है।

उत्तर प्रदेश समेत अनेक राज्यों में शिक्षा के गिरते स्तर का कारण शिक्षा क्षेत्र में नेताओं का आवागमन है, उत्तर प्रदेश जैसे सूबे में रसूखदार नेताओं के स्कूलों की भरमार है। इसके साथ आज देश की रीढ़ कृषि और भविष्य निर्माण करने वाली शिक्षा व्यवस्था दोनों की स्थिति नाजुक हैं। एक ओर देश का किसान बेवश और लाचार हैं, तो दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था का भी बेडा गर्त हैं। ऐसे में देश की तरक्की की बात कैसे हो सकती हैं? देश की प्रगति के निर्धारक किसान और युवा पीढ़ी होती है। देश की मलिन हालत में दोनों की स्थिति बद्तर होती जा रही है।

किसानों और छात्रों की आत्महत्या का दौर बद्दस्तूर जारी है। फिर कैसे कहा जाएं, कि देश आर्थिक प्रगति की तरफ गतिमान है?

देश का अन्नदाता जो दूसरों का पेट सदियों से भरता आया है, अगर उसके परिवार-जनों को दो वक्त की रोटियाॅ नहीं मिल रही। फिर कैसी व्यवस्था और आर्थिक-सामाजिक प्रगति और उन्नति की ढ़पली देश में पीटी जाती रही है? आजादी के सात दशक बाद भी किसानों की समस्याएं कम होती नही दिखती, नही तो आएं दिन कहीं तमिलनाडु के किसान जंतर-मंतर पर तो कहीं महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसान सड़कों पर अपनी ही वस्तुओं की बर्बादी की होली खेलते नजर नहीं आते?

अगर आजादी के 70 वर्षाें के बाद भी किसानों की कुंड़ली पर हुक्मरान बैठे हुए है, तो उनको किसानों की स्थिति में सुधार के लिए भागीरथी प्रयास करना चाहिए। रही बात युवाओं की कृषि की तरफ रुझान नहीं होने कि , तो उसके भी साफ कारण हैं। जब सरकारें खेती को लाभ का धंधा नहीं बना सकी। फिर युवा पीढ़ी लाखों रुपए फूँककर खेती की तरफ क्यों आकर्षित होगी ? यह हमारी लोकतान्त्रिक सरकारों को भी सोचना चाहिए।

एक तरफ देश की शिक्षा व्यवस्था चरमरा चुकी है, जिससे युवाओं को मुकम्मल भविष्य नहीं मिल पा रहा है, तो ऐसे में वे फिर भी कुछ हद तक खेती की तरफ ही कदम बढानें को विवश है। ऐसे में खेती अगर लाभ का धंधा नही बन पा रही है। तो इससे देश का अन्नदाता रूपी वर्तमान और भविष्य दोनों प्रभावित हो रहा है।

अगर सेंट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ पोस्ट हारवेस्टिंग इंजीनियरिग एंड टेक्नोजाॅजी की रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष लगभग 92 हजार करोड़ का अनाज सरकार खुद भंडारण क्षमता नहीं होने के कारण बर्बाद कर देती है। फिर सरकारें अधिक उत्पादन के लिए किसानों को विवश क्यों करती है। वर्तमान दौर में अगर सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान मात्र 14-15 प्रतिशत है, तो उसको बढ़ाने के प्रयत्न के साथ कर्जमाफी रूपी फौरी राहत और चुनावी फायदों के तरीकों को छोड़कर हुक्मरानो को किसानों की समस्या पर स्थायी मलहम लगाने की कोशिश करनी होगी। इसके साथ शिक्षा जो जीवन को निखारने का काम करती है।
उससे नेताओं और सामाजिक ठेकेदारों को दूर रखना होगा। तभी कुछ सकारात्मक पहलू शिक्षा व्यवस्था के दृष्टिमान हो सकते है। शिक्षा की बदहाली का अंदाजे बयां इसी तथ्य से लगाया जा सकता है, कि देश में साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी तो दर्ज हो रही है। परन्तु गुणावत्ता और रोजगारपरक शिक्षा व्यवस्था समाज से दरकिनार होती जा रही हैं। फिर सरकारें कहती हैं, कि युवाओं को उन्नत कृषि की ओर अग्रसर होना चाहिए, लेकिन वास्तव में उसके अनुकूल माहौल भी सरकारें उपलब्ध नहीं करा पाती। फिर ऐसे में देश का भविष्य और अन्नदाता किधर रुख करें ?

बड़े-बड़े सरकारी दावों और विज्ञापनों के बाद वर्तमान दौर में सरकारी स्कूलों के बच्चों के ज्ञान स्तर से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कलई खुलती प्रतीत होती है। सरकारी आंकड़ों के खेल को देखे, तो पता चलता है, प्राइमरी और सेकेंड्री स्तर पर स्कूलों में वर्तमान परिस्थिति में 10 लाख के करीब पद खाली पड़ें है। देश के लगभग 37 फीसद स्कूलों में एक भी भाषिक अध्यापक नहीं है। ऐसे में देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार का भगीरथी प्रयास कैसे हो सकता है? इसके इतर देश के भीतर जो शिक्षक है, वे आंकड़ों की लड़ाई में गौर किए जाएं, तो पांच में से मात्र एक अध्यापक बेमुश्किल से प्रशिक्षित मिलते है।

इसके इतर देखा जाएं, तो किसानों की बदहाली और आत्महत्या का दौर जारी है, जिसका अंदाजा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकंड़े से लगाया जा सकता हैं. जिसमे मात्र मध्यप्रदेश में पिछले 16 वर्षों में लग़भग 21 ,000 किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं।जिसका कारण फ़सल बर्बाद होना, उचित दाम न मिलना बताया जाता है.

फिर ऐसे में पांच बार से लगातार कृषि कर्मण पुरुष्कार सूबे द्वारा हथियाने का क्या अर्थ? किसानों की आत्महत्या का यही आंकड़ा पूरे देश का हैं।

ऐसे में देश को आगे बढ़ाने की नींव खोखली मामूल पड़ती है। अगर देश के भीतर जिनके ऊपर देश का भविष्य बनाने और नींव तैयार करने की जिम्मेदारी है, वे ही न ठीक से प्रशिक्षित है, और शिक्षकों की तादाद बहुत कम है, फिर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बाट कैसे जोही जा सकती है? कुछ समय पूर्व आएं एसोचैम के एक सर्वें के अनुसार देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़कर निकलने वाले लगभग 85 फीसद छात्र अगर अपनी योग्यता सिद्ध करने में सिद्वहस्त नहीं होते, तो यह हमारे रहनुमाओं और शिक्षण व्यवस्था को सोचना चाहिए, कि देश के कर्णधार को कैसी शिक्षा मुहैया करवाने पर बल दे रहें है, कि जिससे न उनका भला हो पा रहा है, बस मात्र कागजों पर बढ़ोत्तरी के लिए शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के स्लोगन दिए जाते रहें है।

आगामी सत्र से उत्तर प्रदेश सरकार नकल विरोधी उसी अध्यादेश को लाना चाहती है, जो 1992 के दौर में कल्याण सिंह समय में लाया गया था। उसको लागू करने से पहले शिक्षा तंत्र को दिवालियापन से बचाना होगा, तभी नकल से आजादी मिल सकती है। साथ में देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की बाट जोहना होगा। इसके साथ कृषि को भी लाभ का धंधा बनाना होगा।तभी युवा इस ओर आने को तैयार होंगे। नहीं तो देश में ऐसे ही शिक्षा और कृषि की मलिन हालत बनी रहेगी, और देश का अन्नदाता और युवा भविष्य बेहाल मिलेगा।


मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2016 की असर रिपोर्ट बताती है, कि ग्रामीण सरकारी स्कूलों के आठवीं के छात्रों में से सिर्फ 402 प्रतिशत छात्र गणित के भाग सवाल को हल कर पाते है। इसके साथ 2016 में आठवीं के 70 प्रतिशत छात्र है, जो दूसरी कक्षा की किताब पढ़ सकते है। जो आंकडा 2012 में 73.4 फीसद था। यूडीआईएसई की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 97923 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है। इस सूची में मध्यप्रदेश 18190 के साथ पहले स्थान पर है। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 30 से 35 छात्रों एक शिक्षक होना चाहिए। अगर देश में शिक्षा की यह स्थिति है, फिर देश की उन्नति में युवा कहां है?एक ओर किसान देश में बेहाल है, फिर वह अपने बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा कैसे उपलब्ध करा सकता है? एक तथ्य यह भी है, कि सरकारी स्कूलों की अधोसंरचना और ख़ामियों से ऊबकर जनता ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से दूर रखना उचित समझा हो।

तो ऐसे में सरकारों को सरकारी स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की ज़हमत जोहना चाहिए। फिर जिस हिसाब से देश में शिक्षा प्रणाली गर्त में जाती दिख रहीं हैं, वह बताती हैं, कि भारतीय शिक्षा प्रणाली को सिंगापुर और फिनलैंड के नजदीक भटकने में वर्षों लगेगें।

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