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Public Opinion

Public Opinion (355)

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3 लाख शिक्षकों के साथ खिलवाड़ कर रही है योगी सरकार...
आज के जमाने मे अगर आपको 500 से 2000 रुपए प्रतिमाह की दर से नौकरी दी जाए तो आप करेंगे कभी नही।।फिर भी आज उत्तर प्रदेश के लगभग 3 लाख से अधिक लोग ऐसे है जो इतनी कम सैलरी में बच्चो को शिक्षा प्रदान कर रहे।। जी हाँ हम दर्द बयां कर रहे उत्तर प्रदेश के वित्तविहीन शिक्षकों की जो आज भी सिर्फ 500 से 2000 तक के प्रतिमाह की दर से देश के भविष्य को शिक्षा प्रदान कर रहे।। पिछली सरकार ने वित्तविहीन शिक्षकों के लिए 100 करोड़ अनुदान लगभग 3 लाख से अधिक शिक्षकों के मानदेय हेतु दिया था पर योगी सरकार के आने पर वित्तविहीन शिक्षकों को पूरी उम्मीद थी कि योगी जी उनकी स्थिति परस्थिति को समझेंगे ।। पर अचानक योगी जी इनके आशा के विपरीत जाते हुए मानदेय ना देने का फैसला किया पर मांग करने पर योगी सरकार ने भी पिछली सरकार की तरह ही वही पुराना मानदेय देने का फैसला किया जो वित्तविहीन शिक्षकों के लिए अहित साबित हो रहा।। आज के मंहगाई के जमाने मे भी 500 से 2000 रुपए प्रतिमाह दिया जा रहा जो कि शायद किसी सरकारी कर्मचारी के महंगाई भत्ते के बराबर है।।

समय देव पांडेय

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देश के कई हिस्सों में आजकल किसान आंदोलन या तो चल रहा है, या फिर विपक्षी राजनीतिक दल इस बात के संकेत दे रहे हैं कि जल्द ही अन्य राज्यों में इस तरह के किसान आंदोलन शुरू करके मोदी सरकार को एक बार फिर से घेरने की कवायद शुरू की जाएगी. विपक्ष के नेता पिछले ३ सालों के मोदी सरकार के सफल कार्यकाल से इस कदर बेहाल नज़र आ रहे हैं कि अब उन्हें “नकली दलित छात्र ” की तर्ज़ पर “नकली किसान ” भी बनाने पड़ रहे हैं ताकि अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को किसानों का चोला पहनाकर उसे किसान आंदोलन का रूप दिया जा सके और मोदी सरकार को बदनाम करने के साथ साथ किसानों का भी अपमान किया जा सके.

खबर यह आ रही है कि मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन में किसानों ने एक मंदिर को भी तोड़ फोड़ करके आंदोलन के हवाले कर दिया. आप खुद सोचिये कि क्या कोई असली किसान ऐसा बेगैरत हो सकता है कि वह मंदिर जैसे धार्मिक स्थल पर हमला कर सके ? अगर मंदसौर में किसी मंदिर में भी आग लगाई जा रही है तो जनता यह समझ सकती है कि इसके पीछे किसका हाथ है. विपक्षी राजनीतिक दल जिस तरह से इन शर्मनाक घटनाओं को अंजाम देकर उसका ठीकरा किसानों के सर फोड़ने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, उसकी उन्हें आने वाले समय में भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है,

आपको याद होगा कि अख़लाक़ का मामला हो या नकली दलित छात्र रोहिल वेमुला का मामला, विपक्ष ने हर बार मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार किया है और हर बार मुंह की खाई है. सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के खिलाफ जो दुष्प्रचार विपक्षी नेताओं ने किया था, उसका नतीजा यह हुआ कि इन लोगों का सूपड़ा ही साफ़ हो गया. लेकिन अपनी इन चालबाज़ियों और उनकी नाकामियों से कोई भी सबक न लेते हुए विपक्षी नेता इस बार नयी नवेली नौटंकी को “किसान आंदोलन” के नाम से पेश करके इस देश के मेहनती किसानों को बदनाम भी कर रहे हैं और उनका घोर अपमान भी कर रहे हैं. विपक्षी नेता पूरे देश की जनता को यह सन्देश देना चाहते हैं कि इस देश के किसान मंदिरों में आग लगा सकते हैं, अपने मेहनत से पैदा किये गए अनाज को सड़कों पर नष्ट कर सकते हैं, भूख हड़ताल कि नौटंकी करके जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर सकते हैं. हमारे देश के किसान ऐसे हरगिज़ नहीं हैं जो भूख हड़ताल पर बैठने की नौटंकी करें और “सागर रत्न” रेस्टोरेंट से अपने लिए लज़ीज खाना और बिसलरी का पानी मंगाए. जिस तरह का चाल, चरित्र और चेहरा इन किसानों का पेश किया जा रहा है, वह भारत के किसी किसान का नहीं हो सकता है, वह किसी हारी हुयी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्त्ता का ही हो सकता है.

भारत एक कृषि प्रधान देश है और विपक्ष को चाहिए कि वह किसानों का सम्मान करना सीखे. देश के विपक्षी दलों के राजनेता अगर अब भी अपनी इन छिछोरी हरकतों से बाज़ नहीं आये और किसानों का इसी तरह अपमान करते रहे तो इन्ही किसानों के द्वारा यह लोग इतिहास बना दिए जाएंगे. मोदी सरकार को अगर घेरना भी है तो उसके लिए किसानों की नकली नौटंकी पेश करने की बजाये, यह बताने की हिम्मत करे कि इस देश में ६० सालों तक जब एक ही पार्टी या उसके सहयोगी राजनीतिक दलों का एकछत्र राज चल रहा था तो इन ६० सालों के बाद भी किसानों की हालात में कोई सुधार क्यों नहीं आया ?

आज ऐसे ही बैठे बैठे ख्याल आया कि यदि हम सब भारतीय एक ही जाति ,वर्ग ,समुदाय के होते तो हमारा समाज क्या उच्च समाज नही होता। हमारे प्राचीन व्यवस्थापक ने जिन्होंने हमे 4 वर्गों में कार्यो के आधार पर बांटा जिससे सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चले।हम लोग ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,शुद्र बट गये जो अपने जाति के आधार पर सामाजिक सहयोग देत आरहे है। समय परिवर्तन के साथ हम अलग अलग क्षेत्र से जुड़े कार्य करने लगे।कोई ब्राह्मण क्षत्रिय का कार्य तो कभी कोई वर्ग कोई कार्य।फिर भी आज हम खुद को उसी जाति के लिये दूसरी जातियों के साथ दुर्व्यवहार करने से भी नही चूकते । कभी सोचा हैं कि हमारी मूल जड़े क्या थी ?सभी जानते हैं कि हमारे इतिहास के आधार पर हम सब केवल आदिमानव थे फिर हम विकसित हुए तो वर्ण व्यवस्था बनाई गई।जिससे ये समाज का कार्य उचित ढंग से चले। प्राचीन काल से चली आ रही इस वर्ण व्यवस्था का किसी ने कभी कोई विरोध नही किया।क्या इस व्यवस्था से कभी किसी को परेशानी नही हुई।जबकि आये दिन हमारे समाज़ में जाति के नाम पर वर्ग के नाम पर दंगे होते आये हैं।कभी हिन्दू -मुस्लिम के दंगे तो कभी दलित दंगे। क्यों नही हम सब मिलकर इस समस्या का निदान करते हैं। रोज रोज के इन जातिय दंगो और राजनीतिक पार्टियों का दिखावा प्रेम देख मन घिन्न होता जाता है। हम सब सच जानते हुए भी कुछ नही करते क्यों मूक बन के सब कुछ देखते हैं। क्यों न हम एक ही वर्ग और समुदाय के हो जाये तो हमारे समाज की एक बहुत बड़ी समस्या दूर हो जाये । जब हम सब अपने देश से इतना प्रेम करते हैं। तो हम सब अपनी जाति हटाकर अपने देश का नाम लिखे । हम सब का राष्ट्रीय पर्व ही हमारा त्यौहार हो।हम काम करे तो सिर्फ अपने देश के लिए। हर वर्ग एक साथ काम कर सके , विवाह संबन्ध बना सके , बैठ कर एक साथ खा सके ,किसी को अपनी जाति नही बस भारतीय होना याद रहे। तभी हमारी भारत माँ जो धर्म और जाति जैसी बहुत ही गम्भीर बीमारी से पिछले कितने वर्षो से ग्रषित हैं ,ठीक हो सकेगी। तब कितना सुंदर दृश्य होगा इस भारत देश का,किसी को किसी से कोई डर न होगा ,एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम होगा । वैमनस्यता और अश्पृश्यता का अंत होगा। तब ही हम सही रूप से देश के उन्नति के बारे में सोच सकेंगे। यह एक केवल मेरी विचार धारा हैं इससे किसी की भावनाओं को ठेस लगती हो तो क्षमाप्रार्थिनी हूँ।अगर सही लगे तो एक बार मेरी इस कल्पना पर अवश्य विचार करे। धन्यवाद

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कहा जाता है कि दूसरों के पदचिन्हों पर चलने से बेहतर होता है खुद पदचिन्हों को बनाना जिस पर दूसरे चल सके ।। कुछ ऐसा ही मिसाल पेश किया है गोरखपुर के युवा नेता "पवन सिंह" ने।।

गोरखपुर के एक छोटे से गाँव से आया एक लड़का पवन सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय में दाखिला ले वहां के परिवेश और छात्र राजनीति को समझते हुए उन्हें एहसास हुआ कि वर्तमान में राजनीति की परिभाषा ही बदल चुकी है।।पवन जी ने देखा की राजनीति अपने मूल लक्ष्य से भटक कर आज सिर्फ़ व्यवसाय का एक साधन मात्र बन चुकी है, और इसी पीड़ा के साथ आज के राजनीति में कुछ अहम बदलाव करने का निश्चय किया और यही बाक़ी के तथाकथित नेताओ से पवन के विचार और सोच उन्हें भीड़ से अलग कर देती हैं।। उनका मानना था कि व्यवसाय और पैसा तो मैं अपनी काबिलियत के बल पर भी प्राप्त कर सकता हु और मैं ये करके दिखा दूंगा।लेकिन राजनीति को इतने निचले स्तर पर ले जा व्यवसाय बनाना मुझे मंज़ूर नहीं।

इसी दृढ़ संकल्प के साथ बिजनेस में उतरे पवन सिंह ने अपना बिजनेस साम्राज्य खड़ा कर दिया और बड़ी बात ये हैं की उत्तर प्रदेश मे इतने कम उम्र में इतनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले युवा बने। और आज पूर्वांचल के बड़े बिजनेस मैन में एक चर्चित नाम पवन सिंह हैं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय से छात्र राजनीति से जीवन शुरू करने वाले पवन सिंह आज पूर्वांचल के युवाओ के लिए एक रोल मॉडल बन चुके है।

अपनी युवा सोच, कड़ी मेहनत और काम केे प्रति निष्ठा एवम ईमानदारी से साबित कर दिखाया की इंसान अपने दृढ इच्छा शक्ति से कुछ भी कर गुजर सकता है।।

आज जो बात इन्हें औरों से अलग करती हैं वो हैं की पवन सिंह लोगो से सीधे तौर पर जुड़ा होना और जरूरतमंदो की सहायता अपना कर्तव्य समझना। जिसमे ये कभी पीछे नही हटते और दिल खोल कर मदद को खड़े रहते हैं।।

समाजिक कार्यो में रुचि रखने वाले पवन सिंह अपने खर्च पर गरीब लड़की की शादी करवाते है तो कभी किसी युवा को रोजगार देते है। किसी गाँव मे यदि को समस्या आ जाए तो तत्परता दिखाते हुए उनको संभालने निकल पड़ते है।
शायद ये भी एक वजह हैं जो प्रदेश में इनकी लोकप्रियता इतनी ज़्यादा हैं ख़ास कर युवाओ के बीच।।

अपने व्यक्तिगत जीवन में तमाम उतराव - चढ़ाव एवम झंझावातों को झेलते हुए अपने जीवन मे सदैव आगे बढ़ते रहे। कोई संवैधानिक पद पर ना होते हुए भी लोग इनके पास अपनी समस्या लेकर जाते हैं पवन जी उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझते हुए हर सम्भव मदद करते है।

पवन सिंह ने राजनीति को कभी अपने व्यवसाय का साधन नही बनने दिया अपितु इसकी जगह उन्होंने राजनीति की सच्ची परिभाषा को चरितार्थ करते हुए निस्वार्थ भाव से लोगो की सेवा करते हुए आज आम जनमानस में अपनी एक अच्छी छवि उकेरी है।।

उत्तर प्रदेश में आज अभिभावक पवन सिंह का मिसाल देते हुए अपने बेटों को इनके जैसा कामयाब बनने की प्रेरणा देते हैं।। आज पवन सिंह युवाओ के लिए बिजनेस और सामाजिक कार्यो के लिए आदर्श स्थापित कर चुके है।।आज हर युवा पवन सिंह बनने की चाह रखता है।।

इतना कामायाब होने के बाद भी लोगो की सेवा करने की प्रबल इच्छा इन्हें सबसे अलग कर एक नई ऊँचाई दे रही हैं।।
पवन सिंह चाहते है कि उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवा के लिए अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हो।।गोरखपुर के युवा कुछ ऐसा करे की गोरखपुर विश्वपटल पर एक आदर्श बन कर उभरे।।
अपने जैसे कई युवाओ के लिए आज वो एक कुशल नेतृत्वकर्ता,नेता और आदर्श बने हुए है ।। आज विधायक ,सांसद आदि किसी राजनैतिक पद पर ना होते हुए भी पवन सिंह से लोगो को आशा रहती है और पवन सिंह आशा पर खरे उतरते हुए लोगो की हर सम्भव मदद करते है।।

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कहा जाता है कि दूसरों के पदचिन्हों पर चलने से बेहतर होता है खुद पदचिन्हों को बनाना जिस पर दूसरे चल सके ।। कुछ ऐसा ही मिसाल पेश किया है गोरखपुर के युवा नेता "पवन सिंह" ने।।

गोरखपुर के एक छोटे से गाँव से आया एक लड़का पवन सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय में दाखिला ले वहां के परिवेश और छात्र राजनीति को समझते हुए उन्हें एहसास हुआ कि वर्तमान में राजनीति की परिभाषा ही बदल चुकी है।।पवन जी ने देखा की राजनीति अपने मूल लक्ष्य से भटक कर आज सिर्फ़ व्यवसाय का एक साधन मात्र बन चुकी है, और इसी पीड़ा के साथ आज के राजनीति में कुछ अहम बदलाव करने का निश्चय किया और यही बाक़ी के तथाकथित नेताओ से पवन के विचार और सोच उन्हें भीड़ से अलग कर देती हैं।। उनका मानना था कि व्यवसाय और पैसा तो मैं अपनी काबिलियत के बल पर भी प्राप्त कर सकता हु और मैं ये करके दिखा दूंगा।लेकिन राजनीति को इतने निचले स्तर पर ले जा व्यवसाय बनाना मुझे मंज़ूर नहीं।

इसी दृढ़ संकल्प के साथ बिजनेस में उतरे पवन सिंह ने अपना बिजनेस साम्राज्य खड़ा कर दिया और बड़ी बात ये हैं की उत्तर प्रदेश मे इतने कम उम्र में इतनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले युवा बने। और आज पूर्वांचल के बड़े बिजनेस मैन में एक चर्चित नाम पवन सिंह हैं।
गोरखपुर विश्वविद्यालय से छात्र राजनीति से जीवन शुरू करने वाले पवन सिंह आज पूर्वांचल के युवाओ के लिए एक रोल मॉडल बन चुके है।

अपनी युवा सोच, कड़ी मेहनत और काम केे प्रति निष्ठा एवम ईमानदारी से साबित कर दिखाया की इंसान अपने दृढ इच्छा शक्ति से कुछ भी कर गुजर सकता है।।

आज जो बात इन्हें औरों से अलग करती हैं वो हैं की पवन सिंह लोगो से सीधे तौर पर जुड़ा होना और जरूरतमंदो की सहायता अपना कर्तव्य समझना। जिसमे ये कभी पीछे नही हटते और दिल खोल कर मदद को खड़े रहते हैं।।

समाजिक कार्यो में रुचि रखने वाले पवन सिंह अपने खर्च पर गरीब लड़की की शादी करवाते है तो कभी किसी युवा को रोजगार देते है। किसी गाँव मे यदि को समस्या आ जाए तो तत्परता दिखाते हुए उनको संभालने निकल पड़ते है।
शायद ये भी एक वजह हैं जो प्रदेश में इनकी लोकप्रियता इतनी ज़्यादा हैं ख़ास कर युवाओ के बीच।।

अपने व्यक्तिगत जीवन में तमाम उतराव - चढ़ाव एवम झंझावातों को झेलते हुए अपने जीवन मे सदैव आगे बढ़ते रहे। कोई संवैधानिक पद पर ना होते हुए भी लोग इनके पास अपनी समस्या लेकर जाते हैं पवन जी उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझते हुए हर सम्भव मदद करते है।

पवन सिंह ने राजनीति को कभी अपने व्यवसाय का साधन नही बनने दिया अपितु इसकी जगह उन्होंने राजनीति की सच्ची परिभाषा को चरितार्थ करते हुए निस्वार्थ भाव से लोगो की सेवा करते हुए आज आम जनमानस में अपनी एक अच्छी छवि उकेरी है।।

उत्तर प्रदेश में आज अभिभावक पवन सिंह का मिसाल देते हुए अपने बेटों को इनके जैसा कामयाब बनने की प्रेरणा देते हैं।। आज पवन सिंह युवाओ के लिए बिजनेस और सामाजिक कार्यो के लिए आदर्श स्थापित कर चुके है।।आज हर युवा पवन सिंह बनने की चाह रखता है।।

इतना कामायाब होने के बाद भी लोगो की सेवा करने की प्रबल इच्छा इन्हें सबसे अलग कर एक नई ऊँचाई दे रही हैं।।
पवन सिंह चाहते है कि उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवा के लिए अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हो।।गोरखपुर के युवा कुछ ऐसा करे की गोरखपुर विश्वपटल पर एक आदर्श बन कर उभरे।।
अपने जैसे कई युवाओ के लिए आज वो एक कुशल नेतृत्वकर्ता,नेता और आदर्श बने हुए है ।। आज विधायक ,सांसद आदि किसी राजनैतिक पद पर ना होते हुए भी पवन सिंह से लोगो को आशा रहती है और पवन सिंह आशा पर खरे उतरते हुए लोगो की हर सम्भव मदद करते है।।

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स्टार प्लस पर "आरम्भ जल्द ही" के नाम से टीवी सीरियल आने की सुचना मिली है। इस सीरियल में आर्यों और द्रविड़ के मध्य युद्ध दिखाया जायेगा। साथ में यह भी दिखाया जायेगा कि आर्य विदेशी थे एवं उन्होंने इस देश के मूलनिवासियों पर हमला कर , उन पर विजय प्राप्त की थी। 1990 के दशक में टीपू सुल्तान एवं अकबर पर इसी तरह के टीवी सीरियल दिखाकर इन दोनों जिहादी मतान्ध शासकों को सेक्युलर सिद्ध किया गया था। यह एक प्रकार का हिन्दुओं की एक पूरी पीढ़ी का ब्रेन वाश करने के समान था। यही सुनियोजित षड़यंत्र एक बार फिर से किया जा रहा है। मरे घोड़े को फिर से जिन्दा किया जा रहा है। हम स्टार प्लस के इस षड़यंत्र का विरोध करते है। यह उत्तर भारतियों और दक्षिणभारतियों के मध्य आपस में विवाद उत्पन्न करने का प्रयास है। हम इस अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र को सफल नहीं होने देंगे।
आर्य शब्द कोई जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु गुणवाचक शब्द है। आर्य का अर्थ पूज्य, श्रेष्ठ, धार्मिक, धर्मशील, मान्य, उदारचरित, शांतचित, न्याय-पथावलम्बी, सतत कर्त्तव्य कर्म अनुष्ठाता आदि मिलता हैं। आर्य शब्द का अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” अथवा बलवान, ईश्वर का पुत्र, ईश्वर के ऐश्वर्य का स्वामी, उत्तम गुणयुक्त, सद्गुण परिपूर्ण आदि। रामायण और महाभारत में श्री राम और श्री कृष्ण को आर्यपुत्र से सम्बोधित किया गया हैं। द्रविड़ शब्द का अर्थ है दक्षिण भारत में निवास करने वाले के लिए हुआ है।
स्वामी दयानन्द जी सत्यार्थ प्रकाश 8 सम्मुलास में लिखते हैं-
“किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा की आर्य लोग इरान से आये और यहाँ के जंगलियो को लरकर जय पा के निकाल के इस देश के राजा हुए।”
स्वामी जी आर्यों के निवास स्थान को आर्यव्रत के रूप में सम्बोधित करते हुए उसे भारतवर्ष ही मानते है। स्वामी जी लिखते है- “आर्याव्रत देश इस भूमि का नाम इसलिए हैं की इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं परन्तु इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी है, इन चारों के बीच में जितना प्रदेश हैं उसको आर्याव्रत कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको भी आर्य कहते है।”- सवमंतव्य-अमंतव्य-प्रकाश-स्वामी दयानंद
डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक शूद्र कौन?[Who were Shudras?] में स्पष्ट रूप से विदेशी लेखकों की आर्यों के बाहर से आकर यहाँ पर बसने सम्बंधित मान्यता का स्पष्ट खंडन किया हैं। डॉ अम्बेडकर लिखते है-
1. वेदों में आर्य जाति के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है। 2. वेद में ऐसा कोई प्रसंग उल्लेख नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर यहाँ के मूलनिवासी दासो-दस्युओं को विजय किया। 3. आर्य, दास और दस्यु जातियों के अलगाव को सिद्ध करने के लिये कोई साक्ष्य वेदों में उपलब्ध नहीं है। 4. वेदों में इस मत की पुष्टि नहीं की की गई की गयी कि आर्य, दासों और दस्युओं से भिन्न रंग थे।
डॉ अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से स्वामी दयानंद की मान्यता का अनुमोदन किया है। वे न तो आर्य शब्द को जातिसूचक मानते थे अपितु गुणवाचक ही मानते थे। इसी सन्दर्भ में उन्होंने शूद्र शब्द को इसी पुस्तक के पृष्ठ 80 पर "आर्य" ही माना है। वे किसी भी आर्यों के बाहरी आक्रमण का स्पष्ट खंडन करते हैं। न ही आर्य और दास को अलग मानते हैं। रंग, बनावट आदि के आधार पर आर्यों-दस्युओं में भेद को स्पष्ट रूप से निष्काषित करते हैं।
योगी अरविंद भी आर्य शब्द को श्रेष्ठ गुणों के आधार पर मानते है। आधुनिक विज्ञान ने DNA स्टडीज के माध्यम से स्पष्ट रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि आर्यों का विदेशी होना एवं आक्रमणकारी होना एक मिथक कल्पना है। दक्षिण और उत्तर भारतियों के DNA एक समान है।
वैज्ञानिक प्रमाण होने के पश्चात भी इस मिथक को पुनर्जीवित करना देश की अखण्डता और सुरक्षा को को विखंडित करने का षड्यंत्र है।।

श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर “श्री गुरूजी” का जन्म 19 फरवरी 1906 को प्रातः साढ़े चार बजे नागपुर के श्री रायकर के घर में हुआ। ताई-भाऊजी की कुल 9 संतानें हुई थीं। उनमें से केवल मधु ही बचा रहा और अपने माता-पिता की आशा का केन्द्र बना। डाक्टर जी के बाद श्री गुरुजी संघ के द्वितिय सरसंघचालक बने और उन्होंने यह दायित्व 1973 की 5 जून तक अर्थात लगभग 33 वर्षों तक संभाला। 1948 में गांधीजी की 30 जनवरी को हत्या, उसके बाद संघ-विरोधी विष-वमन, हिंसाचार की आंधी और संघ पर प्रतिबन्ध का लगाया जाना, इस कालखण्ड में परम पूजनीय श्री गुरुजी ने संघ का पोषण और संवर्धन किया। भारत भर अखंड भ्रमण कर सर्वत्र कार्य को गतिमान किया और स्थान-स्थान पर व्यक्ति- व्यक्ति को जोड़कर सम्पूर्ण भारत में संघकार्य का जाल बिछाया। विपुल पठन-अध्ययन, गहन चिंतन, आध्यात्मिक साधना व गुरुकृपा, मातृभूमि के प्रति निस्वार्थ समर्पणशीलता, समाज के प्रति असीम आत्मीयता, व्यक्तियों को जोडने की अनुपम कुशलता आदि गुणों के कारण उन्होंने सर्वत्र संगठन को तो मजबूत बनाया ही, साथ ही हर क्षेत्र में देश का परिपक्व वैचारिक मार्गदर्शन भी किया। विश्व हिंदू परिषद्, विवेकानंद शिला स्मारक, अखिल भारतीय विद्दार्थी परिषद्, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, शिशु मंदिरों आदि विविध सेवा संस्थाओं के पीछे श्री गुरुजी की ही प्रेरणा रही है। राजनीतिक क्षेत्र में भी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उन्होंने पं. दिनदयाल उपाध्याय जैसा अनमोल हीरा सौंपा। 5 जून, 1973 को इस राष्ट्रऋषी का परिनिर्वाण हुआ। परम् पूज्य श्री गुरुजी के परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें शत- शत नमन...

जय श्री राम शुभ शुक्रवार भारत माता की जय ॐ कालिकायै नमः ज़ी न्यूज़ सेना के सम्मान में सबसे मह्हत्वपूर्ण मैच पर कोई प्रसारण या कार्यक्रम नही करेगा और ताल ठोक के बहस में क्रिकेटर बड़े ताव में कह रहे थे की भारतीय जनता न देखे कौन मना कर रहा है जबकि वही शहीद सैनिको का परिवार दुखी था क्या देशभक्ति का जिम्मेदारी सिर्फ सैनिको का है हम जनता जब बड़े बड़े फ़िल्म स्टारों को अर्श से फर्श पर ला दिए तो बी सी सी आई को क्यों नही क्यों सबसे बड़े मंच पर पाकिस्तान को अलग थलग नही किया गया जबकि बी सी सी आई सर्वोच्च न्यायालय के निगरानी में चल रही है । आइए एक दिन का रोमाच कम कर बी सी सी आई को सिखाए हर हर महादेव बी एस त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक तिरपाल से मंदिर निर्माण मुहीम अयोध्या

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